Sunday, 29 July 2012

मुझे गर्व है मै औरत हूँ



Friday, 27 July 2012

हर पल तुम ही तो हो



न जाने कौन था वो अजनबी



Saturday, 21 July 2012

उधार लिये शब्द तुम्हारे लिये



उधार लिये शब्द तुम्हारे लिये 

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--- स्मृतियों को जिंदा रखने के लिये
खामोशियों से शब्द उधार ले कर
रोज़ रोज़ चंद लाइनें जमा करते हैं
और रख देते है उस संदूखची में
जिसे मेरे जाने के बाद ही
तुम ही खोलोगे और मैं
शून्य आकाश से देखूंगी
तुम्हारे चेहरे के भावों में
मुझे खोने की पीड़ा खोजूंगी
बहुत दूर हो गये हो तुम
पर मुझे नहीं लगता दूर हो तुम
पलकें आधी ही मुंदी होती है
कि तुम धीमे से फिरा जाते हो
अपना हाथ मेरे बालों पर
और मै आश्वस्त हो सो जाती हूं
कभी लगा ही नहीं ---------
तुम भूल भी सकते हो मुझे
बस वो गीत याद आ जाता है
वो कल भी पास पास था
वो आज भी करीब है ---मन भीग जाता है
आँखे इनको क्या कहें --आदत है इनकी
ये तो बस बरस ही पड़ती है
जब भी याद करती है तुम्हें
मन का क्या करूँ जिद्दी है न
कहता है क्या करूँ नहीं भूल पा रहा तुम्हें
हो सकता है प्राणों के साथ ही याद भी जाये
तभी तो सारी यादें समेट कर
सहेज कर सन्दूक मे रख रहे हैं
तुम संभाल लेना ---मेरे जाने के बाद
पल भर को सही --जब भी देखोगे
मुझे याद कर के तुम्हारे चेहरे पर
एक हल्की मुस्कान भी अगर तैर जायेगी
तो शून्य से तुम्हें निहारती
मै भी आश्वस्त हो जाउंगी
पल भर को ही सही तुम्हें भी
मुझ से -------प्रेम था 

-------------दिव्या -------------------


Wednesday, 11 July 2012

रात का मुसाफिर और एक तन्हा रूह


रात का मुसाफिर और एक तन्हा रूह 

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सांझे एकांत में जन्मी एक मित्रता 
रात का मुसाफिर और भटकी हुई रूह 
आवाज़ से आवाज़ का खूबसूरत नाता 
बरसों से बंद हर्दय के द्वार 
शब्दों की मोहक आहट से 
न जाने कब खुल गये 
और फिर जन्मी ---- 
सांझे  एकांत में एक मित्रता 
कुछ मास कुछ दिन कुछ पल 
में साँझा किये कुछ सुख दुःख 
और फिर -----न जाने क्या हुआ 
मुसाफिर राह भूल गया 
और रूह उदास ---
दोस्ती -सुख सम्बन्ध ,हर्ष ,,प्रेम 
और उसकी पीड़ा का अहसास 
जैसे एक आँसू बन पलक पर अटक गया --
मानो थम सा गया हो ---वो दर्द 
ठहरी हुई झील में मानो 
कोई पत्थर उछाल कर 
हलचल मचा गया हो 
मगर बस कुछ दिनों तक 
चिरस्थाई कहाँ होता है कुछ भी 
न सुख न ही दुःख ही -----
जिस व्यक्तित्व को अपनी कल्पनाओं की 
पवित्र श्रेष्टतम उंचाईयों पर बिठा देते हैं 
एक दिन वो मूर्ति भी भग्न हो ही  जाती है -न  
-  मुझे  अचानक झटका सा लगा 
 कौन  है  ये  कितनी  आसानी  से 
मेरे  ही  मन की  किताब  के  पन्ने 
पढ़  कर  मुझे  ही सुनाती  जा रही  है 
---अचानक वो चुप हो गई ---
जैसे कुछ कहते कहते रुक गई हो 
आवाज़ रुंध गई --बात अनकही रह गई 
मैने अपने चारों ओर देखा कोई न था 
हाँ वो रूह थी एक भटकती रूह ---
जो अपने सुख दुःख सारे पलों को 
पोटली में बाँध गुम हो गई अंधेरों में 
या मुझमें  ही  समाहित हो  गई 
--इन आँखों से जो लोग दिखाई देते हैं 
क्या उन्ही का अस्तित्व होता है ??
मैने यह सवाल खुद से किया 
और मेरी अन्तरात्मा ने कहा 
नहीं कुछ नाते देह से परे होते हैं 

--------------------दिव्या ---------------------
11-7-2012
पेंटिग गूगल से 

Tuesday, 10 July 2012

एक थी सुधा ---आखिर उसका कसूर क्या था


यह सत्य घटना है ---कथानक नहीं 

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एक थी सुधा ---आखिर उसका कसूर क्या था 

