Tuesday, 9 October 2012

वो मौन था ------


वो मौन था परन्तु ----
बोल रहा था उसका मौन
खीझ भी रहा था -और मैं
प्रस्तर प्रतिमा की भांति
खड़ी प्रयास कर रही थी
मौन की भाषा पढने की

आखिर वो बोल ही पड़ा
क्या तुम नहीं जानती
प्रेम है मुझे तुमसे --
परन्तु मै कह नहीं पाता
पता है कह देने से
वो बात कहाँ रह जाती है
तुम क्यूँ नहीं समझती
ये झुंझलाहट भी तो एक तरीका है
प्यार जताने का -------
वो भी बड़े हक़ से --------
-------------दिव्या ---------------------


4 comments:

  1. आजिजी से प्यार का यह रंग .... अनोखा होता है

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    1. रश्मि जी ..आभार ..आपका

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  2. रूठे हुए शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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    1. और आप भी अपनी मूल्यवान प्रतिक्रियाओं से हमे अवगत कराते हैं ...आभार मदन मोहन जी आपका

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