Wednesday, 11 July 2012

रात का मुसाफिर और एक तन्हा रूह


रात का मुसाफिर और एक तन्हा रूह 

--------------------------------------

सांझे एकांत में जन्मी एक मित्रता 
रात का मुसाफिर और भटकी हुई रूह 
आवाज़ से आवाज़ का खूबसूरत नाता 
बरसों से बंद हर्दय के द्वार 
शब्दों की मोहक आहट से 
न जाने कब खुल गये 
और फिर जन्मी ---- 
सांझे  एकांत में एक मित्रता 
कुछ मास कुछ दिन कुछ पल 
में साँझा किये कुछ सुख दुःख 
और फिर -----न जाने क्या हुआ 
मुसाफिर राह भूल गया 
और रूह उदास ---
दोस्ती -सुख सम्बन्ध ,हर्ष ,,प्रेम 
और उसकी पीड़ा का अहसास 
जैसे एक आँसू बन पलक पर अटक गया --
मानो थम सा गया हो ---वो दर्द 
ठहरी हुई झील में मानो 
कोई पत्थर उछाल कर 
हलचल मचा गया हो 
मगर बस कुछ दिनों तक 
चिरस्थाई कहाँ होता है कुछ भी 
न सुख न ही दुःख ही -----
जिस व्यक्तित्व को अपनी कल्पनाओं की 
पवित्र श्रेष्टतम उंचाईयों पर बिठा देते हैं 
एक दिन वो मूर्ति भी भग्न हो ही  जाती है -न  
-  मुझे  अचानक झटका सा लगा 
 कौन  है  ये  कितनी  आसानी  से 
मेरे  ही  मन की  किताब  के  पन्ने 
पढ़  कर  मुझे  ही सुनाती  जा रही  है 
---अचानक वो चुप हो गई ---
जैसे कुछ कहते कहते रुक गई हो 
आवाज़ रुंध गई --बात अनकही रह गई 
मैने अपने चारों ओर देखा कोई न था 
हाँ वो रूह थी एक भटकती रूह ---
जो अपने सुख दुःख सारे पलों को 
पोटली में बाँध गुम हो गई अंधेरों में 
या मुझमें  ही  समाहित हो  गई 
--इन आँखों से जो लोग दिखाई देते हैं 
क्या उन्ही का अस्तित्व होता है ??
मैने यह सवाल खुद से किया 
और मेरी अन्तरात्मा ने कहा 
नहीं कुछ नाते देह से परे होते हैं 

--------------------दिव्या ---------------------
11-7-2012
पेंटिग गूगल से