Thursday, 8 November 2012

कुछ कहा कुछ अनकहा --


कुछ कहा कुछ अनकहा
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कल रात तुमसे ढेर सारी बातें की
कुछ कडवी यादें शेयर की ---
कुछ मीठी बातें भी --सोने तो गई
पर न जाने क्यूँ नींद नहीं आई
साढ़े तीन चार बजे तक --बस यूँ ही
मेरा मन कुछ बेचैन रहा न जाने क्यूँ
आँखे बंद थी और --मै न जाने कहाँ थी
शायेद तुम्हारे इर्द गिर्द डोलती रही मेरी रूह
मै हर उस जगह गई जहाँ कभी नहीं गई थी
तुम्हारे साथ भटकती रही --कभी तेज़ तूफ़ान में
तो कभी रेत के सहरा में ----उफ़ कैसी गुजरी थी रात
इन सारे झंझावातों में एक दुसरे को सँभालते रहे
तुम थे न साथ इसलिए अपनी परवाह न थी
पर तुम्हारी थी मुझे सँभालते सँभालते कहीं तुम
अपने पुराने घावों के सूखे टाँके न खोल बैठो
तुम्हे तो पता है मै कमजोर हूँ बहुत कमजोर
तुम्हारा उतरा चेहरा नहीं देख सकती --
मुझे तुम्हारे प्यार से ज्यादा तुम्हारी डाट प्यारी लगती है
सुबह उठते ही सोचा था आज सारी सफाई करुँगी
धूल की चादर से ढंका हुआ है दिल दिमाग
तल्ख पुरानी यादें कुछ गुज़रे कंटीले पल
जो चुभते रहते है मुझे हमेशा इन्हें हटाना है
वो जो हाथ से फिसल गए या यूँ कहो
मैने ही झटक दिए वो पल नहीं याद करना मुझे
और हाँ मुझे मेरे हिस्से का प्यार चाहिए बस
इसमें कोई गुंजाइश ही नहीं एक दुसरे पर तरस की
रूहों के रिश्तों में इसकी जगह ही कहाँ --
वो तो खुदबखुद खींच लेते हैं एक दूसरे को
वो किसी ने सच ही कहा है न ------
-----कोई पास रह के भी कभी मिला नहीं
कोई दूर रह के भी कभी जुदा नहीं ---
------बस इतना ही आज ----
------------------दिव्या ------------------------------