Sunday, 25 March 2012

मीत हो न तुम मेरे पिछले जनम वाले ?


मीत हो न तुम मेरे पिछले जनम वाले ?

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सुनो ! एक बात कहूँ ?
दिल आज भी बस
यह सोच कर ही
धड़क जाता है ---
कि तुम मेरे मीत हो
वो पिछले जन्म वाले
सब कहते है बावली हूँ मै
ख्यालों में एक तस्वीर
बना रखी है मैने और
रात रात भर न जाने
किस अनदेखे साये से
बतियाती रहती हूँ
बावरे तो वो है
उन्हें क्या पता
हम भले ही मिले नहीं
पर एक रूहानी अहसास तो है
जो रात के सन्नाटे में ---
मेरे पास रहता है
चाँद का सरहाना
तारों की चादर बना
हम रोज़ रात
ढेरो बातें करते हैं
आसमां से फरिश्ते
झांकते है और मुस्कराते हैं
गवाह हैं न वो हमारे
न जाने कितने
सुख दुःख बांटे है न
तुम्हारे काँधे पे सर रख कर
पर हर रोज़ सुबह की पहली किरण
आते ही तुम चले जाते हो
फिर आने का वादा करके
मै फिर इंतज़ार करती हूँ
पता है मुझे भी ये
मेरे ख्वाबों की दुनिया है
जिसमे एक पात्र तुम भी हो
अनदेखे अनजाने मेरे मीत
मेरे पिछले जनम वाले
मै तुम्हें इसी नाम से
बुलाती हूँ न -------
पता है क्यूं ???नहीं न
नाम जो नहीं जानती तुम्हारा
देखो अब तुम भी मुझे बावरी न कहो
रूठ जाऊँगी मै तुम से ---
ओह देखो अब सुबह भी हो गई -----------
मुझे विदा कहना नहीं आता
मुझे तो बस ख्वाबों में
जीना आता है --जीने देना मुझे
आते रहना ख्वाबों में रोज़
ओ मेरे पिछले जनम वाले ----
---मेरे मीत ----आते रहना

-------------दिव्या ---------------------


सखियों सी दो बेलें


छोटी सी बगिया
सखियों सी दो बेलें
माधवी लता और चमेली
सुख दुःख बतिया रही --
तना खड़ा बरगद
ऊँघ रहा --------
बीच बीच में मुस्करा देता
चिढ़ कर बोली
माधवीलता से
रूठी सी चमेली
इसके चिकने पात पे
लिख दूँ ???---------
कसम से कितने
झूठे हो तुम
-------दिव्या ----------------

सुनो !! तुम जानते हो ??

सुनो !! तुम जानते हो ?
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तुम्हें पता है कैसा है 
मेरा प्यार --
नहीं न ----
कैसे बताऊँ कि 
किसी की मधुर
फुसफुसाहट से लेकर
सर्पीली नदिया की
फुफकारती लहरों जैसा
अनंत आकाश सा
फैला ही फैला है
मेरा प्यार ---
बल्कि उससे भी ज्यादा
और भी बहुत ज्यादा
तुम्हारी कल्पनाओं से परे
तुम्हारे इर्द गिर्द ही
घूमती रहती है मेरी सोच
जैसे धरा घूमती है
सूर्य के चारो ओर
शायेद इसीलिये
स्त्री एक नाम
धरा भी है न
पर शायेद तुम्हें
पता नहीं
धरा का भी धैर्य
जब डोलता है तब
कितनी उथलपुथल
मच जाती है ---
फिर मै तो हाड़ मांस
की स्त्री हूँ ----
-------दिव्या ----------------

