Thursday, 5 July 2012

कैसे बताऊँ तुम्हें



कैसे बताऊँ तुम्हें 

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---कैसा लगता है
फिसलती हुई गर्म चट्टानों पर
------नंगे पाँव चढ़नें की कोशिश
पिंडलियों तक चढ़ी सलवार
------टूटी चप्पलें ---हर कदम पर
बार बार फिसलने से ------
----- चोटिल हुये घुटने
पैरों की एड़ियों में चुभे कंकर
------छिले हुये घुटनों पर
ठंडी फूंक मारते हुये
--------धीमे धीमे दर्द को पीना
सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच कर भी
-----गाएब हो जाना उस साये का
जो नीचे से तुम जैसा दिखता था
-------कैसे बताऊँ तुमको कैसा लगता है
जब मेरे ख़्वाब अक्सर
-------पलकों को छूते ही बिखर जाते है
क्या तुम जानते हो ?----
------डूबते सूरज की लाल आँखों को
महसूस किया है मैने अपनी आँखों पर
-------टूटते सपनों के साथ --
कभी देखा है नीला चाँद --नहीं न
------मैने देखा है इधर कई महीनों से
पता है जब दिल में दर्द उठता है
-------तो चाँद नीला पड़ जाता है
तुम नहीं समझोगे ----अगर समझना है तो
---कभी सूरज की बंद होती आँखों पर
अपनी आँखे रख कर मेरा दर्द
----और चाँद की धीमे धीमे खुलती आँखों में
मुझे महसूस कर के देखना ------

-------------------दिव्या  -------------------

पेंटिग अज्ञात कलाकार की
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