Monday, 11 June 2012

सांझा था कभी जो हमारा


साँझा था कभी जो हमारा 

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वो सब जिन्हें कभी
--------मै सच समझ बैठी थी
और सहेज भी लिया था
------------अपने हर्दय में ---
बाँध कर एक पोटली में
-----------उनमे है कुछ मीठी बातें
अपनेपन का अहसास
---------कुछ अनुभूतियाँ कुछ बोल
अंकित हो गये जो हर्दय पटल पर
---------बहुत कुछ जो शब्दों मे नहीं कहा जा सकता
ये शायेद तुम्हारे काम के हों ------ लौटा रहीं हूं वो सब
--------शायेद तुम किसी को देना चाहो
पर झाड़ पोंछ कर देना --इसके हर कण में हूं मै
------न चाह के दिखूंगी मै ही तुम्हें
बस एक काम मेरा भी कर दो ---------
---------मुझे मेरा वो विश्वास लौटा दो
जो अब मै किसी पर नहीं कर पाती ----
-------मै तो तुम्हें लौटा ही रही हूं
वो सब जो कभी हम दोनों का सांझा था -----
--------बस और कुछ नहीं क्या कहूं 

========दिव्या ====================

पेंटिंग अज्ञात कलाकार की ----