Sunday, 30 December 2012

-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए ---दामिनी


-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए
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-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए
एक वादा चाहिए तुम सब से
दुनिया की हर बेटी में मुझे देखना
मेरी पीड़ा मत भूलना --याद रखना जिंदा हूँ मै
क्या मै विश्वास करूँ ?नहीं भूलोगे तुम सब
सिर्फ बातें और नारे बन कर न रह जाऊं मै
हर बेटी में मेरा ही अंश देखना ---देखोगे न
उन बारह दिनों का संघर्ष --सार्थक होगा
फिर किसी दामिनी को श्रधांजली न देनी पड़े
मै झकझोर के जगा रही हूँ तुम सब का ज़मीर -------दामिनी
-----------------DIVYA--------------------------------
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Thus spake DAMINI ---
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Its your Promise i want, Not your Tribute;
Identify me in Every single daughter of the world and don't stand Mute;

Never to forget my pain,
Im still Alive and didn't die in vain;

Can i be assured that i wont be buried in oblivion?
Mentioned in Gossips and Used in Slogans?

I'm in every Girl , every woman,
Those 12 days, moments of agony, struggle and torment;

Never again any Damini is robbed of her Innocence,
Gather-up, Wakeup and Man-up... Shakeup your conscience and Rise with Vengeance.------DAMINI
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Krishn translated this:

post ---29-12-2012  पेंटिंग गूगल से  साभार 

झकझोर रही सोये हुए लोगों को








झकझोर रही सोये हुए लोगों को
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माघ की सन्नाटे भरी सर्द रात में
धुंध की मोटी परत को चीरती हुई
गूंज रहीं है कुछ दर्द भरी सिसकियाँ
तीर की तरह बेध रही है ह्रदय को -
घने कोहरे का लबादा ओढ़े हुए
इक रूह भटकती फिर रही हैं -
वेदना के प्रतीक स्वरूप
दस्तक देती फिर रही है
झकझोर रही सोये हुए
कुंठित लोगों की अंतरात्मा
तथाकथित न्यायाधीशों को
हर उस बेटी का प्रतीक है वो
जो न्याय की आस लिए खड़ी है
----------दिव्या --------------------

24-12-2012

Saturday, 22 December 2012

क्या अब भी मौन रहोगी ? -------



पेंटिग  गूगल  से  साभार 


--जीवन की पगडंडियों पे भटकती बिटोही -- ----



Wednesday, 12 December 2012

कहाँ गए होंगे वो ----जो यहाँ सोये हैं


कहाँ गए होंगे वो ----जो यहाँ सोये हैं
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हर बेटी की तरह पिता के बहुत नजदीक रही
--------इसी माह में उनका जन्मदिन भी होता है
और इसी महीने में वो हमें सदा के लिए छोड़ गए थे
--------------- उनके जाने के बाद उन्हें
इलाहाबाद गंगा किनारे रसूलाबाद घाट पे ले
जाया गया -------/ जैसा की बंदिशे है लड़कियाँ औरतें
श्मशान नहीं जाती मुझे भी नहीं जाने दिया उनके साथ
--------उनकी अंतिम यात्रा में पर न जाने क्यूँ मन में
----------एक अजीब सी इच्छा थी वहां जरुर जाना है
उस जगह -------जहाँ आखिरी बार उनका शरीर था
फिर तो वह राख में बदल गया------ गंगा तट की वो जगह
भी जहाँ वो राख -----जो कभी मेरे पापा का वजूद था
बहाई गई बस छूना चाहती थी-------- वो जल जिसमे वो
मिल गए वो मिटटी जहाँ उनकी राख थी ---साथ ही
उस को भी जो इस दुनिया से जाने वाले हर मनुष्य का
वहां स्वागत करता है / बहुत डांट खाई पर आखिर गए
हम वहां उसी जगह उस मिटटी को छुआ भी मुझे पता था
इतने समय बाद तो न जाने कितने शरीर भस्म हुए होंगे यहाँ
पर न जाने क्यूँ मन में पिता का हाथ थामने जैसी ही अनुभूति लगी
नाव में बैठ गंगा में उसी जगह गए जहाँ से माँ गंगा उन्हें अपने
साथ ले गई थी पानी कमर से ऊपर था फिर भी उतर कर खड़े रहे
पिता से लिपटने का अहसास लिए / और उन्हें भी देखा जो श्मशान के
मेज़बान रहे उस समय / वो एक औरत थी सुना था पापा को देख
बस यही बोली अच्छा आप भी आ गए मंत्री जी ...--लोग उन्हें
महाराजिन बुआ के नाम से पुकारते थे ... अब नहीं रही पर मुझे नहीं
भूलती वह क्यूंकि मेरे पिता का अंतिम प्रयाण उन्ही के हाथों हुआ था ----
शमशान में बैठना वहां की शान्ति जिससे न जाने क्यों अधिकाँश लोग
भयभीत होते है ..मुझे अजीब सी शान्ति देती है मन के कुछ बोझ अगर
वहां उतरते है तो बहुत कुछ मिलता भी है जो बता नहीं सकते-------------
अक्सर वहां जाते भी है पर सबसे छुपा के --- ---------
एक नाम भी मिला अच्छा भी लगा ये अघोरन है या बंजारन ---
हमारे मसूरी वाले घर के बिलकुल पास कैमिल्स बैक रोड पे
एक ग्रेव यार्ड है अंग्रेजो के जमाने का --वहां बहुत खुबसुरत
कब्रें बनी है उन पर लिखी इबारतें पढना कभी कभी
अकेले वहां अकेले बैठना --भी एक अलग अनुभव एक
असीम शान्ति मिलती है अक्सर वहां बैठ कर उन्ही से
सवाल करती आप लोग तो यहाँ सोये हो फिर कौन है
जो चला गया ----------
------------------------दिव्या ------------------------------

