Friday, 16 March 2012

न जाने कहाँ खो गया मेरा आकाश


न जाने कहाँ खो गया मेरा आकाश
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आज फिर नींद कहीं चली गई
सारी रात अंतर्द्वंद चलता रहा
हर रात की तरह मेरी आँखे
भटकती रही उन जगहों पर
जहाँ कभी मै गई ही नहीं
तुम्हें खोजती रही वहाँ
हम कितने अलग है
कोई मेल नहीं है -----
हमारे स्वभाव में ----
तुम सब भूल जाते हो
मै भुला नहीं पाती
और पतझर में झरे
सूखे पत्ते की भांति ये मन
उड़ कर पहुँच ही जाता है
तुम तक --न जाने क्यूं
बचपन की मासूम ख्वाहिश
फिर जाग जाती है उम्र के इस पड़ाव पर
मेरे पास भी पंख होते काश ---
पर अब पंख होते भी तो क्या
मेरे पास आकाश जो नहीं है
इसी आकाश की खोज में ही तो
तुम से टकरा गई थी मै
मेरा प्रारब्ध ही तो हो तुम
जो न जाने कहाँ से
मेरे सामने आ गया था
फिर भीड़ में गुम हो गया
और मै फिर उदास हो गई
जानते हो ? उसने मुझसेएक मासूम सा सवाल पूछा
तुम उसे जानती हो ? मिली हो कभी ?
नहीं तो फिर क्यूं उदास हो मेरी बुद्धू माँ ?
हाँ क्यूं उदास हूँ मै ? पता नहीं मुझे भी
शायेद कहीं गुम हो गया है मेरा आकाश
--------------------दिव्या ----------------------------
14-3-2012
पेंटिग गूगल से  साभार