Friday, 25 May 2012

कैसे लौटा दूँ -------


कैसे लौटा दूँ -----

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मै चाह के भी नहीं 
लौटा सकती तुम्हें
वो पीड़ा जो --
मेरे तप्त आसूओं
से धुले मुख पर
रख गये हो तुम
शांत झील से
जीवन में एक
पत्थर उछाल गये
प्रतीक्षा रहेगी मुझे
अंतिम पल तक
जब तुम स्वयं
मुझे बताओगे
मुझे अनुत्तरित क्यूं
छोड़ गये --------
जिद्दी हूं न और मानिनी भी
पीड़ा के साथ अपमान
भी पिया मैने
बहुत प्रेम किया था न
इस लिये छले जाने का
अहसास भी हुआ
कोई ऐसे भी करता है भला
क्या सच में तुम सब भूल गये
हाँ एक प्रश्न और
गर तुम वीतरागी थे
तो इस अनुरागी मन
मे क्यूं आये ----??
तुम्हें कुछ याद नहीं
और मुझे कुछ
भूलता नहीं
यही अंतर है न
हम दोनों में --
तुम क्या जानो
कितनी पीड़ा होती है
वो पीड़ा मै तुम्हें कैसे
लौटा सकती हूं ---
वो तुमने दी है न
एक बात कहूँ ---
तुम तो ऐसे न थे
ख़ैर रब तुम्हारा
भला करे -----

====दिव्या =======


Tuesday, 22 May 2012

मै तुम्हे याद नहीं करती


मै तुम्हें याद नहीं करती 

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मौन स्तब्ध अवाक् रात्री
कुछ शब्द कुछ स्मृतियां
मद्धम स्वरों में गूंजती हैं
मन आकुल व्याकुल हो
चीख उठता है -----
नहीं याद करुँगी अब मै
पर क्या करूँ ------
पहली झपकी कच्ची नींद की
और स्वप्न मे तुम
तुम्हारे वक्ष पर मेरा सिर
मेरी प्रिय सुरक्षित जगह
क्या करूँ अब ???
मै तुम्हें याद नहीं करती लेकिन
मेरे पास जो भी सुखद स्मृतियाँ हैं
वो सब तुम्हारी यादों से ही तो जुडी हैं न 

==========दिव्या ========



देखो मै आ गया

देखो मै आ गया 

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कुछ उदास सी अनमनी सी
न जाने किन ख्यालों में
उलझी उलझी सी खडी थी
कभी नम होती आँखे
कभी कुछ सोच कर
अनायास ही मुस्करा देती
बहुत अकेली थी उदास भी
अचानक पीछे से किसी ने
जोर से बाहों में भर लिया
और गोल गोल घुमाने लगा
खिलखिलाता रहा हसंता रहा
मै झूठ मूठ गुस्सा करती रही --
वो बोला माँ . देखो मै आ गया --माँ --
सिर्फ बस इसी इक शब्द से
सब भूल गई मै -- न जाने कहाँ
गया सारा गुस्सा -----
वो मेरा बेटा जो आ गया न 

=======दिव्या =================


Friday, 18 May 2012

एक कोलाज़ !!


एक कोलाज़ !!

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बिखरे सपनों को बटोर
-----टांक दिया ----------
कुछ यादें बीते पलों की
---रंग नहीं मिला
तो क्या ----हैं न
----दिल से रिसते खून
के कुछ छींटे -----
----बन गया न
कोलाज़ -----मेरी यादों का