Wednesday, 28 November 2012

उत्तर दो रघुनंदन -- -- --


उत्तर दो रघुनंदन
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हे आर्य पुत्र मेरी
शंका का समाधान करो
मै धरा -नंदिनी सीता आज
तुमसे एक प्रश्न पूछती हूँ

वो पुत्र तुम ही हो न
जिसने पिता के वचन हेतु
चौदह साल का बन गमन
सहर्ष स्वीकारा परन्तु
पत्नी को दिए सात वचन
तुम कैसे भूल गये
हे राघव तुम भले ही
मात्रपितृ भक्त हो
अनुकरणीय भ्राता भी
परन्तु क्या तुम
उपमेय पति हो ?
अपनी आसन्नप्रसवा पत्नी को
बन भेज कर तुमने किस -
मर्यादा का पालन किया
जो तुम्हारे ही वंशज को
अपने रक्त मांस से पोस रही थी
उसे बन की कठोर जीवन शैली
सौपते हुए तुम्हारा ह्रदय नहीं कांपा
तुममें इतना भी साहस न था
कि उसे उसका अपराध बता कर
स्वयं छोड़ आते --परन्तु
लघु भ्राता द्वारा भेज तुमने
अपना अपराध बोध तो
स्वयं ही सिद्ध कर दिया-
अयोध्या नरेश ये कैसा न्याय है ?
कैसी मर्यादा है मर्यादापुरुषोत्तम ?
अब क्या कहूँ --नहीं कहूँगी कुछ
मै अनुगामिनी हूँ तुम्हारी --
हे रघुवीर बन गमन के समय
तुम्हारे साथ आने का निर्णय मेरा था
पतिधर्म में कौन सी कमी रह गई थी
जो मेरी अग्नि परीक्षा ली तुमनें
हे राघव दुःख और कठिन परीक्षा की
घड़ी में छाया की भाँती साथ रही
अपनी ही अनुगामिनी को
धोबी के मात्र दो बोलों पे त्याग दिया
जाओ दशरथनंदन  मै जनकनंदिनी वसुधापुत्री
सीता तुम्हे छमा करती हूँ जानते हो आर्य पुत्र
मै धरा की पुत्री हूँ माता का धैर्य है मुझमें
तुम्हारे पुत्र तुम्हे सौंप --मै अपनी माँ की गोद में
विश्राम करती हूँ --हे रघुवीर तुम्हे त्याग कर
सदा के लिए --बस यही प्रतिकार है मेरा
मुझे ज्ञात है तुम अनुत्तरित ही रहोगे
-----------------------दिव्या ----------------------------


