Sunday, 4 March 2012

एक पखेरू की सोच

कंक्रीट के जंगल में
भटक रहा इक पांखी
खोज रहा अपना बसेरा
कहां है पीपल वो पाकर
कहां गया घनेरा बरगद
मेरा हरा भरा सा जंगल
क्या यहाँ पखेरू पेड़ों पर
अपना घोसला नहीं बनाते
तभी उसे दिख गया वो
जो वह खोज रहा था
पीपल ,पाकर और बरगद
सोच में पड़ गया पाखी
यह गमलों में कैसे आ गए
चुपके से एक आँसू गिरा
लौट गया वो पखेरू अपनी
उसी सुहानी दुनिया की खोज में
******दिव्या **********