=====दिव्या =========


Wednesday, 16 May 2012

कटे हुये पंखो वाली परी


कटे हुये पंखो वाली परी 

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सुनो !! परी तुम्हारे पंख चुरा लिये न ?
तुम्हारे अपनों ने ही ---------
-- कहीं घर की चौखट से
बाहर न निकल जाओ तुम
----अरे ! कौन हो तुम ये क्या बोल रहे हो ??
क्यूं कुरेद दिया मन को --------
उफ़ --फिर वही आवाज़ ----------
----क्या तुम्हारे लिये कोई महत्व नहीं -
आकाश की नीलिमा का ?
----या तुम्हारे नरम मुलायम विशाल पंख
अपनी चमक खो बैठे हैं कहीं दब कर ----
----- विस्तीर्ण आकाश का कोई महत्व नहीं अब -?
ओह यह तो मेरे अवचेतन मन की
------ आवाज़ है ---जो बार बार झकझोरती है
सुनो मन मेरे -----मुझे सब याद है
कुछ नहीं भूली मै ------बस अपने पर तलाश रही हूँ
---- अपने सपने कुछ समय तक लपेट दिये
उन नरम विशाल पंखो में ------------
----कहीं रख कर भूल गई अपने उत्तरदायित्व निभाने में --
अपने बच्चों को उनके पंखो को सहेज़नें में -----
-----अब वो उड़ना सीख गये ---पर मेरे पंख ही कहीं खो गये
जल्दी ही दूंढ लूंगी -----और अपना नीला आकाश भी
मैने कहा अपनी अंदर की आवाज़ से ----------
-------जो बार बार मुझे झकझोर रही थी ------

===========दिव्या =======================


सुनो !! जोगी तुम आओगे न


सुनो !! जोगी तुम आओगे न 

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रात भी चैन से सो गई -------
------और मै अधजगी अलसाई सी
मेरी आँखों मे ------नींद तिल मात्र भी नहीं
-------बस एक छबि घूम रही है
मेरे जोगी की -----------
-------जो सदा से अवचेतन मन मे है
मेरा जोगी!-सांवला सा ---- अधखुली सी आँखे-----
-------जिन में कभी प्रेम कभी वैराग्य
वो आयेगा अवश्य ---------
----चाहे जीवन के अंतिम पहर में ही
मेरा हाथ थाम ले जायेगा ------
----मुझे जाना ही है उसके साथ
---उस अद्भुत अलौकिक जगह
जन्मों से प्रतीक्षा है मुझे
---जन्मों तक रहेगी -----
मेरा जोगी जिसे कभी देखा नहीं
------तुम्हारे जैसा ही है न
कुछ कुछ ऐसी है --------
------तुम्हारी भी छबी मेरे मन में
तुम्हें भी तो कभी देखा नहीं ----------
------तुम्हारे साथ गुज़रा वो वक्त
वो पल हैं जिन्हें -----------
---------मन की अटारी पर
तुम्हारी यादों मे लपेट के----------
-------सहेज के रख दिया है
वो पल तो तुम दे ही गये हो -----------
---------साथ ही वो कुछ गीत भी
जो तुम्हें भी पसंद हैं ----------------
---------मै उन पलों को पास बिठा कर
जब सारे गीत सुनती हूँ न----------------
--------उन पलों मे साथ ही पाती हूँ तुम्हें
मुझे याद है तुमने कहा था -------------
--------उपरवाले ने सब के लिये
वक्त बाँट रखा है -------------
-------बस एक प्रश्न का जवाब दोगे ?
फिर कभी कुछ नहीं पूछेंगे-----------
---कहीं वो जोगी तुम ही तो नहीं ------
जो अवचेतन मन में सदा से है -----
-----अच्छा ये बताओ ------
-------------आओगे न मुझे लेने
याद रखना मेरे जोगी ------------
-----तुम्हारी प्रतीक्षा रहेगी--------
अंतिम पल तक मुझे --------------

=========दिव्या =================


हर दिन का बस एक पल मेरा हो .....


