Tuesday, 1 May 2012

कुछ अहसास ऐसे भी


कुछ अहसास ऐसे भी 

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अंजुरी मे भरे गंगाजल में
ज्यूँ चाँद का अक्स दिखा
झट अपनी रूह उसके हवाले की
इक वादा लिया चाँद से मीठा सा
तुम्हारी अमानत है तुम्हें सौंप दे
हवा ने सरगोशी की धीमे से कान में
तुम खुश हो ----बहुत खुश ----
अपनी पसंदीदा जगह पर ---
मै भी खुश हूँ मेरी रूह जो  तुम्हारे पास है न
कहीं भी रहो ---अहसास है काफी
यही हो --मेरे पास  हो --मेरे हो
रूहों का नाता है ----दूरी कहाँ इसमें 

==========दिव्या =============


2 comments:

  1. दिव्या जी,
    बहुत पसंद आई आपकी रचना "कुछ एहसास ऐसे भी"
    बहुत मर्म है इन पंक्तियों में.....
    "यही हो --मेरे पास हो --मेरे हो
    रूहों का नाता है ----दूरी कहाँ इसमें"

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  2. आप का धन्यवाद राज जी --

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