Tuesday, 27 November 2012

सुनो ! मेरी पहचान ही कब थी ? - --


सुनो ! मेरी पहचान ही कब थी ?
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सुनो ! मेरी पहचान न तब थी
न अब है --आदिकाल से ही
मेरा नाम मेरा अस्तित्व
दोनों विलय होता रहा है
तुम्हारे नाम तुम्हारे
के अस्तित्व के साथ
जन्म होते ही
बाबा की पहचान मिली
धिया हूँ न उनकी
हर फेरे के साथ वो पहचान
तुममे विलय होती गई
कोख में जब स्पंदन हुआ
नये अनुभव के साथ ही
एक और पहचान मिली
पर मै कहाँ हूँ ?
मै भी ख़ोज रही हूँ -
खुद अपने ही अस्तित्व को
अपनी स्वतंत्र पहचान को
जिसे तुम भी स्वीकार लो
प्रेम से --------
--------------दिव्या -------------
 

Thursday, 8 November 2012

कुछ कहा कुछ अनकहा --


कुछ कहा कुछ अनकहा
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कल रात तुमसे ढेर सारी बातें की
कुछ कडवी यादें शेयर की ---
कुछ मीठी बातें भी --सोने तो गई
पर न जाने क्यूँ नींद नहीं आई
साढ़े तीन चार बजे तक --बस यूँ ही
मेरा मन कुछ बेचैन रहा न जाने क्यूँ
आँखे बंद थी और --मै न जाने कहाँ थी
शायेद तुम्हारे इर्द गिर्द डोलती रही मेरी रूह
मै हर उस जगह गई जहाँ कभी नहीं गई थी
तुम्हारे साथ भटकती रही --कभी तेज़ तूफ़ान में
तो कभी रेत के सहरा में ----उफ़ कैसी गुजरी थी रात
इन सारे झंझावातों में एक दुसरे को सँभालते रहे
तुम थे न साथ इसलिए अपनी परवाह न थी
पर तुम्हारी थी मुझे सँभालते सँभालते कहीं तुम
अपने पुराने घावों के सूखे टाँके न खोल बैठो
तुम्हे तो पता है मै कमजोर हूँ बहुत कमजोर
तुम्हारा उतरा चेहरा नहीं देख सकती --
मुझे तुम्हारे प्यार से ज्यादा तुम्हारी डाट प्यारी लगती है
सुबह उठते ही सोचा था आज सारी सफाई करुँगी
धूल की चादर से ढंका हुआ है दिल दिमाग
तल्ख पुरानी यादें कुछ गुज़रे कंटीले पल
जो चुभते रहते है मुझे हमेशा इन्हें हटाना है
वो जो हाथ से फिसल गए या यूँ कहो
मैने ही झटक दिए वो पल नहीं याद करना मुझे
और हाँ मुझे मेरे हिस्से का प्यार चाहिए बस
इसमें कोई गुंजाइश ही नहीं एक दुसरे पर तरस की
रूहों के रिश्तों में इसकी जगह ही कहाँ --
वो तो खुदबखुद खींच लेते हैं एक दूसरे को
वो किसी ने सच ही कहा है न ------
-----कोई पास रह के भी कभी मिला नहीं
कोई दूर रह के भी कभी जुदा नहीं ---
------बस इतना ही आज ----
------------------दिव्या ------------------------------
 

वो कैसी पागल लड़की थी


वो कैसी पागल लड़की थी
रोते रोते हंस पड़ती थी
तेज़ हवा को अक्सर वो
आंचल में रोका करती थी
रातों को जागा करती थी
तारों को गिनती रहती थी
वो चाँद से बातें करती थी
हर सुख दुःख बांटा करती थी
फूलों के बीच बैठ के वो
कांटो को संभाला करती थी
जब चाँद ने तोड़ा दिल उसका
वो फूट फूट के रोई थी
वो कैसी पागल लड़की थी
किन ख्वाबो में खोई थी
----------दिव्या ----------

क्या कहूँ बस यूँ ही :)


