Monday, 4 June 2012

सुनो ! पता है ये रातें काली क्यूँ हैं ??


सुनो ! पता है ये रातें काली क्यूं हैं ??

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सुनो ! पता है तुम्हें ??
ये रातें इतनी काली क्यूं है आजकल
जो काजल तुम्हें बहुत पसंद था न
----रोज़ ये रात चुरा लेती है
कितना भी रोकूँ पर ---नम् हो ही जाती हैं पलकें
----और बहता रहता है आँखों से काजल
आंसुओं में मिल कर ----
---फिर ये रात चुरा ले जाती है
रोज़ ही मेरा काजल --------
--रोज़ तुम्हारी याद भी न ------लाख जतन करूँ
----जाती ही नहीं ---कैसे जायेगी साँसों में बस गई है न
- ---भीग ही जाता है सरहाना ----
---क्या करूँ --मेरा बस नहीं --इन यादों पर
पता नहीं तुम्हें मेरी याद आतीभी है या नहीं
---पर मेरी बात और है ---मैने तो -----
अच्छा सुनो एक बात मानोगे ----
----तुम्हें तो पता है न ----जब तुम नहीं होते
तब मै चाँद से बातें करती हूं --------
----तुम जहाँ भी रहना रोज़ छत पर आना
मुझे चांद मे तुम्हारा अक्स दिख जायेगा -----
-----और चांदनी बिखर जायेगी -------
तुम्हारे पास होने का अहसास तो होगा ---
----और रात मेरा काजल भी नहीं चुरा सकेगी
मेरी काजल वाली आँखे --- रोज़ तुम्हारी बाट निहारेंगी
---आओगे न ----जल्दी आना ------

=============दिव्या ===================