Wednesday, 13 July 2016

ये पन्ने ........सारे मेरे अपने -: तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?

ये पन्ने ........सारे मेरे अपने -: तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?: तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -? -------------------------- ------------------ एक पहर बीत चला संवाद हो रहा था  परंतु मौन से मौन क...

तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?

तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?
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एक पहर बीत चला संवाद हो रहा था 
परंतु मौन से मौन का --वो कदाचित 
मेरे अंतर्मन में झाँकने का प्रयास कर रहा था 

सुनो तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?
घने जंगल में...नदी तट पर -------------
भूधरों की ढलान पर....अचानक वो पूछ बैठा
उत्तर की प्रतीक्षा में वह मेरा मुख देखता रहा
और मै न जाने कहाँ थी उसका प्रश्न मथ गया
मेरे मन मस्तिक्ष को उथलपुथल सी मच गई
मुंदी आँखों में बस दिख रही थी सांभरी की दो आँखे
वो आँखे मानो दर्पण में स्वयं को देख रही थी --------
उत्तर दो न देखा कभी तुमने ? मेरा हाथ हिला कर वो बोला
चौंक उठी न जाने क्या सोचती रही अचानक ही बोल पड़ी
न नहीं देखा कभी --पर कल्पना की है घनघोर बन में भटकती
- कभी घात लगाये सिंह के पंजो की आहट से सहमी
-तो कभी बन के भयानक कुत्तों के विभत्स स्वर से
भौचक औचक सी सांभरी प्यास लगने पर भी
नदी के समीप जाने का साहस नहीं जुटा पाती
--घनी कटीली झाड़ियों से स्वयं को ढंक लेती
चुभते कांटो से धीमे धीमे बहता रक्त ---------
------------ और उस वेदना को धीमे धीमे पीती
साँभरी के पीड़ा से रक्तिम नेत्रों को --------------
बस कल्पनाओं में ही देखा है ----बोलती जा रही थी मै
गोधूलि बेला अस्ताचल को जाते सूर्य --को देख रही थी
और वह लगातार कुछ बूझने का प्रयास कर रहा था
मौन पसरा रहा संध्या का धुधंलका फैलने लगा
परन्तु मौन का संवाद तो था --उत्तर प्रत्युत्तर भी
बिन बोले ही सुन लिया सब उसने----------------
------------- और फिर अत्यंत मध्यम स्वर में कहा
सांभरी की व्यथा स्पष्ट उभर आई है तुम्हारे मुख पर
मानो तुमने ही जिया हो -- मेरा एक आग्रह मानोगी ?
तुम्हे सांभरी कह सकता हूँ --जानती हो क्यों
तुम दोनों के नेत्रों में कितना साम्य है तुम्हे नहीं पता -
अरे न ना उत्तर दिया मैने -----आखिर क्यों नहीं कह सकता ?
सिंहनी हूँ --- सांभरी नहीं कह जोर से हंस पड़ी मै
अब कैसे कहूँ उसे -शायेद -वो नहीं समझ पायेगा
कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रहें तो अच्छा है -----
---------दिव्या शुक्ला !!
(सांभरी --हिरणी )

Wednesday, 10 June 2015

नदी मर रही हैं



नदी  मर  रही  हैं
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नदी का चौड़ा पाट सिमट गया

बलुहे कगारों के बीच बह रही है

सहमी सी कृशकाय नदी

दूर दूर तक कोई वृक्ष नहीं

असमय हत्या कर दी गई उनकी

हत्यारे निर्द्वन्द घूम रहे है

नदी दबी कुचली डरी हुई

बस बह रही है जी रही है

मेरा मन रो रहा है

रोकते रोकते भी टपक गए

दो बून्द अश्रु जिन्हें नदी ने

अपनी दो सीपियों में छुपा लिया

 मैं सिसकियों को चुपके से

दबा आई किनारे पड़े पुराने

पत्थरों की महीन दरारों में

मरती हुई नदी को शायेद

जीवन की ओर मोड़ सके

सीपियाँ और सिसकियाँ
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------दिव्या शुक्ला !!