क्या कहूँ बस यूँ ही :)
--------------------------------------------------
कल की बात है ----रात लगभग ग्यारह बजे थे
की अचानक काल बेल बजी ----------
कोई गाडी गेट पर रुकी किसी को आना न था --
इस वक्त कौन ? दरवाज़ा खोला तो वो खड़ा था
मुस्कराता हुआ ---बोला काफी पियूँगा --
दो काफी के लिए बोल मै अपने बेडरूम में आ गई
उसने चेंज भी नहीं किया बस जूते उतार कर मेरे पास ही बैठ गया
अपनी काफी सिप करते हु
ए लैपटॉप पर लगा रहा
बीच बीच में मुझसे बात भी हो रही थी ----
अचानक मुझे मौन देख बोला क्या हुआ क्या सोच रही हो
मैने कहा आजकल मै बहुत तनाव में हूँ --
तीन टेंशन है आजकल मुझे ----
वो बोला क्या हुआ बोलो न क्या टेंशन है ?
थोड़ी देर सोच कर मैने कहा --सुनो शादी कर लो न --
वो मुस्करा कर बोला तुम तनाव में बहुत सुंदर लगती हो
बस तनाव में रहो -- :) वक्त इतनी जल्दी गुज़रा की
पता ही न चला - अचानक घड़ी देखी साढ़े तीन बजे थे
बोला ओह फ्लाईट का टाइम हो गया चार बजे की है
गाडी लगाने को बोल ---- मेरे पास आया चलता हूँ
जोर से HUG किया और कहा तीन तनाव थे न बाकी के दो
अगली बार के लिए -- :) फिर बोला तुम्हारा वेट कम हुआ है
तुम सुंदर लग रही हो -- माँ --- मुझे पता है वो बहला गया मुझे
ये बेटे ऐसे ही होते है ------- :)
--------------------------------दिव्या --------------------------------

रात के आखिरी पहर में ---


रात के आखिरी पहर में
-------------------------------
एक रात से दूसरी रात
में दाखिल होती हूँ
बाहर के अंधेरों से छुप के
अपने अंदर के अंधेरों में
गुम होती जा रही हूँ मै
रात केआखिरी पहर में
एक स्याह साया अक्सर ही
झट सर से ओढ़नी खींच लेता है
और मै चीख पड़ती हूँ
उफ़ ये सच है या
सपना है बरसों से
जो सोने नहीं देता --
ये कौन सा आसेब है
क्यूँ मुझे जीने नहीं देता
ये कैसा सिलसिला है
जो खत्म नहीं होता
क्यूँ भटकती हूँ
सराब के पीछे
जाया करती हूँ ---
अश्क अपने सहराओं में
आखिर कब तक ?
ऐसा क्यों होता है मेरे ही साथ
मेरी पलकें छू भर लें
वो ख्वाब क्यूँ बिखर जातें हैं
-------दिव्या ----------
28-10-2012 ----

Friday, 26 October 2012

कितनी ही सलीबें बना लो -------


कितनी ही सलीबें बना लो 
--------------------------
वो सारे द्वार बंद हैं अब 
आशंका भी थी जिधर से 
तुम्हारे आने की ------
ताला जड के फेंक दी 
चाभी किसी अंधकूप में 
फिर क्यों बार बार 
खटखटाते हो तुम 
और खीझ कर ---- 
घर के निकास द्वार पर 
एक कंटीली नागफनी 
बो जाते हो हर बार 
मुझे कैद करने की मंशा से 
बेबस हो कर फेंकते हो 
जहरीली बेलों के बीज 
खिड़की के पल्लों की झिरी से 
जो बढ़ कर लिपट जाती है 
मेरे पूरे वज़ूद को जकड़ लेती हैं --
क्या तुम जानते हो 
अब इन विष बेलों के धीमे धीमे 
रिसते विष ने प्रवेश कर ही लिया 
मेरे पूरे अस्तित्व में 
और बना ही दिया 
मुझे विषकन्या -------
अपने अहम की पराजय 
से आहत हो तुम 
कितनी ही सलीबें बना लो 
पर मुझे नहीं लटका पाओगे 
क्यूंकि तुम नहीं जानते 
मै स्वयंसिद्धा हूँ ------
--------------दिव्या ----------------------

Wednesday, 10 October 2012

पलाश के ये दहकते लाल फूल ---मेरे जैसे


सोच रही हूँ अब ----
पतझर के सारे सूखे पत्ते
अपने मन आंगन से
बुहार कर फेंक दूं
जंगल से पलाश के
कुछ फूल लाकर
सारा घर सज़ा दूं
कांटो से घिरे ---
आग से दहकते
पलाश के लाल फूल
पता है तुम्हे ?
मुझे क्यूँ इतना भाते हैं
क्यूँ की ये कुछ कुछ
मेरी ही तरह हैं
--------दिव्या -----------------

