Sunday, 25 March 2012

सुनो !! तुम जानते हो ??

सुनो !! तुम जानते हो ?
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तुम्हें पता है कैसा है 
मेरा प्यार --
नहीं न ----
कैसे बताऊँ कि 
किसी की मधुर
फुसफुसाहट से लेकर
सर्पीली नदिया की
फुफकारती लहरों जैसा
अनंत आकाश सा
फैला ही फैला है
मेरा प्यार ---
बल्कि उससे भी ज्यादा
और भी बहुत ज्यादा
तुम्हारी कल्पनाओं से परे
तुम्हारे इर्द गिर्द ही
घूमती रहती है मेरी सोच
जैसे धरा घूमती है
सूर्य के चारो ओर
शायेद इसीलिये
स्त्री एक नाम
धरा भी है न
पर शायेद तुम्हें
पता नहीं
धरा का भी धैर्य
जब डोलता है तब
कितनी उथलपुथल
मच जाती है ---
फिर मै तो हाड़ मांस
की स्त्री हूँ ----
-------दिव्या ----------------