Thursday, 30 April 2015

लक्ष्मण रेखा



लक्ष्मण रेखा
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मै चाह के भी वो लक्ष्मण रेखा नहीं मिटा पाती
जो न जाने क्यूँ मैने सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए खींच दी थी
नहीं नहीं कोई अविश्वास नहीं , भला तुमसे क्या छुपा है 
हां कभी खोने का अनजाना सा भय तो कभी तुम्हे भींच लेने की चाह
कितना अजीब है ये अंतरविरोध ---
सुनो तुम नहीं जानते ---
मै अक्सर नींद से चिहुंक कर उठ जाती हूँ --
पसीने से लथपथ मेरे हाथ अँधेरे में टटोलते है तुम्हे --
मेरी धौकनी सी चलती साँसे स्थिर होना चाहती हैं
तुम्हारी पीठ से लिपट कर ,लेकिन तुम तो यहाँ कभी थे ही नहीं ,
पर अभी अभी थे न मेरे पास बहुत पास ,,तुम यहीं थे -
गुनगुना रहे थे मेरे कानों में अपना प्रिय गीत --
मेरी उँगलियाँ तुम्हारे वक्ष के घने बालों में उलझी थी --
लिख रही थी मै वो सब कुछ जो कभी कह नहीं पाती तुमसे ,,,,
और तुम ,,, तुम न वो सब आँखें मूंद कर पढ़ रहे थे मुस्करा रहे थे ,,
छलक रहा था तुम्हारी आँखों से नेह और मै भीग रही थी
मेरा एक हाथ जोर से थाम रखा था तुमने जैसे कहीं भाग न जाऊं मै ,,,
सुनो मन्त्रविद्ध अब कहाँ जाउंगी बंध गई हूँ
ये हवा भी तुम्हारी मुट्ठी में कैद हो गई ,,,,,
तुम तो जानते ही हो हवा दिखती नहीं
बस महसूस की जाती है ,,,मेरी तरह
न जाने और कितनी बातें थी जो पहली बार कह रही थी मै तुमसे
,,,, बस तभी न जाने कैसे कौन हमारे बीच आ जाता है
उफ़ ये काली पारदर्शी आकृति और मै चीख कर उठ जाती हूँ ,,,
तुम नहीं हो अब यहाँ ,,, और है केवल घना अँधेरा ,,,
जानी पहचानी सी आदिम गंध तुम्हारी ,तुम्हारा अहसास
ओह देखो न --मेरी कलाई पर कैसे उपट आये
तुम्हारी तीन उंगलियों के निशान --
और मेरी ही खिंची हुई लक्ष्मण रेखा --
--------- दिव्या शुक्ला !!
पेंटिंग  गूगल से साभार 

Sunday, 1 March 2015

कुछ तुम करना कुछ मै !!

कुछ तुम करना कुछ मै
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कल अलसुबह आना
मै मुट्ठी भर सपने लाऊंगी
तुम उन्हें कांच सा तोड़ देना 
बचे खुचे विश्वास को रेत में बिखेर देना
आंचल में भरी चांदनी पर रात उड़ेल देना
मै रात को सूरज में लपेट दूंगी
तुम दिन को सियाह कर देना
मै नीम की फुनगी पर चाँद टांग दूंगी
पत्तियों से छन के आती मध्यम रोशनी में
कुछ जोड़े घटाएंगे --ये भी तुम ही करना
मुझे जीवन का गणित नहीं आता
मन का बोझ उतार फेकना -----
रात आते ही तुम जहाँ चाहो चले जाना --
बिना कोई बोझ लिए अपने ज़मीर पे
मै आवाज़ नहीं दूंगी न अभी--- न ही फिर कभी
जाते जाते मेरा भरोसा मेरा विश्वास
मुझे लौटा जाना जो तुम्हे सौंपा था
--तुम बाकी जिंदगी आराम से सोचना
क्या खो दिया क्या पाया ---और मै
-मेरी बात छोडो----तुम नहीं समझोगे
ख़ैर छोडो जाओ भी अब --
मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की --

----दिव्या शुक्ला !!

