Sunday, 4 March 2012

मुझे बुलाते हैं वो सब

मुझे बुलाते है अमलतास के पेड़ 
पीले पीले फूलों के गुच्छे सज़ा के 
तभी गुलमोहर अपने लाल फूलों से 
सज़ा मुझसे कहता है आओ न 
कितने दिन हो गये तुमने मेरी 
छाँव में बैठ कर मेरी पत्तियों से
वो खेल नहीं खेला याद है न वो खेल
he lovz me ...he hate me ------
और आखिरी पत्ती आते आते कभी
चेहरा खिल जाता कभी उतर जाता
तभी अमलतास बोल पड़ा आओ न
देखो न ये वही फूल है जिनको
अपने बालों उल्टा सीधा लगा कर
कितना खिलखिलाती थी और फिर
माँ की एक आवाज़ पर भाग जाती थी
वो घर के पीछे जंगल भी तो है
जहाँ महुआ जामुन के पेड़ भी है
जो बूढ़े हो गये है न जाने कब
चले जायें कितना झूला झुलाया था उन्होंने
मुझे सब से मिलना है खेतों से भी
टूयूब बेल के पानी में देर तक
पाँव डाल कर छप छप करना है
सीधे खेतों से चने का साग भी खाना है
गन्ने चूसने है मुझे वहीँ रहना है
इस कंक्रीट के जंगल में नहीं रहना
एक दिन तो जरूर लौट जाऊँगी मै
अपनी उसी दुनिया में जहाँ मेरा मन बसता है
वहाँ सब है गौरी गाय है तो भूरी भैस भी
दूर घरों में छोटे छोटे सूअर के नन्हे बच्चे भी
जिनको पकड़ने का बड़ा मन करता था
पर आजी के डर से नहीं पकड़ा कभी
आज जैसी ठंड में आजी आग का जलाती थी
और उसमें आलू और शकरकंद भूनती थी
ठाकुर चाचा कहानी सुनाते थे सब बच्चे उनको
घेर कर आग के पास बैठते और बंदर भालू
पीपल की चुडैल सियार गीदड़ और न जाने
कितनी कहानियां जो तब कितनी अच्छी लगती थी
अब न कहाँ है वह सब सब बदल गया न आजी रही न तपता जलता है
इस पत्थर के शहर में पेड़ हैं ही नहीं तो लकड़ी कहाँ मिलेगी
कभी कभी बहुत दिल करता है दूर जंगल में चली जाऊं
पर मुझे अँधेरे से डर भी लगता है किसके साथ जाऊं ------दिव्या
-----------------------------------------------------------------------
पता है जब मै बहुत छोटी थी सोचती थी किसी किसान से
शादी कर लेंगे और उसकी रोटी लेकर खेत जायेंगे अब हसीं आती है
मदरइंडिया फिल्म देखी थी तो वो किसान भी मंजूर था :)))))
खेत बाग़ कुयें जंगल सुंदर प्यारे जानवर पंछी भी तो होते ही
------------------------दिव्या ------------------------------------------