Saturday, 21 July 2012

उधार लिये शब्द तुम्हारे लिये



उधार लिये शब्द तुम्हारे लिये 

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--- स्मृतियों को जिंदा रखने के लिये
खामोशियों से शब्द उधार ले कर
रोज़ रोज़ चंद लाइनें जमा करते हैं
और रख देते है उस संदूखची में
जिसे मेरे जाने के बाद ही
तुम ही खोलोगे और मैं
शून्य आकाश से देखूंगी
तुम्हारे चेहरे के भावों में
मुझे खोने की पीड़ा खोजूंगी
बहुत दूर हो गये हो तुम
पर मुझे नहीं लगता दूर हो तुम
पलकें आधी ही मुंदी होती है
कि तुम धीमे से फिरा जाते हो
अपना हाथ मेरे बालों पर
और मै आश्वस्त हो सो जाती हूं
कभी लगा ही नहीं ---------
तुम भूल भी सकते हो मुझे
बस वो गीत याद आ जाता है
वो कल भी पास पास था
वो आज भी करीब है ---मन भीग जाता है
आँखे इनको क्या कहें --आदत है इनकी
ये तो बस बरस ही पड़ती है
जब भी याद करती है तुम्हें
मन का क्या करूँ जिद्दी है न
कहता है क्या करूँ नहीं भूल पा रहा तुम्हें
हो सकता है प्राणों के साथ ही याद भी जाये
तभी तो सारी यादें समेट कर
सहेज कर सन्दूक मे रख रहे हैं
तुम संभाल लेना ---मेरे जाने के बाद
पल भर को सही --जब भी देखोगे
मुझे याद कर के तुम्हारे चेहरे पर
एक हल्की मुस्कान भी अगर तैर जायेगी
तो शून्य से तुम्हें निहारती
मै भी आश्वस्त हो जाउंगी
पल भर को ही सही तुम्हें भी
मुझ से -------प्रेम था 

-------------दिव्या -------------------