हर दिन का बस एक पल मेरा हो ---

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--------------- मुझे साल का एक दिन नहीं 
------हर दिन का बस एक पल ही देते रहना तुम सब ------------
माँ हूँ तुम्हारी मेरी जान तुम् में बसती है 
-------------मुझे पता है अब तुम सब बड़े हो गये हो
परिन्दे भी जब बसेरा बदलते हैं --------
-----तो पेड़ बहुत तन्हा हो जाता है ------
बच्चों से बड़ी तो कोई भी जागीर नहीं होती ----किसी माँ के लिये
पर मै ये भी जानती हूँ बहुत काम हैं तुम्हें ----पर क्या करूँ
-----मेरी जान तुममे बसती है ----माँ हूँ न --
तुमने कुछ खाया या नहीं --सोच कर ही
-----हाथ का निवाला गिर जाता है ---
लापरवाह हो न ---मै कैसे खा सकती हूँ बोलो ?
----तुम तो ड्राइव भी कितनी तेज करते हो ----
मै जब भी फोन करती हूँ ----जोर से हँसते हो
मम्मा मै बच्चा नहीं हूँ ----अच्छा अभी फोन करता हूँ
--------------फिर बिजी हो जाते --मै तो जानती हूँ तुम्हें ---
कभी तुम्हारा फोन न मिले तो ---तुम नहीं जानते
--------न जाने कितनी बार मर जाती है तेरी माँ ------
तेरी आवाज़ सुन कर जान मे जान आती है -----------
------रोज़ जब तक तू बिस्तर मे नहीं जाता --------
कहाँ सो पाती है माँ ----क्या करूँ दिल से मजबूर है तेरी माँ
----------मेरे लिये तो आज भी उतने ही बड़े हो तुम सब
जब पहली बार तुम्हें गोद उठाया था ---------------
------बस कुछ पल तेरे तेरी माँ की उम्र बढ़ा देते हैं --------
बस हर दिन के कुछ पल माँ के नाम करते रहना ----

==================दिव्या ==================== 

Friday, 11 May 2012

अजनबी लड़की की डायरी के कुछ पन्ने --------[1]


अजनबी लड़की की डायरी के कुछ पन्ने -------[ 1 ]

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कुछ कुछ समझदार हुई तो अक्सर ही यही सुना औरत को तो देवता भी नहीं समझ पाये मनुष्य का क्या ?-----------------
तब अजीब सा लगता था क्या कह रहे है--- और क्यों ??---लेकिन अब लगता है सही ही कहते थे------- कहाँ समझ पाते है ये हम औरतो को-------- कभी कभी बड़ी उथल पथल मचती है-------- मन में टीस सी उठती है पलट कर देखते है गुज़रे हुए दिन तो लगता है सच ही तो है बंद मुट्ठी से रेत की मानिंद फिसल गये ---और आज मुट्ठी खाली ---------------इक कब्रिस्तान ही तो बना लिया था------ हमने अपने दिल को--------- जिसमे गम और खुशी दोनों दफ़न कर दी थी----------- गम ज्यादा थे---- ..जब भी कोई कहता काश ऐसी किस्मत सब की हो------------ तो लगता इसका मुहं बंद कर दूँ --------क्यों श्राप देते हो अपनी बेटियों को------------ कभी सोने के ताबूत में भी खुशी मिली है ??-----खुशी तो सुनहरी धूप में चमकती गेहूं की बालियों भरे खेतों के बीच है जो सिर्फ दूर से ही दिखती है मुझे --------और दिल करता है दौड जाऊँ इनके बीच------------ ..मिट्टी की सोंधी सी खुशबू हजारों रूपये के सेंट से ज्यादा अच्छी होती है न ..
ऊँची हवेलियाँ जो दूर से बड़ी लुभावनी है सुनहरी है चमक दमक है बड़े बड़े कर्तव्य तो पुरे करने होते है---- और अधिकार?----- वो कहाँ रहे पता नहीं , अक्सर शाम को ऊँची हवेली की छत से डूबते सूरज को देखना और फिर गाँव में खेत से वापस आती हुई औरतों को ---- जो बहुत खुश नज़र आती थी ----- तो कभी मन में उनसे इर्ष्या भी होती थी----- काश हम भी इन्ही में से एक होते तो कितना अच्छा होता -----काश पढ़ पाता कोई मन को तो सब कुछ कितना अलग होता ----------------- लेकिन दिल का एक अछूता कोना भी था------ जिसमें ताला लगा था दरवाजे में शायेद जंग भी लग चुकी थी-------- अक्सर दस्तकें भी सुनाई देती----- लेकिन अनसुनी कर देता दिल------ कहता फिर इक पीड़ा नहीं अब नहीं ------अचानक न जाने कैसे वो जंग लगा दरवाज़ा भी खुल जाता है ------क्या पता इस दिल के कब्रिस्तान में फूल खिलेंगे ------ या फिर इक नई कब्र बना कर अहसास दफन होंगे ----------------------------------------------इक अजनबी लड़की कि डायरी से

