Friday, 11 May 2012

इश्के मजाज़ी ----इश्के इलाही --जो मैने समझा --जितना मैने जाना

इश्के मजाज़ी ------इश्के इलाही ---जो मैने समझा --जितना मैने जाना

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प्रेम के इन ढाई अक्षरों मे पूरी जीवन यात्रा तय हो जाती है 
प्रेम को परमात्मा या परमात्मा को प्रेम वो ही कह सकते हैं 
जिन्होंने स्वयं को समघ्रता से कहीं समर्पित किया हो
खुदी को मिटा कर स्वयं के मिटने की हद तक प्रेम किया हो
जिसके अंतर मे सिर्फ प्रेम हो --फिर वो प्रेम दुःख दे या सुख
सब अच्छा लगता है क्यूं की वो इश्क के इलाही हो जाता है
और यही इश्के हकीकी की खूबसूरती भी है सब जानते हुये भी
इश्क और सिर्फ इश्क ---आत्मा और परमात्मा ---रूहों का नाता
इसी अवस्था को बुल्ले शाह ने कहा है --------------------------
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राँझा राँझा कर दी नी मै आपे राँझा होई
राँझा मै बिच मै रांझे विच होर ख्याल न कोई 

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महान सूफी संत'' सुल्तान बाहू''कहते हैं कि '' इश्क-ए - मजाज़ी ''
की सीढी के जरिये ही हम '' इश्क -ए-हकीकी ''तक पहुँच सकते हैं
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और हमारा भी यही मानना है जब तक किसी के अंदर निस्वार्थ प्रेम नहीं होगा
वो परमात्मा से प्रेम नहीं कर सकता --जब तक खुदा की कायनात
उसके बन्दों से प्यार न किया तो रब से प्यार कहाँ होगा ------
साईं बुल्ले शाह भी कुछ ऐसा ही कहते हैं --------
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जिचर न इश्क मजाज़ी लागे ,सुई सीवे न बिन धागे
इश्क मजाज़ी दाता है ,जिस पिच्छे मस्त हो जाता है ''
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अर्थात इश्के मजाज़ी इश्के हकीकी का जन्मदाता है
इश्क मजाज़ी के सुई धागे के बिना --इश्के हकीकी --
का जामा नहीं सिया जा सकता ----------
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और जब दुई का परदा उठता है तो सरमद जैसा संत भी कह उठता है
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[मुझमे समां जा इस तरह तन प्राण का जो तौर है
जिसमें न कोई कह सके मै और हूँ तू और है ]
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यही सच्चे इश्क की --इश्के हकीकी की परिणित है
ऊँचाई है खुदी(मै ) को खो कर उसमे समा गया
तब कुछ न रहा न नजदीकी न पड़ाव न मंजिल
न शरीर न आत्मा न प्रेम न प्यार न हद न बेहद
मै असल को पाकर उसके लोक का हकदार हो गया
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जितना मैने जाना समझा पढ़ा और थोड़ा अनुभव किया 

===============दिव्या ====================