Saturday, 23 June 2012

चंद लकीरें--- अधूरी तस्वीर


चंद लकीरें ---अधूरी तस्वीर 

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सुनो !
आज शाम देर तक
बैठी रही नदी किनारे
बहते पानी से
न जाने कितनी बातें की
नदी ने कहा मुझे देखो
बहती रही हूं निरंतर
और तुम -क्यूं ठहरी हो
बह जाने दो यादों को
दर्द को सब कुछ
जो तुम्हारा कभी था ही नहीं
फिर भी मै पलट कर
राह देखती रही
भीगती रहीं पलकें
निहारती रहीं बाट मै
आँखे --बिछीं रही
उन राहों पर अपलक
पर तुम नहीं आये
क्यूं बोलो ??----
----पता है तुम्हें
कुछ लकीरें खींची थी
जिंदगी के कैनवास पर
सोचा था रंग भरेंगे
मिल कर हम दोनों
पर अकेले की सोच
हम्मम्मम इससे क्या होता है
तुमने कुछ और सोचा
मैने कुछ और------------
जिंदगी ने शायेद कुछ और ही
कैनवास पर खींची रह गई
चंद लकीरें ---अधूरी तस्वीर
जानते हो ?---------
--बहुत खीझ आती है
मुझे तुम पर --कभी कभी
जोर से चीखने का दिल करता है
सुना है शब्दों के पंख होते है
और वो पहुँच जाते है
सातवें आसमान तक -----
--चीखी थी मैं भी
पर मेरी आवाज़
मेरे ही गले में रुंध कर
रह गई -----तुम्हें पता है  क्यूं
तुम्हारा चेहरा तैर गया -----
-----आँखों के सामने - फिर  सोचा कहीं
---तुम रुसवा न हो जाओ --

========दिव्या ============