Friday, 6 April 2012

खुद से खुद की बातें


खुद से खुद की बातें
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--बंटा हुआ है दो भागों में --मन
जैसे कहते है न ----
एक इंसान में छुपे है कई इंसान --
कुछ कुछ वैसा ही ---मेरा मन भी
दो तरह से जीता है ----------
एक बच्चों की तरह मासूम पर जिद्दी --
---और दूसरा -----समझदार -------
जो हमेशा बड़ी बड़ी बातें सोचता है ---
जो मेरे बच्चे जैसे मन को
समझता भी है समझाता भी है -----
जीवन में पतझर और बसंत तो आते रहते है
जो गुज़र गया वो गया उसे भूल जा ----
लेकिन इस जिद्दी मन का करूँ क्या ????
ये मानता ही नहीं ---फिर घूम फिर के वापस
उन्ही यादों में ---जिनमे तुम हो ---या कहो थे ---
क्यूं नहीं उड़ जाने देता पतझर के पीले पत्ते को --
तुम्हारी यादें मजबूत दरख्त की जड़ों सी
वो बातें और वो पल पत्तों जैसे
तुम दूर हुये पतझर भी आया
पीले पत्तों सी झरने लगी सब बातें यादें
वक्त सबसे ज्यादा मजबूत होता है
सब खतम कर देता है कितना भी चाहो
कुछ निशान ही छूट जाते हैं बस
मन समझा रहा था खुद को ही
----मुझे पता नहीं वक्त लगेगा -------अभी कुछ ---
अभी बाकी हैं निशान गुज़रे पतझर के -----
----बिना पत्तों के पेड़ भी तो वीरान हो जाते हैं ----
जब तक नई कोपलें नहीं आती ----ह्म्म्म --सही कहा --तुमने
बस इतना ही कह कर चुप हो गया वो मेरा समझदार मन ---
--- देखा -वो मेरा जिद्दी बच्चा मन ---अपनी बात मनवा ही ली न उसने-
अभी बस कुछ मोहलत चाहिये उसे ---फिर भूल जायेगा वो सब ---
---- हर चीज़ का वक्त मुकर्रर होता है --वक्त से ज्यादा कोई कहाँ ठहर पाता है
----चाहे वो यादें ही क्यों न हो --धीरे धीरे धूमिल होती जाती हैं ---
--------------------------दिव्या -------------------------------
2-4-2012
पेंटिग गूगल  से
अज्ञात कलाकार