Sunday, 4 March 2012

बस ये भ्रम बना रहने दो


मैने तो तुम से कुछ चाहा ही नहीं
सिर्फ उन चंद लम्हों के सिवा
जो तुम्हारे पास खाली होते थे
मुझे पता है इस कारोबारी दुनिया में
बेगरज रिश्तों का कोई वज़ूद नहीं
गर भूल सको तो भूल जाना उन लम्हों को
जिनमे केसर की भीनी भीनी सी महक होती थी
जब सूरज बिन बुलाये मेहमान सा खल जाता था
बातें खतम भी नहीं होती और न जाने कब रात सरक जाती थी
वो बेगरज सी चाहतें बेमकसद सी बातें
पर उनके पीछे होता था मेरा ढेर सा प्यार
और गंगाजल की बूंदों से तुम्हारे हर लफ्ज़
जिनमें रजनीगंधा के फूलों कि खुशबू होती
मैने तो सब से छुपा कर कहीं रख दिये हैं
क्या भूल पाओगे ये सब ? देखो हाँ न कहना
बस ये भरम ही बने रहने दो कि
तुम भी मुझे याद करते हो
कुछ भरम जरुरी भी होते है वरना
उनके टूटने से दिल दरक जाते हैं
-------------दिव्या -----------------------------