Tuesday, 27 November 2012

सुनो ! मेरी पहचान ही कब थी ? - --


सुनो ! मेरी पहचान ही कब थी ?
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सुनो ! मेरी पहचान न तब थी
न अब है --आदिकाल से ही
मेरा नाम मेरा अस्तित्व
दोनों विलय होता रहा है
तुम्हारे नाम तुम्हारे
के अस्तित्व के साथ
जन्म होते ही
बाबा की पहचान मिली
धिया हूँ न उनकी
हर फेरे के साथ वो पहचान
तुममे विलय होती गई
कोख में जब स्पंदन हुआ
नये अनुभव के साथ ही
एक और पहचान मिली
पर मै कहाँ हूँ ?
मै भी ख़ोज रही हूँ -
खुद अपने ही अस्तित्व को
अपनी स्वतंत्र पहचान को
जिसे तुम भी स्वीकार लो
प्रेम से --------
--------------दिव्या -------------