Tuesday, 9 October 2012

वो मौन था ------


वो मौन था परन्तु ----
बोल रहा था उसका मौन
खीझ भी रहा था -और मैं
प्रस्तर प्रतिमा की भांति
खड़ी प्रयास कर रही थी
मौन की भाषा पढने की

आखिर वो बोल ही पड़ा
क्या तुम नहीं जानती
प्रेम है मुझे तुमसे --
परन्तु मै कह नहीं पाता
पता है कह देने से
वो बात कहाँ रह जाती है
तुम क्यूँ नहीं समझती
ये झुंझलाहट भी तो एक तरीका है
प्यार जताने का -------
वो भी बड़े हक़ से --------
-------------दिव्या ---------------------


Wednesday, 26 September 2012

सुनो माँ ! मुझे नहीं बनना अच्छी लड़की


सुनो माँ ! मुझे नहीं बनना अच्छी लड़की
--------------------------------------------
उफ़ दीदी तुम भी हरदम
माँ की तरह पीछे ही पड़ जाती हो
ये न करो वो न करो
ज़रा सा आईने सामने खड़े देखा
बस इनकी बकबक शुरू
चलो अपना काम करो अब --
भले घर की लड़कियाँ
हमेशा आइना नहीं देखती
अच्छा तुम ही बताओ क्या
अच्छी लडकियां अपने बाल
कुएं में झाँक कर बनाती हैं
अच्छी लड़कियां ठहाके नहीं लगाती
धीमे हंसो --यूँ भाग कर न चलो
बाल खुले न रखो दो चोटियाँ बनाओ
दुप्पटा फैला कर ओढ़ा करो ---
अब बड़ी हो गई हो तुम --
छत पर मत खड़ी हुआ करो
हद हो गई अगर इतनी बंदिशें -हैं ---
तो मुझे अच्छा नहीं बनाना
--अजीब हो दीदी तुम भी न
जब तुम और भाभी गुपचुप बतियाती हो
तब मुझे भगा देती हो --जाओ यहाँ से
छोटी हो अभी पढो जा के ---
बड़ों की बातें नहीं सुनते --
अब बता ही दो मै क्या करूँ
माँ वो भी बदल गई है
कितना चिल्लाई थी मुझ पे
ऊंट जैसी लंबी हो गई
कब अक्ल आयेगी इसे --
जरा सा गाना ही तो गा रही थी
बारिश में भीग के ----
भाई को भी कोई कुछ नहीं कहता
माँ कहती है वो लड़का है
तुम उसकी बराबरी न करो
तुम्हे दुसरे घर जाना है --पर दीदी
हम क्यूँ न करें भाई की बराबरी
तुम्हे भी तो बुरा लगा होगा जब
माँ ने तुम से भी यही कहा था न
जब तुम इस उम्र से गुजरी थीं
फिर तुम क्यूँ करती हो ऐसा दीदी
मुझे नहीं बनना अब इतनी अच्छी लड़की
----------------दिव्या --------------------------

Tuesday, 18 September 2012

और खाईयां ---गहरी ---होती ही गईं


और खाइयां ---गहरी ---होती ही गई
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रानीखेत की सुरम्य पहाड़ियां
वो दोनों घुमने आये थे शादी के बाद
डाक बंगले के पास ही तो था
लकड़ी का वो खुबसुरत काटेज

