Saturday, 25 August 2012

तुम ने मुझसे कहा -----


तुम ने मुझ से कहा
-----------------------
कभी किन्ही मधुर पलों में
तुमने मुझसे कहा
चंदन की गंध क्यूँ फूटती है
तुम्हारी चंदनवर्णी देह से
खिलखिला कर मै -----
जोर से हंस बैठी --और बोली
मुझे चंदन बहुत प्रिय है न
उसे आत्मसात कर लिया मैने
कुछ वैसे ही जैसे तुम्हे -एवं
तुम्हारे अस्तित्व को --भी
- जो -मुझमें ही विलीन है
और ये ही सत्य है ------
जिसे अंतस से चाहो
वह आत्मसात हो ही जाता है
-----------दिव्या ------------------

3 comments:

  1. शानदार भावसंयोजन, आपको बहुत बधाई
    आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है बस असे ही लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

    ReplyDelete
  2. मदनमोहन जी ब्लॉग पढने एवं प्रतिक्रिया देने के लिये आपका -- आभार धन्यवाद

    ReplyDelete
  3. प्रशंसनीय रचना - बधाई
    नई पोस्ट ..कुछ खो जाना
    पर आपका स्वगत है

    ReplyDelete