Sunday, 9 September 2012

वो सारे पृष्ठ पलट दिए



5 comments:

  1. छल और छले जाना ...ये ही प्रेम की नियति हैं

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    1. धन्यवाद अंजू --स्वागत है ब्लॉग पर --

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  2. तुम्हें तो ज्ञात ही है
    छलने और छले जाने से
    घृणा है मुझे ---बहुत खूब ………यही अन्दाज़ होना चाहिये।

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    1. सच कहा वन्दना पर बहुत चुभता भी है छल ---

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  3. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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