बस एक चौकीदार ही था वहां
दोनों घुमने निकलते पर
ऊँची नीचे उबड़ खाबड़ रास्तों पर
उछलती कूदती भागती वो
कभी रास्ते से चिकने पत्थर उठाती
कभी चीड़ के सूखे फल ---
और उन्हें अपने बैग में संभाल के
रख लेती -----वो देखता रहता
गुस्से में सर झटकता --
वो हवाओं को बाहों में भरती
पर वह उसकी बांह पकड़ना चाहता
तो जोर से खिलखिला कर हंस देती
क्या है चलो तुम भी पकड़ो न बादल
आखिर कार खीझ के वो कमरे में
जा के सो जाता ---वो पगली थी
न जान पाई ये ठंडे गीले बादल
रिश्तों में सीलन लाते जा रहे हैं
उस वक्त तो उसको कभी कभी
अपना सबसे बड़ा दुश्मन लगता
एक बार तो रूठ कर वो
चुपचाप खाईं में कूदने गई भी
नीचे झाँक कर देख रही थी
कूद भी जाती जिद्दी थी न
पर अचानक बीच में बादल आ गए
घाटी से ऊपर की ओर उठते हुए
मानो उसे प्यार से लिपटा रहें हों
और वो भूल गई भाग कर आई
और बांह पकड़ कर खींचते हुए
उसे ले जाने लगी चलो देखो न
कितना सुंदर है सब ---वो न गया
झटक दिया उसे झिड़का भी
वो उदास हो गई आ गई
वापस वहीँ उसी जगह
जहाँ देर रात तक वो
चाँद तारो से बात करती थी
पहाड़ों पर ये और भी करीब
आ जाते हैं न फिर उसकी तो
जान ही बसती थी इनमें
वो कुदरत की बेटी थी न
उसे नहीं आता था तब इन
रिश्तों को संभालना ---
खूब रोई वह और रूठ कर
सो गई नीचे जमीन पर
सिकुड़ मुकुड़ कर घुटने मोड़ के
सारे शाल ओढ़ लिए थे उसने
सुबह सुबह उठी ही थी कि
दरवाज़े पर दस्तक हुई
शायेद बाबा चाय लाये थे
उसकी पीठ थी दरवाज़े की तरफ
जोर से चीख उठे बाबा रानी बिटिया
बस खड़ी रहना मै अभी आया हिलना न बच्चा
चिमटा ले कर बाबा आये फिर दिखाया
वो बालिश्त भर का काला पहाड़ी बिच्छू
जो रात भर उसकी पीठ से चिपक क़र सोया था
कहते है पहाड़ी बिच्छू बड़े ज़हरीले होते है
अगर काट ले या डंक मार दे
मर भी जाते है लोग ------
वो कुदरत की बेटी थी न
उसे क्या होना था ---पर यहीं से तो शुरू हुई
खाईं गहरी होना ---वो उसे नहीं समझा
और वह रिश्तों की गंभीरता को न समझ पाई तब
उसे तो तब वह दुनिया का सबसे बुरा इंसान लगा था
जब वो उसका खजाना चिकने पत्थर चीड़ के फूल
सब खाई में फेंक कर --जोर से हंसा था
लौटते हुए रास्ते भर रोती आई ---घर आते ही
पापा से कहा नहीं रहना मुझे इस चंगेज़ खान के घर
बस 15/16 साल ही की तो थी वो --पर वो तो मेच्योर था
वो क्यों नहीं समझा उसे --गीली मिट्टी ही तो थी
ढाल लेता अपनी मूरत जैसे चाहता --पर शायेद अहम भी था
पुरुष का ---इसी अहम और बचपने ने बना दी
कभी न पटने वाली खाई --वो भी सुरम्य वादियों में
एक बार जायेगी वो हर उस जगह ---कुछ ढूढने
शायेद अपना बचपन अपनी मासूमियत --
जिसका बड़ा हिस्सा वो वहीँ छोड़ आई थी
--------------------------दिव्या----------------------------------------

Sunday, 9 September 2012

वो सारे पृष्ठ पलट दिए



अब थोड़ा सुकून है



Tuesday, 4 September 2012

मै तो सजन --आ ही रही थी



Saturday, 1 September 2012

हाँ --मैने उसे मार दिया !



Saturday, 25 August 2012

तुम ने मुझसे कहा -----


तुम ने मुझ से कहा
-----------------------
कभी किन्ही मधुर पलों में
तुमने मुझसे कहा
चंदन की गंध क्यूँ फूटती है
तुम्हारी चंदनवर्णी देह से
खिलखिला कर मै -----
जोर से हंस बैठी --और बोली
मुझे चंदन बहुत प्रिय है न
उसे आत्मसात कर लिया मैने
कुछ वैसे ही जैसे तुम्हे -एवं
तुम्हारे अस्तित्व को --भी
- जो -मुझमें ही विलीन है
और ये ही सत्य है ------
जिसे अंतस से चाहो
वह आत्मसात हो ही जाता है
-----------दिव्या ------------------