पेंटिग गूगल से साभार


Friday, 27 February 2015

उफ़ -- अब तो हद्द हो गई



उफ़ -- अब तो हद्द हो गई
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-सुनो --सुन रहे हो ना
मेरी जिंदगी बिस्तर से गीले तौलिये उठाते /
तो कभी स्लीपर्स का दूसरा जोड़ा खोजते गुजरती जा रही है 
बाथरूम में टूथपेस्ट का ढक्कन खुला / मोइश्च्राइज़र की बोटल लुढकी
पर हाँ कोलोन और परफ्यूम हमेशा अपना कैप पहने रहते
हाँ भई प्रिय है तुम्हे /देखो बस बहुत हो गया अपने जूते तो अंदर न लाओ
बारिश के कीचड़ से भरे हैं आज कितना पानी बरसा /उफ़ कितने लापरवाह हो तुम
सारा कारपेट गंदा कर दिया और मोज़े देखो इन्हें बाथरूम में डालना वरना देखना फिर ...अब यही आदतें तुम्हारे बेटे भी खुदबखुद सीखते जा रहे हैं / पर तुम्हे क्या तुम्हे कहाँ फुरसत है
सब देखने की / तुम से कोई बात कहती हूँ तो सारी बात ख़तम होने के बात पूछते हो तुम ने कुछ कहा --- इतनी देर बकबक करती रही और तुम पूछ रहे हो कुछ कहा क्या
रोज़ सुबह पेपर ले कर टायलेट जाना कौन सी अच्छी आदत है और तो और सीट के बगल मैगज़ीन होल्डर लगवाना याद रहा पर मेरे लिए मोगरे के गजरे लाना तो भूल ही गये अब /हाँ क्यों याद रहेगा वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था /अब तो टायलेट में ही वर्ड पालिटिक्स डिसकस होती है ओबामा के साथ / जितना वक्त मुझसे दूर गुज़रे कम है / पर मिसेज़ जैन को gudmorning कहना न भूलना /सुनो मेरा comparison तो करना मत किसी से मुझे अच्छा नहीं लगता समझे ---एक मै ही जो तुमसे निभा रही हूँ दूसरी होती तो कब की छोड़ के चली गई होती -----
सबसे बुरी कौन सी आदत है तुम्हारी जानते हो नहीं ? खाना तो सिर्फ मेरे हाथ का बना शौक से खाओगे पर तारीफ़ के एक बोल भी नहीं फूटेंगे मुंह से /
कल से खाना तो क्या काफी भी नहीं बना कर दूंगी समझे -- -सोचती हूँ कभी तुम्हे अगर तलाक़ दूंगी तो इसकी यही वज़ह काफी होगी / बिस्तर पर गीला तौलिया फेंकना / मेरा फोन इग्नोर करना / सोफे पर सो जाना /और हाँ रात को बिना ब्रश किये सोना /और हाँ तुम्हारा बाथरूम में पेपर पढना उफ़ कितना - / पैरों के नाख़ून खुद तो काटना ही नहीं मै काटूँ तो बडबडाना
मुस्कराओ मत जी जल जाता है मेरा / सच कह रही हूँ चली जाउंगी छोड़ कर ----
---ख़ैर इतना कुछ काफी है अब भी तुम्हे छोड़ने के लिए
----दिव्या शुक्ला !!
दुनिया भर की सारी पत्नियों के दिल का दर्द --सच कहा न

Saturday, 14 February 2015

चलो न मीता ,,,


चलो न मीता ,,,
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तुम कितने खराब हो गए हो मीता कब से तुम्हारी बाट जोह रही हूँ
और तुम न भुलाय बैठे हो हम को ऐसा पत्थर का करेजा न था तुम्हारा
कितनी बार समझाया काहे करते हो इतनी मेहनत जब हम साथ न बैठ पायें 
तुम कहे थे न हमको इस बार माघ मेला जरुर ले जाओगे ,,,और याद है का कहे थे
अपनी बैल गाडी में ले कर बस हम और तुम ,,, ऐ सुनो न तुम तो जानते हो
हमको बैलगाड़ी में तुम्हारे साथ दूर की यात्रा करने की कितनी साध है
एक लालटेन टंगी हो बैलों के गले में घंटी टुनटुनाती हो
तुम हो और हम हों बस और कोई नहीं हमारी परछाईं भी नहीं ,,,,तुम पूरे स्वर में गाओ
वही गीत जो तुम हमारे लिए अक्सर गुनगुनाते हो ,,,,सच्ची मीता और कुछ ना चाहिए
ठंड बहुत है पाला पड़ रहा है तुम कहाँ हो ,,,अभी वो महुआ घटवारिन की कहानी भी तुमने पूरी नहीं सुनाई ,,जानते हो मुझे मेला नहीं घूमना मुझे तो तुम्हारे साथ बस यात्रा करनी है वो भी बैलगाड़ी में ,,जब तुम नहीं होते हो हिरामन तो मै तुम्हारी सारी शिकायत इस मिट्ठू से करती हूँ ,,अब हंस क्यूँ रहे हो जाओ नहीं बोलती तुमसे ,,,,तुम बहुत खराब हो ,,,,,,
अब तुम मेरे मीता हो न ,,,और मै ? मै तो बावली हूँ तुम्हारी तस्वीर से बातें करती हूँ ,,,,अरे हाँ याद आया इस बार मेले में हम दोनों तस्वीर भी खिंचवायेंगे ,,,दिन रात सफर करेंगे रस्ते में नदी के घाट पर रुकेंगे ,,,,लकड़ी जला कर साथ बैठेगे मै रोटी बनाउंगी उसी आग में और आलू भी भूनेगे ,,,,तुम बार बार कहोगे बस रात बीतते बीतते पहुँच जायेंगे और मै मन ही मन देवी देवता मनाउंगी रास्ता कभी न ख़तम हो ,,,,, कुछ ज्यादा तो चाह नहीं की हमने बस तुम्हारे संग साथ रुकते चलते जिंदगी चलती कट जाए ,,,न ये रस्ते ख़त्म हों न तुम्हारे किस्से कहानियां ,,,
-----दिव्या शुक्ला !!!

बस यूँ ही जो कुछ कुछ