Saturday, 17 March 2012

बस हल्का सा ही तो बदलाव आया है --


बस हल्का सा ही तो बदलाव आया है - इतना तूफ़ान मचा है -आखिर क्यूं ????
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इक बात कहूँ !! हम स्त्रियों का मन एक सा ही होता है
कभी कभी जब वो मन बहुत भर जाता है तो अहसास शब्द
बन कर निकल आते है ------हर किसी का एक आसमां है
किसी के पास है ---तो किसी को तलाश है ------अरसे से बेजुबान रही --
अब जब कुछ ने ज़ुबान पाई ---तो बेलगाम कहलाई ----
तभी तो कहा ---काम वाली बाई हो या पढ़ी लिखी शहर की नारी
एक ही सी तो हैं हम कहीं न कहीं से ---वही छटपटाहट ---
कभी कभी तो लगता है वो बेहतर समझती है हम से --
आज सुबह ही दुर्गा पोंछा लगाते हुये बडबडाती जा रही थी
[ मै किसी से कम हूँ क्या खुद हाड़ तोड़ कमाती हूँ
किसी से कुछ लेती नहीं उल्टा देती हूँ फिर क्यूं सुनू ]
उसके शरीर पर पड़े नीले निशान सब बता चुके थे
फिर भी मैने कहा तुम पुलिस में रिपोर्ट कर दो
छोड़ दो उसे ------ उसका जवाब था नहीं दीदी जाने दो
है तो मेरा ही मर्द कहाँ जायेगा--- उस बेवड़े का कौन
ख्याल रखेगा मेरे सिवा --------और मै स्तब्ध रही सोचती रही ----
क्या बदला है ----बस हल्का सा बदलाव ही तो आया ----
और इतना तूफान मचा है आखिर क्यूं ??? -----
----------------------दिव्या ------------------------------------

Friday, 16 March 2012

न जाने कहाँ खो गया मेरा आकाश


न जाने कहाँ खो गया मेरा आकाश
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आज फिर नींद कहीं चली गई
सारी रात अंतर्द्वंद चलता रहा
हर रात की तरह मेरी आँखे
भटकती रही उन जगहों पर
जहाँ कभी मै गई ही नहीं
तुम्हें खोजती रही वहाँ
हम कितने अलग है
कोई मेल नहीं है -----
हमारे स्वभाव में ----
तुम सब भूल जाते हो
मै भुला नहीं पाती
और पतझर में झरे
सूखे पत्ते की भांति ये मन
उड़ कर पहुँच ही जाता है
तुम तक --न जाने क्यूं
बचपन की मासूम ख्वाहिश
फिर जाग जाती है उम्र के इस पड़ाव पर
मेरे पास भी पंख होते काश ---
पर अब पंख होते भी तो क्या
मेरे पास आकाश जो नहीं है
इसी आकाश की खोज में ही तो
तुम से टकरा गई थी मै
मेरा प्रारब्ध ही तो हो तुम
जो न जाने कहाँ से
मेरे सामने आ गया था
फिर भीड़ में गुम हो गया
और मै फिर उदास हो गई
जानते हो ? उसने मुझसेएक मासूम सा सवाल पूछा
तुम उसे जानती हो ? मिली हो कभी ?
नहीं तो फिर क्यूं उदास हो मेरी बुद्धू माँ ?
हाँ क्यूं उदास हूँ मै ? पता नहीं मुझे भी
शायेद कहीं गुम हो गया है मेरा आकाश
--------------------दिव्या ----------------------------
14-3-2012
पेंटिग गूगल से  साभार 

Monday, 12 March 2012

ओ पाँखी ! एक संदेस पहुंचा दे पिय तक


ओ पाँखी ! एक संदेस
पहुंचा दे पिय तक
फूलों , तितलियों और
आकाश के इन्द्रधनुष से सातों रंग ----
चुरा लाइ हूँ मै पहली बार
सिर्फ तुम्हें रंगने को
बस एक बार भीग लो न
इन रंगों में -----
ये रंग न उतरेगा कभी
तुम जाओ कही भी
प्रिय मै तुम्हारे पथ का
विघ्न न बनूँगी ----
मै तो इन रंगों में
घुल कर तुम्हारी
साँसों में मह्कूँगी
नहीं रोकूँगी मै तुम्हें
बस पलकों में तुम्हारी
छवि मूंद लूंगी
बस इक बार भीग लो न
इन रंगों में ---------------
-------------दिव्या ---------------------

Wednesday, 7 March 2012

सिर्फ एक ही रंग तो चुराया मैने

रंगबिरंगी दुनिया से 
सिर्फ एक ही रंग तो 
चुराया था मैने ------
वो तुम थे -------
तुम्हारे इक बोल से 
सातों रंगों में मन 
भीग भीग जाता था
कहाँ हो तुम ????
देखो न मन बसंत
कैसे पतझर हुआ
तुम्हारे बिन ------
-------दिव्या ------------

