Friday, 6 April 2012

रेगिस्तान में नख्लिस्तान भी होते हैं


-- रेगिस्तान में नख्लिस्तान भी होते हैं ----

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बरसों से बंजर पड़ी थी
मेरे मन की जमीन
मुझे आदत भी हो गई थी
खुद में जीने की---- खुद से बातें करने की ----
कभी रूठ जाती -फिर खुद ही मान भी जाती
-----किस्स्सी को भी इजाजत नहीं थी
मेरी इस दुनिया में आने की ----
उदास होती तो शब्द मेरा साथ देते
पन्नों पर उतर आते बिखर जाते
मेरी ही तरह ----टूट टूट कर टुकडों में
--अगर छोटी सी खुशी भी आई ---
तो खिलखिला कर नाच उठते ----यही शब्द पन्नों पर -फिर न जाने कब
मन के इस रेगिस्तान में ---- उग आई इक कोंपल इस बंजर जमीन पर
तुम्हारे शब्दों ने घुसपैठ कर ही लिया ऊसर बंजर मन में
और उग आया इक हरा भरा पौधा ----मेरे शब्द तुम्हारे हो गये
अब खुद से नहीं ----तुम से बात करने लगी मैं -----
लगने लगा जिंदगी के विराट रेगिस्तान में -----
ये हरा भरा पौधा तो अपना है ---खुश थी मै ---बहुत खुश --
- अचानक कुछ खो सा गया -वो अहसास तुम्हारे होने का--नहीं जानती थी न
रेगिस्तान में नखिलस्तान भी होते हैं ----
----संज्ञा शून्य स्तब्ध सी रह गई मै ---
मेरे शब्द मुझसे कहने लगे मै हूँ न
चलो फिर से उसी दुनिया में ----
----पर तुम्हारे एक शब्द से उगा
वो हरा भरा पौधा आज भी है
मेरे बंजर मन में --दूर तक फैला हुआ रेगिस्तान -----
---और वो तुम्हारे शब्दों से रोपा पौधा ------
हो गई न मुश्किल ??-- न अब तुम हो
और मेरे शब्द भी रूठते जा रहे हैं
बता के तो जाते क्या करूँ मैं अब ---
क्यूं आये थे तुम ??????????---------
मेरे मन के रेगिस्तान में नखलिस्तान बन कर बोलो ?? ------

=============== दिव्या===============================