Tuesday, 14 August 2012

सपनों के दस्तावेज़

सपनों के दस्तावेज़
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वक्त करवट बदलता रहा
न जाने कब कैसे
करवट दर करवट
सरकती गई जिंदगी हाथ से
सुबह ---दोपहर ---और फिर शाम
उगते चढ़ते और ढलते --
सुख और दुःख के बीच
जिंदगी हमें घसीटती रही
समय कब धीरे धीरे आया
और अपनी छाप छोड़
कब सधे पैरों से चला गया
पता ही न चला -----
गुजरी जिंदगी की --
कड़वी खट्टी मीठी यादें
ज़हेन में कैद होती रहीं
एक दस्तावेज़ तैयार हुआ
छुई अनछुई यादों से भरा
हर औरत के मन का
एक ऐसा कोना भी होता है
जहाँ उसकी अपनी मर्ज़ी चलती है
वहां वो ही जा सकता है
जिसे वह इजाजत देती है
अनछुआ कोना मंदिर सा पावन
जहाँ देह धर्म की जरूरत नहीं होती
न जाने कब कैसे कोई वहां
प्रवेश कर लेता है ----और तब
जीवन के पतझड़ में बसंत के फूल खिल उठते हैं
पर ऋतुयें भी तो आती जाती हैं
जाते जाते कुछ निशान छोड़ जाती है
रात के इस अंधकार में
मेरे साथ बतिया रहा था
आसमान से चाँद ---
जो मेरी वेदना से पीला पड़ गया
अचानक मुझसे बोला ---सुनो !
कितनी अजीब सी बात है न
देखो तो कोई साथ रह कर भी
हमेशा अजनबी ही रहा ---
और कोई दूर हो कर भी
कभी तुमसे जुदा नहीं है ---
मुस्करा कर चाँद बोला
अब चलूं पौ फटने वाली है
फिर मिलेंगे -------
--------------दिव्या -------------------

3 comments:

  1. बहुत खूब ... गहरा एहसास लिए ...

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  2. ब्लॉग पढने के लिए धन्यवाद दिगम्बर जी
    आप सब की प्रतिक्रियाएं बहुमूल्य हैं --आभार

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