Sunday, 4 March 2012

और वो फूल तुम हो


मेरी बालकनी में
कैक्टस का  एक पौधा  है
वो मै हूँ ----------
उस पर जो खिला है न
वो फूल तुम हो ------
जो साल में बस
एक बार ही खिलता है
बड़ा नाज़ुक होता है न
कितनी जल्दी मुरझा जाता है
बिलकुल उसी तरह से
जैसे मेरी किसी बात से
तुम्हारा चेहरा उतर जाता है
मेरी बालकनी में एक कैक्टस
मुझ  जैसा  ------------------------
और उस पर खिला फूल ----
बिलकुल तुम जैसा ----------
---------------दिव्या -------------------------

ऐ उदासी ! उससे कहना

ऐ उदासी ! उसे कहना 
एक वो ही नहीं उलझन में 
हम ने भी अपने वजूद की राख 
मुट्ठी में भींच रखी है ------
ऐ उदासी ! तुम को भी तो 
उसने ही भेजा है न मेरे पास
वो जानता है न उसके बगैर
कितनी तन्हा हो जाऊँगी मै
मंजिले उसकी थी रास्ता भी उसका
साथ चलने का वादा भी और फिर
अचानक रास्ता बदलने का फैसला भी उसीका
फिर मेरा क्या था ?? ??
बस ये आखिरी सवाल पूछना उससे
--------------दिव्या ----------------------------

मै औरत हूँ एक मजबूत दरख्त सी औरत

खुद धूप झेल कर औरों छाँव देती हूँ 
क्यूं की मै वो मजबूत दरख्त हूँ 
जिसका नाम औरत है --------
दम्भ है तुम्हें किस बात का हे पुरुष 
जब भी टूटे बिखरे हो इसी आंचल में 
आकर संबल मिला है तुम्हें
वो माँ का हो पत्नी या प्रेयसी का
कब समझोगे कब सुधरोगे तुम
मै औरत हूँ वस्तु नहीं ------
ना ही तुम्हारी जरूरत ------
बस इतना समझना है तुम्हें --------
मुझे तो हर हाल में संभलना आता है
लेकिन मुझे पता है --------------------
तुम तो बिखर ही जाओगे न --------
अगर मै नहीं संभालूंगी ---
क्यूं की मै औरत हूँ
मजबूत दरख्त सी औरत
-----------दिव्या ------------------------

ओह तुम्हारे अहसास कब बदल गये

अरे कुछ भी तो नहीं बदला यहाँ 
फिर तुम्हें ऐसा क्यूं लगा ??
ओह तुम्हारे अहसास बदल गये 
और मुझे पता भी न चला 
कब और क्यूं हुआ ?कैसे हुआ ?
अरे ! बता तो देते मुझे ख़ैर कोई बात नहीं
थोड़ा दर्द तो हुआ दिल में --------
छले जाने का अहसास भी
क्यूं की सच में मुझे नहीं पता
यह तुम्हारी आदत है या फितरत
पर मुझे कुछ वक्त लगेगा भूलने में
जब यादें जड़ें पकड़ लेती है न
तब ज़रा मुश्किल होता है न भुलाना
पर मै तुम्हें अब थोड़ा थोड़ा भूलने भी लगी हूँ
तुम तो जानते ही हो न ???
मै अगर चाहूँ तो कुछ भी कर सकती हूँ
अब खुश हो न ---जाओ तुम भी क्या याद करोगे
मैने आज़ाद किया तुम्हें अपनी यादों से
मेरे मन में कोई दुर्भाव नहीं है
बस एक सदमा सा लगा पल भर को
और हाँ तुम भी कोई अपराध बोध न पालना
वैसे तुम्हें होगा भी नहीं ये मुझे पता है
बस मेरी एक ही तमन्ना है छोटी सी
तुम मुझे हरदम याद करो -------------
और मै तुम्हें कभी भी न पहचानूं -------

---------------दिव्या --------------------------------

तुम नहीं समझोगे

सुनो !! कितने मान और अधिकार से 
तुम्हारे सीने पर सर रखा था मैने 
लेकिन तुम्हारी हर धड़कन तो 
कोई और नाम जप रही थी 
उफ़ ये क्या किया तुमने 
मुझसे कह तो दिया होता कि
अब यह घर मुझे बाँटना होगा
आह कितनी पीड़ा हुई मुझे
तुम नहीं समझोगे -------
चलो जाओ छोड़ दिया मैने
वो जगह भी जहां खुद को
सबसे महफूज़ समझती रही
क्यों की नहीं बाटं सकती
तुम्हें मै किसी के साथ
यही प्रश्न तुम से भी है मेरा
क्या तुम सह सकते हो ??
------------दिव्या ---------------------------------

