Wednesday, 28 November 2012

उत्तर दो रघुनंदन -- -- --


उत्तर दो रघुनंदन
-------------------------------
हे आर्य पुत्र मेरी
शंका का समाधान करो
मै धरा -नंदिनी सीता आज
तुमसे एक प्रश्न पूछती हूँ

वो पुत्र तुम ही हो न
जिसने पिता के वचन हेतु
चौदह साल का बन गमन
सहर्ष स्वीकारा परन्तु
पत्नी को दिए सात वचन
तुम कैसे भूल गये
हे राघव तुम भले ही
मात्रपितृ भक्त हो
अनुकरणीय भ्राता भी
परन्तु क्या तुम
उपमेय पति हो ?
अपनी आसन्नप्रसवा पत्नी को
बन भेज कर तुमने किस -
मर्यादा का पालन किया
जो तुम्हारे ही वंशज को
अपने रक्त मांस से पोस रही थी
उसे बन की कठोर जीवन शैली
सौपते हुए तुम्हारा ह्रदय नहीं कांपा
तुममें इतना भी साहस न था
कि उसे उसका अपराध बता कर
स्वयं छोड़ आते --परन्तु
लघु भ्राता द्वारा भेज तुमने
अपना अपराध बोध तो
स्वयं ही सिद्ध कर दिया-
अयोध्या नरेश ये कैसा न्याय है ?
कैसी मर्यादा है मर्यादापुरुषोत्तम ?
अब क्या कहूँ --नहीं कहूँगी कुछ
मै अनुगामिनी हूँ तुम्हारी --
हे रघुवीर बन गमन के समय
तुम्हारे साथ आने का निर्णय मेरा था
पतिधर्म में कौन सी कमी रह गई थी
जो मेरी अग्नि परीक्षा ली तुमनें
हे राघव दुःख और कठिन परीक्षा की
घड़ी में छाया की भाँती साथ रही
अपनी ही अनुगामिनी को
धोबी के मात्र दो बोलों पे त्याग दिया
जाओ दशरथनंदन  मै जनकनंदिनी वसुधापुत्री
सीता तुम्हे छमा करती हूँ जानते हो आर्य पुत्र
मै धरा की पुत्री हूँ माता का धैर्य है मुझमें
तुम्हारे पुत्र तुम्हे सौंप --मै अपनी माँ की गोद में
विश्राम करती हूँ --हे रघुवीर तुम्हे त्याग कर
सदा के लिए --बस यही प्रतिकार है मेरा
मुझे ज्ञात है तुम अनुत्तरित ही रहोगे
-----------------------दिव्या ----------------------------


14 comments:

  1. गहन अभिवयक्ति......

    ReplyDelete
  2. सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई।
    मेरी नयी पोस्ट "10 रुपये के नोट नहीं , अब 10 रुपये के सिक्के" को भी एक बार अवश्य पढ़े ।
    मेरा ब्लॉग पता है :- harshprachar.blogspot.com

    ReplyDelete
  3. पोस्ट की तस्वीर भी बहुत सुन्दर है ।

    ReplyDelete
  4. प्रश्न उठाती सार्थक प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  5. राम-सीता जैसे नायक नायिका को जो भगवान हैं,उनके जीवन मैं भी आपस के प्रेम मैं
    शंका आशंका रही है------इस मिथक को आज के सन्दर्भ मैं बहुत सहज और शालीनता से
    आपने अपनी रचना मैं उकेरा है------पति-पत्नी की आंतरिक कलह को
    बहुत बहुत बधाई

    ReplyDelete
  6. jwalant wa uttarhin prashna.......najawab

    ReplyDelete
  7. गहन सोच लिए अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  8. बहुत सुन्दर एवं गहन अभिव्यक्ति दिव्या जी...
    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  9. बहुत पसंद आई आपकी यह अभिव्यक्ति.

    ReplyDelete
  10. bahut sundar..
    hum ram ki karte jai-jaikaar hain
    unhe pukarte maryaada purushottam shri ram hain,
    unhone sansaar main sabhi ke dukh taare,
    kya wo apni sita ke dukh se,kyun rahe anjaane
    kya unki nahi thi jimeddari ki wo saath nibhate unka,
    par yeh to hamare samaj ki vidamban hain bhaari,
    kisi bhi yug me aurat hi keemat chukati hain bhaari.

    ReplyDelete
  11. वैसे ही एक स्त्री को उसके सवालों के जवाब मिलते ही कब हैं ?

    ReplyDelete