Friday, 11 May 2012

अजनबी लड़की की डायरी के कुछ पन्ने --------[1]


अजनबी लड़की की डायरी के कुछ पन्ने -------[ 1 ]

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कुछ कुछ समझदार हुई तो अक्सर ही यही सुना औरत को तो देवता भी नहीं समझ पाये मनुष्य का क्या ?-----------------
तब अजीब सा लगता था क्या कह रहे है--- और क्यों ??---लेकिन अब लगता है सही ही कहते थे------- कहाँ समझ पाते है ये हम औरतो को-------- कभी कभी बड़ी उथल पथल मचती है-------- मन में टीस सी उठती है पलट कर देखते है गुज़रे हुए दिन तो लगता है सच ही तो है बंद मुट्ठी से रेत की मानिंद फिसल गये ---और आज मुट्ठी खाली ---------------इक कब्रिस्तान ही तो बना लिया था------ हमने अपने दिल को--------- जिसमे गम और खुशी दोनों दफ़न कर दी थी----------- गम ज्यादा थे---- ..जब भी कोई कहता काश ऐसी किस्मत सब की हो------------ तो लगता इसका मुहं बंद कर दूँ --------क्यों श्राप देते हो अपनी बेटियों को------------ कभी सोने के ताबूत में भी खुशी मिली है ??-----खुशी तो सुनहरी धूप में चमकती गेहूं की बालियों भरे खेतों के बीच है जो सिर्फ दूर से ही दिखती है मुझे --------और दिल करता है दौड जाऊँ इनके बीच------------ ..मिट्टी की सोंधी सी खुशबू हजारों रूपये के सेंट से ज्यादा अच्छी होती है न ..
ऊँची हवेलियाँ जो दूर से बड़ी लुभावनी है सुनहरी है चमक दमक है बड़े बड़े कर्तव्य तो पुरे करने होते है---- और अधिकार?----- वो कहाँ रहे पता नहीं , अक्सर शाम को ऊँची हवेली की छत से डूबते सूरज को देखना और फिर गाँव में खेत से वापस आती हुई औरतों को ---- जो बहुत खुश नज़र आती थी ----- तो कभी मन में उनसे इर्ष्या भी होती थी----- काश हम भी इन्ही में से एक होते तो कितना अच्छा होता -----काश पढ़ पाता कोई मन को तो सब कुछ कितना अलग होता ----------------- लेकिन दिल का एक अछूता कोना भी था------ जिसमें ताला लगा था दरवाजे में शायेद जंग भी लग चुकी थी-------- अक्सर दस्तकें भी सुनाई देती----- लेकिन अनसुनी कर देता दिल------ कहता फिर इक पीड़ा नहीं अब नहीं ------अचानक न जाने कैसे वो जंग लगा दरवाज़ा भी खुल जाता है ------क्या पता इस दिल के कब्रिस्तान में फूल खिलेंगे ------ या फिर इक नई कब्र बना कर अहसास दफन होंगे ----------------------------------------------इक अजनबी लड़की कि डायरी से

==================दिव्या========================