Friday, 26 October 2012

कितनी ही सलीबें बना लो -------


कितनी ही सलीबें बना लो 
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वो सारे द्वार बंद हैं अब 
आशंका भी थी जिधर से 
तुम्हारे आने की ------
ताला जड के फेंक दी 
चाभी किसी अंधकूप में 
फिर क्यों बार बार 
खटखटाते हो तुम 
और खीझ कर ---- 
घर के निकास द्वार पर 
एक कंटीली नागफनी 
बो जाते हो हर बार 
मुझे कैद करने की मंशा से 
बेबस हो कर फेंकते हो 
जहरीली बेलों के बीज 
खिड़की के पल्लों की झिरी से 
जो बढ़ कर लिपट जाती है 
मेरे पूरे वज़ूद को जकड़ लेती हैं --
क्या तुम जानते हो 
अब इन विष बेलों के धीमे धीमे 
रिसते विष ने प्रवेश कर ही लिया 
मेरे पूरे अस्तित्व में 
और बना ही दिया 
मुझे विषकन्या -------
अपने अहम की पराजय 
से आहत हो तुम 
कितनी ही सलीबें बना लो 
पर मुझे नहीं लटका पाओगे 
क्यूंकि तुम नहीं जानते 
मै स्वयंसिद्धा हूँ ------
--------------दिव्या ----------------------

6 comments:

  1. अपने अहम की पराजय
    से आहत हो तुम
    कितनी ही सलीबें बना लो
    पर मुझे नहीं लटका पाओगे
    क्यूंकि तुम नहीं जानते
    मै स्वयंसिद्धा हूँ ------
    ......और इसीलिए अपनी बेकार अहम् को तुम सलीब बनाते रहते हो, मुश्किल है मुझे वहां टांगना

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    1. धन्यवाद रश्मि जी
      आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया
      के लिए आभार धन्यवाद

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  2. स्वयं से स्वयं की एक अनदेखी लड़ाई ...बहुत खूब

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    1. शुक्रिया अंजू जी स्वागत है

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