Sunday, 4 March 2012

मै औरत हूँ एक मजबूत दरख्त सी औरत

खुद धूप झेल कर औरों छाँव देती हूँ 
क्यूं की मै वो मजबूत दरख्त हूँ 
जिसका नाम औरत है --------
दम्भ है तुम्हें किस बात का हे पुरुष 
जब भी टूटे बिखरे हो इसी आंचल में 
आकर संबल मिला है तुम्हें
वो माँ का हो पत्नी या प्रेयसी का
कब समझोगे कब सुधरोगे तुम
मै औरत हूँ वस्तु नहीं ------
ना ही तुम्हारी जरूरत ------
बस इतना समझना है तुम्हें --------
मुझे तो हर हाल में संभलना आता है
लेकिन मुझे पता है --------------------
तुम तो बिखर ही जाओगे न --------
अगर मै नहीं संभालूंगी ---
क्यूं की मै औरत हूँ
मजबूत दरख्त सी औरत
-----------दिव्या ------------------------