सुनो अब बस भी करो न




किस सोच में हो
इतनी उदास सी क्यूं हो
क्या चल रहा है मन में
चेहरा क्यूं उतरा है
कौन है वो कहाँ है वो
कुछ कहा क्या उसने
कहाँ चला गया वो
क्यूं सर्द है तेरे ज़ज़्बात
बरसात तो हुई नहीं
फिर क्यूं भीगा है ये आंचल
क्यूं नहीं आया वो
ऐसे अनगिनत सवालात
मेरे पास नहीं हैं जिनके जवाब
चाँद तारे ये हवा सब
मुझसे बार बार पूछ्तें हैं
क्या कहूँ सब से बोलो ???
तुम ही बताओ अब क्या कहूँ ??
कहाँ हो तुम ??-----
वापस आ जाओ न
सुनो ! अब बहुत हो गया ----
अब बस भी करो न
-----------दिव्या ---------------------------------

बस ये भ्रम बना रहने दो


मैने तो तुम से कुछ चाहा ही नहीं
सिर्फ उन चंद लम्हों के सिवा
जो तुम्हारे पास खाली होते थे
मुझे पता है इस कारोबारी दुनिया में
बेगरज रिश्तों का कोई वज़ूद नहीं
गर भूल सको तो भूल जाना उन लम्हों को
जिनमे केसर की भीनी भीनी सी महक होती थी
जब सूरज बिन बुलाये मेहमान सा खल जाता था
बातें खतम भी नहीं होती और न जाने कब रात सरक जाती थी
वो बेगरज सी चाहतें बेमकसद सी बातें
पर उनके पीछे होता था मेरा ढेर सा प्यार
और गंगाजल की बूंदों से तुम्हारे हर लफ्ज़
जिनमें रजनीगंधा के फूलों कि खुशबू होती
मैने तो सब से छुपा कर कहीं रख दिये हैं
क्या भूल पाओगे ये सब ? देखो हाँ न कहना
बस ये भरम ही बने रहने दो कि
तुम भी मुझे याद करते हो
कुछ भरम जरुरी भी होते है वरना
उनके टूटने से दिल दरक जाते हैं
-------------दिव्या -----------------------------
 

मुझे बुलाते हैं वो सब

मुझे बुलाते है अमलतास के पेड़ 
पीले पीले फूलों के गुच्छे सज़ा के 
तभी गुलमोहर अपने लाल फूलों से 
सज़ा मुझसे कहता है आओ न 
कितने दिन हो गये तुमने मेरी 
छाँव में बैठ कर मेरी पत्तियों से
वो खेल नहीं खेला याद है न वो खेल
he lovz me ...he hate me ------
और आखिरी पत्ती आते आते कभी
चेहरा खिल जाता कभी उतर जाता
तभी अमलतास बोल पड़ा आओ न
देखो न ये वही फूल है जिनको
अपने बालों उल्टा सीधा लगा कर
कितना खिलखिलाती थी और फिर
माँ की एक आवाज़ पर भाग जाती थी
वो घर के पीछे जंगल भी तो है
जहाँ महुआ जामुन के पेड़ भी है
जो बूढ़े हो गये है न जाने कब
चले जायें कितना झूला झुलाया था उन्होंने
मुझे सब से मिलना है खेतों से भी
टूयूब बेल के पानी में देर तक
पाँव डाल कर छप छप करना है
सीधे खेतों से चने का साग भी खाना है
गन्ने चूसने है मुझे वहीँ रहना है
इस कंक्रीट के जंगल में नहीं रहना
एक दिन तो जरूर लौट जाऊँगी मै
अपनी उसी दुनिया में जहाँ मेरा मन बसता है
वहाँ सब है गौरी गाय है तो भूरी भैस भी
दूर घरों में छोटे छोटे सूअर के नन्हे बच्चे भी
जिनको पकड़ने का बड़ा मन करता था
पर आजी के डर से नहीं पकड़ा कभी
आज जैसी ठंड में आजी आग का जलाती थी
और उसमें आलू और शकरकंद भूनती थी
ठाकुर चाचा कहानी सुनाते थे सब बच्चे उनको
घेर कर आग के पास बैठते और बंदर भालू
पीपल की चुडैल सियार गीदड़ और न जाने
कितनी कहानियां जो तब कितनी अच्छी लगती थी
अब न कहाँ है वह सब सब बदल गया न आजी रही न तपता जलता है
इस पत्थर के शहर में पेड़ हैं ही नहीं तो लकड़ी कहाँ मिलेगी
कभी कभी बहुत दिल करता है दूर जंगल में चली जाऊं
पर मुझे अँधेरे से डर भी लगता है किसके साथ जाऊं ------दिव्या
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पता है जब मै बहुत छोटी थी सोचती थी किसी किसान से
शादी कर लेंगे और उसकी रोटी लेकर खेत जायेंगे अब हसीं आती है
मदरइंडिया फिल्म देखी थी तो वो किसान भी मंजूर था :)))))
खेत बाग़ कुयें जंगल सुंदर प्यारे जानवर पंछी भी तो होते ही
------------------------दिव्या ------------------------------------------

