Sunday, 4 March 2012

तब मैने जाना सब्र क्या है


जीवन के झंझावत में घिर कर
गले के रुंध जाने तक
अश्रु आँखों से ढलक जाने तक
आवाज़ के बिखर जाने तक
मैने तुमको आवाज़ दी
और तुम नहीं आये
सागर की तूफानी लहरों में
हम आवाज़ देते ही रहे तुम्हे
नाव के बह जाने तक भी
तुम नहीं आये !!!!
जीवन के भवंर में उलझ कर
हम तुमको आवाज़ देते रहे
मन प्राण के डूबने तक
और तुम नहीं आये
फिर
जीवन के इस पहर में
अगले तट पर
जब मैने तुम्हे
कबसे प्रतीक्षा में खड़े पाया
तब जाना
प्रेम क्या है सब्र क्या है === दिव्या