Sunday, 22 April 2012

वो सांवरा सा साया -----

वो  सांवरा सा  साया ----





Thursday, 19 April 2012

कभी यूँ भी होता है



कभी यूँ भी होता है
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मन मे हैं
कुछ प्रश्न
मुझे हरपल
बेचैन करते
उत्तर सिर्फ
तुम्हारे पास
कुछ प्रश्न
तुम्हारे भी होंगे
चलो साँझा कर ले
हम इन्हें
कुछ शंकाएं
समाप्त होगीं
शायेद इनमे ही
हम दोनों की
मुस्काने मिल जाये
जो महीनों से
कहीं गुम हो गई है
चलो कोशिश तो करें
मुझे तुम उदास
अच्छे नहीं लगते
शायेद तुम्हें
मै भी -----
--------दिव्या ------------

Tuesday, 17 April 2012

सुनो !! एक बात पूछूं ?

सुनो !! एक बात पूछूं ?

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------बीती रात -------
-चांद जो सोया पड़ा था --------
मेरे आंचल से लिपटा --
----मुरझाया --मुहँ फेरे --
न जाने क्यूं -------
-----कुछ खफ़ा खफ़ा सा --
वो तुम थे न -----------
-----तुम भले ही न कहो ---
पर मुझे पता है -----------
--------मेरा भी सपना हर रात --
तुम्हारी आँखों मे ------
--------जागता होगा -----
बोलो न तुम ही थे न ??----
-----तुम्हें मेरे बगैर -----
नींद भी कहाँ आती है ---------

-------दिव्या ------------



Thursday, 12 April 2012

रजनीगन्धा के ये फूल

रजनीगंधा

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हमेशा की तरह अब मेरे प्रिय
रजनीगंधा के फूल भी नहीं महकते
शायेद उनको भी पता है
तुम नहीं हो और मै उदास हूँ

--------------दिव्या --------------------------


Tuesday, 10 April 2012

कुछ नन्हे --कुछ उम्रदराज़ पल


कुछ नन्हे ---कुछ उम्रदराज़ पल
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तुम्हें तो पता है न ------ये खामोश रात
और काले अँधेरे मुझे डराते हैं ----
आज न जाने क्यों ----
तुम फिर बहुत याद आये
न जाने कितने जनम बीत गये
हमें बिछड़े हुये ---नहीं भूल पाती तुम्हें
हर पल याद करते हैं -------
ज़रा सी आँख लगी नहीं कि
---दिल पे दस्तक सी सुनाई देती है --
और हम चौंक के उठ जाते हूँ
ये सोच के तुम आ गये ---
सच कहूँ अब तुम्हें भूलना भी चाहते हैं
पर वो तुम्हारी बोलती आँखे
नहीं भूलने देती मुझे -------
जैसे कह रही हो -------
---मै आता तो हूँ ख्वाबों में ही सही ---
हमें पता है तुम्हें सब पता होगा
कम बोलना और ज्यादा जानना तो
तुम्हारी आदत है न ---------
---फिर कैसे नहीं जानोगे तुम सब
तुम्हारे साथ बीते कुछ नन्हे पल
हमने आंचल में सहेज कर बाँध लिये है
पर शायेद तुम सब भूल गये न ----
तुम्हें तो ये भी याद नहीं ---
तुमने कहा था तुम जल्दी आओगे
सुनो अब हमें मत बताना
तुम कब वापस आओगे
वरना हमारी साँसे थम जायेंगी
अब देखो न हम नींद में ---
अपना ही हाथ थामे रहे ---
तुम्हारा समझ कर ---तुम्हें तो पता है न
हमें अँधेरे से डर लगता है -----------
-----और बिना तुम्हारा हाथ थामे --
हम कहाँ सो पाते हैं ------------
उफ़ ये पल भी बीत गया
तुम्हारे साथ ख्वाबों में बात करते करते
और चाँद का वो बेचारा आधा टुकड़ा
बस हल्की सी चांदनी बिखेर पाया था
हमें ख्वाबों में तुम से बात करते देख
वो भी मुस्करा रहा था --ओह पौ फट गई
चौकन्ना सा सूरज -खिड़की की झिरी से झांक उठा
और हमारे ख़्वाब टूट गये -----------------------
--------------------------दिव्या ----------------------------------


बरौनियों तले उदास दो आधे चाँद !