देखो अब कभी न कहना

मुझमे मेरापन मर सा जाता है 
जब भी तुम कहते हो अब नहीं बोलूँगा तुम से 
प्यार भरी तकरार और फिर मै करू मनुहार 
जिंदा रखते है मेरे अहसासों को 
वरना एक सहमा सा सन्नाटा फैल जाता है 
मै वो ढेर सारी बातें भूल जाती हूँ
जो तुमको बतानी होती है तुमसे बांटना चाहती हूँ
न जाने क्या तुमको कब बुरा लग जाये
सोचती हूँ और फिर एक चुप साध लेती हूँ
कोशिश करुँगी मेरे अंदर का बचपन मर जाये
फिर तो मै खामोश खामोश ही रहूंगी न
लेकिन तुम भी अब कभी न कहना अब नहीं बोलूँगा तुम से
-------------------दिव्या ----------------------------------

मै निरुत्तर हूँ


कुछ पलों की ख़ामोशी से
जैसे भाषा नहीं बिसरती
किसी के छोड़ जाने से
सांसे नहीं टूट जाती
कागज की कश्ती डूब तो जाती है
पर बचपन तो कभी मरता नहीं
कभी फूल सी कभी बबूल सी है
ये जिन्दगी तो चलती ही रहती है
पर कुछ ख्वाबों के बिखर जाने से
कुछ लम्हों के खो जाने से
जिंदगी रुक तो नहीं जाती
मुझसे यह प्रश्न किया है
इक सुरमई साँवली सी शाम ने
और ---मै -----निरुतर ----हूं
-------------दिव्या ----------------

मेरी फोटोग्राफी ---

मेरी उदास शाम मुस्करा उठी 
हटा के बादलों का परदा तुमने 
पल भर जो निहारा मुझको 
----------दिव्या --------------

ख़ामोशी के मधुर स्वर

हर तरफ ख़ामोशी है बस ख़ामोशी 
अक्सर ख़ामोशी जब बातें करती है 
तब शब्द कहीं खो जाते है 
और ख़ामोशी जब बोलती है 
नज़रे सुनती हैं समझती है 
कहीं अंदर तक उतर जाते है
ख़ामोशी के वो मधुर स्वर और बस
उन स्वरों में कही खो जाते हैं हम
>>>>>>>>दिव्या >>>>>>>>>>>

एक पखेरू की सोच

कंक्रीट के जंगल में
भटक रहा इक पांखी
खोज रहा अपना बसेरा
कहां है पीपल वो पाकर
कहां गया घनेरा बरगद
मेरा हरा भरा सा जंगल
क्या यहाँ पखेरू पेड़ों पर
अपना घोसला नहीं बनाते
तभी उसे दिख गया वो
जो वह खोज रहा था
पीपल ,पाकर और बरगद
सोच में पड़ गया पाखी
यह गमलों में कैसे आ गए
चुपके से एक आँसू गिरा
लौट गया वो पखेरू अपनी
उसी सुहानी दुनिया की खोज में
******दिव्या **********

वो कड़वी यादें


घर के पिछले दरवाज़े से मैने
आज इक पोटली फेंकी जिसमें
बांधी है कड़वी यादें दर्द
वो कल जो बार बार
याद आता था और भी
बहुत कुछ उसमें था
वो पिछला दरवाजा
अब हमेशा के लिये
बंद कर दिया मैने
और अब मन शांत
हुआ थोडा मुस्कराई
भी हूं मै क्योंकि
वो पोटली जो
फेंक आई हूं मै
------दिव्या --------