एक कहानी छोटी सी --एक रिश्ता मासूम सा


एक रिश्ता मासूम सा
-----------------------------
एक कहानी छोटी सी
------------------------------
जिंदगी गुजरती रही
कई फाइलों को
मिला कर तैयार होता रहा
एक दस्तावेज़ -------
आज फिर अतीत की
फ़ाइल उठाई ही थी
के हवा के झोंके से
सारे पन्ने फड़फड़ाते हुए
उड़ने लगे बिखर गए
मेरे चारो तरफ ----
याद आई इक लड़की
बालों की कस कर बाँधी हुई
दो मोटी चोटी----- --
हरदम इक नई शरारत से भरी
गुलाबी धूप हल्की हल्की
सी आने ही लगी थी उम्र के आँगन में
पूरी की पूरी मुहब्बत से गुंधी मिट्टी से बनी थी
पर मुहब्बत का मतलब ही नहीं जानती थी वो
पास ही रहता वह भी कुछ एक साल बड़ा था
हरदम चिढाता रहता ---उसे
खूब झगडती वह -----
-उसे बनमानुष का नाम दिया था
और वह खूब हसंता ----पर -ध्यान भी रखता
हर काम कर देता उसका ------
कभी कभी बेख्याली में --
उसे एकटक देखता रहता
और वह जोर से हँस कर कहती
क्या कभी आदमी नहीं देखा
जंगल से आये हो क्या बनमानुष ?
उस नजर को पढना उसे आता ही कहाँ था
शादी भी पक्की हुई तो दौड़ कर
उसे बताया ---सुनो अब क्या करोगे
मै जा रही हूँ किसे चिढ़ाओगे
किसे घूरोगे तुम बनमानुष --
अब तो मै जा रही हूँ ---
उसकी आखें भीगी देख
पूछ बैठी क्या हुआ ---
मेरा पेन खो गया --बोला वह
अरे इत्ती सी बात तुम मेरा ले लो न
और वह देखता ही रहा उसे --
जाने की घड़ी आ ही गई --
विदा की कठिन बेला ---
--जाते जाते उसने देखा --
वह खड़ा था --अचानक वह बोल पड़ी
जा रही हूँ ----आंसू ढलक गए उन दो आँखों से
बोला मेरी एक बात मानोगी ---बोलो
हाँ बोलो ---न ------
अपना चेहरा मुझे दे जाओ --बस
वो पगली रोते रोते हंस पड़ी
बोली अरे पागल हो क्या तुम
मर जाउंगी मै तो ------
और वह चली गई ससुराल ----
खड़ा रहा वह क्या समझाता उसे
कमअक्ल जो थी न ------
--रिश्तो को जब समझा तो
समझ में आया उस नजर का मतलब
और मन भीग गया उसका ----
---पर वह तो उसका दोस्त था
इससे ज्यादा तो वह तब समझती भी नहीं थी
--अचानक खिड़की से तेज़ हवा आई
पन्ने उड़ने लगे ---आज फिर उन को
समेट सहेज कर --दस्तावेज़ में बंद कर रही है
और याद आ रहीं है दो भीगी आँखे
एकटक देखती हुई -----उसके चेहरे को
------------------------दिव्या -------------------------------------

