Saturday, 25 August 2012

एक कहानी छोटी सी --एक रिश्ता मासूम सा


एक रिश्ता मासूम सा
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एक कहानी छोटी सी
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जिंदगी गुजरती रही
कई फाइलों को
मिला कर तैयार होता रहा
एक दस्तावेज़ -------
आज फिर अतीत की
फ़ाइल उठाई ही थी
के हवा के झोंके से
सारे पन्ने फड़फड़ाते हुए
उड़ने लगे बिखर गए
मेरे चारो तरफ ----
याद आई इक लड़की
बालों की कस कर बाँधी हुई
दो मोटी चोटी----- --
हरदम इक नई शरारत से भरी
गुलाबी धूप हल्की हल्की
सी आने ही लगी थी उम्र के आँगन में
पूरी की पूरी मुहब्बत से गुंधी मिट्टी से बनी थी
पर मुहब्बत का मतलब ही नहीं जानती थी वो
पास ही रहता वह भी कुछ एक साल बड़ा था
हरदम चिढाता रहता ---उसे
खूब झगडती वह -----
-उसे बनमानुष का नाम दिया था
और वह खूब हसंता ----पर -ध्यान भी रखता
हर काम कर देता उसका ------
कभी कभी बेख्याली में --
उसे एकटक देखता रहता
और वह जोर से हँस कर कहती
क्या कभी आदमी नहीं देखा
जंगल से आये हो क्या बनमानुष ?
उस नजर को पढना उसे आता ही कहाँ था
शादी भी पक्की हुई तो दौड़ कर
उसे बताया ---सुनो अब क्या करोगे
मै जा रही हूँ किसे चिढ़ाओगे
किसे घूरोगे तुम बनमानुष --
अब तो मै जा रही हूँ ---
उसकी आखें भीगी देख
पूछ बैठी क्या हुआ ---
मेरा पेन खो गया --बोला वह
अरे इत्ती सी बात तुम मेरा ले लो न
और वह देखता ही रहा उसे --
जाने की घड़ी आ ही गई --
विदा की कठिन बेला ---
--जाते जाते उसने देखा --
वह खड़ा था --अचानक वह बोल पड़ी
जा रही हूँ ----आंसू ढलक गए उन दो आँखों से
बोला मेरी एक बात मानोगी ---बोलो
हाँ बोलो ---न ------
अपना चेहरा मुझे दे जाओ --बस
वो पगली रोते रोते हंस पड़ी
बोली अरे पागल हो क्या तुम
मर जाउंगी मै तो ------
और वह चली गई ससुराल ----
खड़ा रहा वह क्या समझाता उसे
कमअक्ल जो थी न ------
--रिश्तो को जब समझा तो
समझ में आया उस नजर का मतलब
और मन भीग गया उसका ----
---पर वह तो उसका दोस्त था
इससे ज्यादा तो वह तब समझती भी नहीं थी
--अचानक खिड़की से तेज़ हवा आई
पन्ने उड़ने लगे ---आज फिर उन को
समेट सहेज कर --दस्तावेज़ में बंद कर रही है
और याद आ रहीं है दो भीगी आँखे
एकटक देखती हुई -----उसके चेहरे को
------------------------दिव्या -------------------------------------