==================दिव्या========================


इश्के मजाज़ी ----इश्के इलाही --जो मैने समझा --जितना मैने जाना

इश्के मजाज़ी ------इश्के इलाही ---जो मैने समझा --जितना मैने जाना

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प्रेम के इन ढाई अक्षरों मे पूरी जीवन यात्रा तय हो जाती है 
प्रेम को परमात्मा या परमात्मा को प्रेम वो ही कह सकते हैं 
जिन्होंने स्वयं को समघ्रता से कहीं समर्पित किया हो
खुदी को मिटा कर स्वयं के मिटने की हद तक प्रेम किया हो
जिसके अंतर मे सिर्फ प्रेम हो --फिर वो प्रेम दुःख दे या सुख
सब अच्छा लगता है क्यूं की वो इश्क के इलाही हो जाता है
और यही इश्के हकीकी की खूबसूरती भी है सब जानते हुये भी
इश्क और सिर्फ इश्क ---आत्मा और परमात्मा ---रूहों का नाता
इसी अवस्था को बुल्ले शाह ने कहा है --------------------------
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राँझा राँझा कर दी नी मै आपे राँझा होई
राँझा मै बिच मै रांझे विच होर ख्याल न कोई 

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महान सूफी संत'' सुल्तान बाहू''कहते हैं कि '' इश्क-ए - मजाज़ी ''
की सीढी के जरिये ही हम '' इश्क -ए-हकीकी ''तक पहुँच सकते हैं
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और हमारा भी यही मानना है जब तक किसी के अंदर निस्वार्थ प्रेम नहीं होगा
वो परमात्मा से प्रेम नहीं कर सकता --जब तक खुदा की कायनात
उसके बन्दों से प्यार न किया तो रब से प्यार कहाँ होगा ------
साईं बुल्ले शाह भी कुछ ऐसा ही कहते हैं --------
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जिचर न इश्क मजाज़ी लागे ,सुई सीवे न बिन धागे
इश्क मजाज़ी दाता है ,जिस पिच्छे मस्त हो जाता है ''
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अर्थात इश्के मजाज़ी इश्के हकीकी का जन्मदाता है
इश्क मजाज़ी के सुई धागे के बिना --इश्के हकीकी --
का जामा नहीं सिया जा सकता ----------
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और जब दुई का परदा उठता है तो सरमद जैसा संत भी कह उठता है
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[मुझमे समां जा इस तरह तन प्राण का जो तौर है
जिसमें न कोई कह सके मै और हूँ तू और है ]
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यही सच्चे इश्क की --इश्के हकीकी की परिणित है
ऊँचाई है खुदी(मै ) को खो कर उसमे समा गया
तब कुछ न रहा न नजदीकी न पड़ाव न मंजिल
न शरीर न आत्मा न प्रेम न प्यार न हद न बेहद
मै असल को पाकर उसके लोक का हकदार हो गया
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जितना मैने जाना समझा पढ़ा और थोड़ा अनुभव किया 

===============दिव्या ====================

Tuesday, 1 May 2012

कुछ अहसास ऐसे भी


कुछ अहसास ऐसे भी 

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अंजुरी मे भरे गंगाजल में
ज्यूँ चाँद का अक्स दिखा
झट अपनी रूह उसके हवाले की
इक वादा लिया चाँद से मीठा सा
तुम्हारी अमानत है तुम्हें सौंप दे
हवा ने सरगोशी की धीमे से कान में
तुम खुश हो ----बहुत खुश ----
अपनी पसंदीदा जगह पर ---
मै भी खुश हूँ मेरी रूह जो  तुम्हारे पास है न
कहीं भी रहो ---अहसास है काफी
यही हो --मेरे पास  हो --मेरे हो
रूहों का नाता है ----दूरी कहाँ इसमें 

==========दिव्या =============