आखँन की पुतरी अहयं हमार बिटियन


आंखन की पुतरी हैं हमार बिटिया
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आज फिर हुई झमाझम बरसात
देर तक रिमझिम रिमझिम भी
अभी भी टिप टिप हो रही हैं ----
पेड़ पौधे कितने खुश लग रहे हैं
घर के सामने बैठा शेरू भी पूंछ हिला हिला कर
अपनी ख़ुशी मुझ पर जाहिर कर गया ---
गो वंश के प्रतिनिधि नंदी महाराज भी
प्रसन्न दिख रहे है अपनी भावभंगिमा से
मेरा मन कर रहा है यूँ ही बरसती रहो
बरखा रानी ---फिर अचानक ध्यान आया
अरे रेल की पटरी के किनारे बनी
उन झुग्गी बस्ती में क्या गत होगी ---
उनकी छत से जो टिप टिप टपकती होगी
पारबती --और त्रिभुवन की ---
पाई पाई जोड़ी गृहस्थी का क्या होगा
किसी के घर से लाया पुराना टीवी - -तीन टांग के स्टूल पर सजा है ----
अँधेरा होते ही कटिया फसा कर चलाता है
शन्नो , मुन्नी ,सोना का बापू ---
अँधेरे मे बिजली वाले पकड़ने नहीं आते न
ठेला खींच कर थका हारा त्रिभुवन घर आता
पांच छह घरों से बासन चौका कर पारबती भी
अन्हियार होत होत लौट आती --
छोड़ दिया कई घर ---का करे मन हमेसा
डरा रहत है --तीन बिटिया जवन घरे पर अहें
आग लगे ई ज़माने को --आदमी पिशाच होई गए
आज उ बड़े बंगले वाली भाभी जी समझा रही रहिन
पारबती अपनी बेटियों का धयान रखा करो --अकेले न छोड़ना
जोर से हंस दी थी वह अरे भाभी अबय बहुत छोट है
खेलय कूदेय के इहे त उमिर --फिर त हमरी तरह
नोन तेल म खटीहयं ---आज जवन कछु बताईन
सन्न रहि गई वह सुन कर ---नन्ही बच्ची को
मार के फेंक दिहिन बेईज्जती कीन ऊ अलग
राक्षस हुई गय का लोग -----
तीनो बिटिया सोई गई त देर रात तक
करवट बदलत रही ------अचानक आँख खुल गई
बगल में थक कर सोये पति की --पूछ बैठा
का रे काहे उलटत पलटत है ?---कवन चिंता है ?
उठ के बैठ गई परबतिया ---पति को देखती रही
बोली --सन्नो के बाबू का गलती किये हम
बिटियन का जनम दई के --जवन सुना आज
करेजा कांपी गय ----ऊ दिन याद करा जब
ई तीनो जनमी तुम हम कितने खुस रहिन
बेटवा चाहि त रहा एक पारिवार पूरा हुई जात
मुला तीन देबी जनमी माता रानी का परसाद माने इनका
और सर माथे पर लिहिन ---का गलती किहिन
नहीं ऐसा काहे कहत है रे ---हमार बिटियन का
कुछु न होई ---ढाढस तो बंधा गया
पर नींद गाएब हो गई ----चिंता में
रात भर करवट बदलता रहा --बोलता रहा
हम अपनी बिटियन को खूब पढ़ाएंगे
आखन की पुतरी की नाय संभारेंगे
रहि बात और लोगन की त
हे परमेस्वर इन सब का सद्बुद्धि देव---
---------------दिव्या -----------------------------

Tuesday, 14 August 2012

सपनों के दस्तावेज़

सपनों के दस्तावेज़
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वक्त करवट बदलता रहा
न जाने कब कैसे
करवट दर करवट
सरकती गई जिंदगी हाथ से
सुबह ---दोपहर ---और फिर शाम
उगते चढ़ते और ढलते --
सुख और दुःख के बीच
जिंदगी हमें घसीटती रही
समय कब धीरे धीरे आया
और अपनी छाप छोड़
कब सधे पैरों से चला गया
पता ही न चला -----
गुजरी जिंदगी की --
कड़वी खट्टी मीठी यादें
ज़हेन में कैद होती रहीं
एक दस्तावेज़ तैयार हुआ
छुई अनछुई यादों से भरा
हर औरत के मन का
एक ऐसा कोना भी होता है
जहाँ उसकी अपनी मर्ज़ी चलती है
वहां वो ही जा सकता है
जिसे वह इजाजत देती है
अनछुआ कोना मंदिर सा पावन
जहाँ देह धर्म की जरूरत नहीं होती
न जाने कब कैसे कोई वहां
प्रवेश कर लेता है ----और तब
जीवन के पतझड़ में बसंत के फूल खिल उठते हैं
पर ऋतुयें भी तो आती जाती हैं
जाते जाते कुछ निशान छोड़ जाती है
रात के इस अंधकार में
मेरे साथ बतिया रहा था
आसमान से चाँद ---
जो मेरी वेदना से पीला पड़ गया
अचानक मुझसे बोला ---सुनो !
कितनी अजीब सी बात है न
देखो तो कोई साथ रह कर भी
हमेशा अजनबी ही रहा ---
और कोई दूर हो कर भी
कभी तुमसे जुदा नहीं है ---
मुस्करा कर चाँद बोला
अब चलूं पौ फटने वाली है
फिर मिलेंगे -------
--------------दिव्या -------------------

Sunday, 29 July 2012

मुझे गर्व है मै औरत हूँ



Friday, 27 July 2012

हर पल तुम ही तो हो



न जाने कौन था वो अजनबी