Sunday, 4 March 2012

बिखरे हुये ख्वाबों की बस्ती में


बिखरे हुए ख्वाबों की की बस्ती में
आज भी जब मेरी रूह भटकती है
और सारे जहाँ की ख़ामोशी उठ कर
जब मेरे दिल में उतर आती है
तब चुपके से चाँद आकाश से
उतर कर मेरी छत पर आ जाता है
तन्हाई में मेरे साथ टहलता है
धीमे धीमे से कानों में कहता है
कुछ सपनों के बिखर जाने से
कुछ चाहतों के मर जाने से
जीवन खतम नहीं हो जाता
---------दिव्या -------------