कुछ पन्ने अभी खाली हैं

मोहब्बत तुम्हारे लिये इक 
पन्ना है जिसे पढ़ा और 
चुपके से मोड़ दिया 
मगर मेरे लिये 
मोहब्बत पूरी किताब है 
जिसे चाह कर भी
मै नहीं मोड़ सकती
हर पन्ने पर कुछ दर्ज है
कुछ सुखद कुछ दुखद
हर रोज़ ही दोहराती हूं
किसी मुकद्दस किताब कि तरह
खोजती हूं किसी पन्ने पर
कुछ वो लम्हे मिल जायें
जो देह की परिभाषा से
उपर उठ कर आत्मा
की गहराइयों में उतरे हों
पर नहीं मुझे नहीं मिले वो
शायेद इसीलिए इस किताब के
कुछ पन्ने अभी भी खाली है
*****दिव्या ***********

ख़ामोशी का खूबसूरत अहसास


पहरों बैठी सोचती हूं
वक्त को कैसे कैद करूँ !
ख्वाबों की खिड़की में मेरा दिल
इक परिंदे की तरह सहमा सा
अपने परों को समेटे हुए
अपने ज़ज़्बात छुपाये हुए
न जाने कब तक बैठा रहता है
दूर आकाश को ताकता हुआ !
दूर तक फैली हुई ख़ामोशी
ख़ामोशी का खूबसूरत सा अहसास
और दिशाहीन सा मेरा अस्तित्व
हवा में इक सुगंध कि तरह
घुलने लगता है
सूखे पत्ते सा मेरा वजूद
तेरी याद की आंधी में
उड़ने लगता है
अचानक दिल मध्यम सुर में बोलता है
वक्त तो बहुत था मेरे पास
पर अपने हाथ में कब था
*************दिव्या ************************

कल रात तुम्हारी याद



कल रात तुम्हारी याद को हम
चाह के भी सुला न पाये
रात के पहले पहर ही
सुधि तुम्हारी घिर कर आई
अहसास मुझको कुछ यूँ हुआ
पास जैसे तुम हो खड़े
व्याकुल हुआ कुछ मन फिर ऐसे
ज्यूँ चांदनी में चाँद जले
छवि तुम्हारी झलक रही थी
आसमां के बादलों में
कल रात तुम न जाने क्यूँ
न चाह के भी फिर याद आये
********* दिव्या ***********

तब मैने जाना सब्र क्या है


जीवन के झंझावत में घिर कर
गले के रुंध जाने तक
अश्रु आँखों से ढलक जाने तक
आवाज़ के बिखर जाने तक
मैने तुमको आवाज़ दी
और तुम नहीं आये
सागर की तूफानी लहरों में
हम आवाज़ देते ही रहे तुम्हे
नाव के बह जाने तक भी
तुम नहीं आये !!!!
जीवन के भवंर में उलझ कर
हम तुमको आवाज़ देते रहे
मन प्राण के डूबने तक
और तुम नहीं आये
फिर
जीवन के इस पहर में
अगले तट पर
जब मैने तुम्हे
कबसे प्रतीक्षा में खड़े पाया
तब जाना
प्रेम क्या है सब्र क्या है === दिव्या

बिखरे हुये ख्वाबों की बस्ती में


बिखरे हुए ख्वाबों की की बस्ती में
आज भी जब मेरी रूह भटकती है
और सारे जहाँ की ख़ामोशी उठ कर
जब मेरे दिल में उतर आती है
तब चुपके से चाँद आकाश से
उतर कर मेरी छत पर आ जाता है
तन्हाई में मेरे साथ टहलता है
धीमे धीमे से कानों में कहता है
कुछ सपनों के बिखर जाने से
कुछ चाहतों के मर जाने से
जीवन खतम नहीं हो जाता
---------दिव्या -------------

तुम कौन हो जो मेरे आस पास रहते हो


तुम कौन हो
हमेशा मेरे आस पास
ही रहते हो हमेशा
कभी मुझे समझाते हो
बहलाते हो झिडकते हो स्नेह से
रुलाते हो कभी
तो कभी खुद भी आंसूं बहाते हो
तन्हाइयों से लड़ने की हिम्मत देते हो
चुपके से आकर मुस्कराते हो
कुछ न कहते हुए भी
सब कह जाते हो
न जाने कब तक गूंजती रहती है
अनकही बातें कानों में
नहीं जानती कौन हो तुम
शायेद अनदेखा अनजाना
मेरे ख्वाबों की कल्पना है
जो दबे पाँव मेरे
ख्वाबों के आंगन में आता है
इक ख्वाब सा दिखा जाता है
तन्हाइयों से लड़ने की
हिम्मत दे जाता है ........................दिव्या