Wednesday, 16 May 2012

कटे हुये पंखो वाली परी


कटे हुये पंखो वाली परी 

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सुनो !! परी तुम्हारे पंख चुरा लिये न ?
तुम्हारे अपनों ने ही ---------
-- कहीं घर की चौखट से
बाहर न निकल जाओ तुम
----अरे ! कौन हो तुम ये क्या बोल रहे हो ??
क्यूं कुरेद दिया मन को --------
उफ़ --फिर वही आवाज़ ----------
----क्या तुम्हारे लिये कोई महत्व नहीं -
आकाश की नीलिमा का ?
----या तुम्हारे नरम मुलायम विशाल पंख
अपनी चमक खो बैठे हैं कहीं दब कर ----
----- विस्तीर्ण आकाश का कोई महत्व नहीं अब -?
ओह यह तो मेरे अवचेतन मन की
------ आवाज़ है ---जो बार बार झकझोरती है
सुनो मन मेरे -----मुझे सब याद है
कुछ नहीं भूली मै ------बस अपने पर तलाश रही हूँ
---- अपने सपने कुछ समय तक लपेट दिये
उन नरम विशाल पंखो में ------------
----कहीं रख कर भूल गई अपने उत्तरदायित्व निभाने में --
अपने बच्चों को उनके पंखो को सहेज़नें में -----
-----अब वो उड़ना सीख गये ---पर मेरे पंख ही कहीं खो गये
जल्दी ही दूंढ लूंगी -----और अपना नीला आकाश भी
मैने कहा अपनी अंदर की आवाज़ से ----------
-------जो बार बार मुझे झकझोर रही थी ------

===========दिव्या =======================