बरौनियों  तले  उदास  दो आधे  चाँद !
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-----गुमसुम से -------------
----कहीं खोये से थे बरौनियों तले ----
------- उदास से दो चाँद -------
उन्हें न ऊँघ लगती है--------- न नींद
यकबयक न जाने क्या सोच कर ------
----आंसुओं की नमकीन ---
धार बहने लगी --------------
--तभी आसमां का चाँद -------
-----रात को साथ ले कर आया ----
बोला अरे पागल आँखों वाली
छोटे मोटे दर्द -----
--- सहन करने की ---
तो आदत है न तुम्हें -------
उलझे ख्वाबों वाली सुनो
इन ख्वाबों को ----
---अब दफना दो ---
मत उदास हो ----मिलते हैं
इक नई भोर के साथ ---
---चांद ने कहा ----और
सुबह के हवाले कर ------
---रात को साथ ले --
चला गया चाँद --------
फिर आने का वादा कर -----
-----------दिव्या ----------------------

Friday, 6 April 2012

रेगिस्तान में नख्लिस्तान भी होते हैं


-- रेगिस्तान में नख्लिस्तान भी होते हैं ----

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बरसों से बंजर पड़ी थी
मेरे मन की जमीन
मुझे आदत भी हो गई थी
खुद में जीने की---- खुद से बातें करने की ----
कभी रूठ जाती -फिर खुद ही मान भी जाती
-----किस्स्सी को भी इजाजत नहीं थी
मेरी इस दुनिया में आने की ----
उदास होती तो शब्द मेरा साथ देते
पन्नों पर उतर आते बिखर जाते
मेरी ही तरह ----टूट टूट कर टुकडों में
--अगर छोटी सी खुशी भी आई ---
तो खिलखिला कर नाच उठते ----यही शब्द पन्नों पर -फिर न जाने कब
मन के इस रेगिस्तान में ---- उग आई इक कोंपल इस बंजर जमीन पर
तुम्हारे शब्दों ने घुसपैठ कर ही लिया ऊसर बंजर मन में
और उग आया इक हरा भरा पौधा ----मेरे शब्द तुम्हारे हो गये
अब खुद से नहीं ----तुम से बात करने लगी मैं -----
लगने लगा जिंदगी के विराट रेगिस्तान में -----
ये हरा भरा पौधा तो अपना है ---खुश थी मै ---बहुत खुश --
- अचानक कुछ खो सा गया -वो अहसास तुम्हारे होने का--नहीं जानती थी न
रेगिस्तान में नखिलस्तान भी होते हैं ----
----संज्ञा शून्य स्तब्ध सी रह गई मै ---
मेरे शब्द मुझसे कहने लगे मै हूँ न
चलो फिर से उसी दुनिया में ----
----पर तुम्हारे एक शब्द से उगा
वो हरा भरा पौधा आज भी है
मेरे बंजर मन में --दूर तक फैला हुआ रेगिस्तान -----
---और वो तुम्हारे शब्दों से रोपा पौधा ------
हो गई न मुश्किल ??-- न अब तुम हो
और मेरे शब्द भी रूठते जा रहे हैं
बता के तो जाते क्या करूँ मैं अब ---
क्यूं आये थे तुम ??????????---------
मेरे मन के रेगिस्तान में नखलिस्तान बन कर बोलो ?? ------

=============== दिव्या===============================


खुद से खुद की बातें


खुद से खुद की बातें
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--बंटा हुआ है दो भागों में --मन
जैसे कहते है न ----
एक इंसान में छुपे है कई इंसान --
कुछ कुछ वैसा ही ---मेरा मन भी
दो तरह से जीता है ----------
एक बच्चों की तरह मासूम पर जिद्दी --
---और दूसरा -----समझदार -------
जो हमेशा बड़ी बड़ी बातें सोचता है ---
जो मेरे बच्चे जैसे मन को
समझता भी है समझाता भी है -----
जीवन में पतझर और बसंत तो आते रहते है
जो गुज़र गया वो गया उसे भूल जा ----
लेकिन इस जिद्दी मन का करूँ क्या ????
ये मानता ही नहीं ---फिर घूम फिर के वापस
उन्ही यादों में ---जिनमे तुम हो ---या कहो थे ---
क्यूं नहीं उड़ जाने देता पतझर के पीले पत्ते को --
तुम्हारी यादें मजबूत दरख्त की जड़ों सी
वो बातें और वो पल पत्तों जैसे
तुम दूर हुये पतझर भी आया
पीले पत्तों सी झरने लगी सब बातें यादें
वक्त सबसे ज्यादा मजबूत होता है
सब खतम कर देता है कितना भी चाहो
कुछ निशान ही छूट जाते हैं बस
मन समझा रहा था खुद को ही
----मुझे पता नहीं वक्त लगेगा -------अभी कुछ ---
अभी बाकी हैं निशान गुज़रे पतझर के -----
----बिना पत्तों के पेड़ भी तो वीरान हो जाते हैं ----
जब तक नई कोपलें नहीं आती ----ह्म्म्म --सही कहा --तुमने
बस इतना ही कह कर चुप हो गया वो मेरा समझदार मन ---
--- देखा -वो मेरा जिद्दी बच्चा मन ---अपनी बात मनवा ही ली न उसने-
अभी बस कुछ मोहलत चाहिये उसे ---फिर भूल जायेगा वो सब ---
---- हर चीज़ का वक्त मुकर्रर होता है --वक्त से ज्यादा कोई कहाँ ठहर पाता है
----चाहे वो यादें ही क्यों न हो --धीरे धीरे धूमिल होती जाती हैं ---
--------------------------दिव्या -------------------------------
2-4-2012
पेंटिग गूगल  से
अज्ञात कलाकार