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बात बीस साल पहले की है इसी लखनऊ का केस है -----
-----मेरी बहुत खास दोस्त जो वकील है अक्सर मै उसके घर जाती रहती थी
- मुझे केस फ़ाइल पढ़ने में बहुत रूचि थी
------जब भी उसके पास जाती जरुर देखती ----
एक फ़ाइल उठाई ही थी अचानक वो बोल पड़ी
------अरे दिव्या देख ये तेरे ही शहर की लड़की थी
मायके का नाम सुना तो फ़ाइल छोड़ उसी से सारी बात पूछी
------बहुत अपसेट थी वो गुस्सा और दुःख दोनों भरा था
उसके मन में बोली ----कुछ नहीं कर पाई मै
---------मुझे पता था वो बहुत मजबूत है कुछ भी कर सकती है
वो कैसे ये बोल रही है ----जो कुछ भी वो बोली
------मै स्तब्ध सुनती गई ---गुस्से में बड़बड़ाती जा रही थी
कैसे बाप है वकील है भाई इंजीनियर एक भाई वकील
------और बेटी को मरने को छोड़ दिया
इसी लखनऊ शहर में शादी हुई थी सुधा की
-------बिजनेस था ससुराल वालों का कपड़े का
बहुत परेशान करते थे उसे --एक बेटा भी था साल भर का
-------मायके भेज दिया था उसे ---कुछ महीनों बाद
लखनऊ में ही तलाक का केस दर्ज हुआ
-----ये केस मेरी दोस्त के पास आया
फाइनल डेट के दिन ---जज ने पति पत्नी दोनों को बुलाया
------और एकांत में आखिरी बार बात करने को कहा
तलाक फाइनल हो चुका था ---पर न जाने क्या कहा उस आदमी ने
-------सुधा ने तलाक का केस वापस ले लिया
और वापस ससुराल चली गई -----बाप भाई गुस्से में वापस हो गये
-----यहाँ तक तो बात ठीक थी ---उसके बाद का किस्सा सुन कर
मेरा रोम रोम सिहर उठा न जाने कितनी रात न सो पाई मै
-----पता चला उसके बेटे का मोह दिला कर ले गये थे वो लोग
और वो बावली नहीं जानती थी उसकी नियति क्या थी
-----उसे ले जाकर उन राक्षसों ने ऊपर छत पर टिन की छत के नीचे
पैरों मे कुत्ते की जंजीर बाँध कर रखा था ----जाड़े गर्मी बरसात सब वही
----पहनने को सिर्फ दो कपड़े --पेटीकोट और ब्लाउज -जाड़े में फटी चादर -----खाने को चौबीस घंटे में सिर्फ सूखी एक या दो रोटी --
---दो ग्लास पानी ---लगभग साल भर ही बीता
वह हड्डियों का ढांचा भर रह गई बस - अठारह बीस किलो का वज़न
-----और एक दिन मुक्त हो गई इस यंत्रणा से ---
पैसे के बल पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बनी
---उसे टीबी का रोगी दिखा दिया गया ---थाने में पैसा भर दिया
फोन गया मायके ---बाप भाई आये फिर मेरी मित्र के पास
-------वो बिफर पड़ी और भगा दिया --उसका दाहसंस्कार भी हो गया था
पुलिस प्रशासन कोई नहीं सुन रहा था ---पैसे से मुहँ बंद था
-------मैने अपनी मित्र से पूछा भी बीच में उसकी कोई खबर नहीं मिली
उसने बताया बहुत रोका था उसनें उस समय --वो नहीं मानी थी
---पर उसके इस कदम के बाद मायके वालों ने भी उसे छोड़ दिया था
उसकी बड़ी बहन जो यहाँ इसी शहर में है और सम्पन्न है
------उसे उसकी हालत की खबर रहती थी उसने उसे नहीं बचाया
सुन कर बहुत रोई थी तब मै - कितनी रातें सो नहीं पाती थी सोच कर
---कितनी भूख लगती होगी उसको --जाड़ा गर्मी कैसे सहा होगा
आखिर क्या कसूर था उसका ---उसका सीधा और सरल होना
-----या माँ होना ---सुना था उसका बेटा उसे बहुत गिडगिडाने पर
दूर से ही दिखाया जाता था ---बस इसी लालच में
---तिल तिल कर मरना स्वीकार किया --बेटे को देखती रहेगी
उफ़ आज भी सोच कर आत्मा काँप उठती है ----
-----सोचती हूं पहले ज़रा भी पता होता तो
शायेद कुछ कर पाते ------इस घटना के बाद मै आजतक
---उस की बड़ी बहन से नहीं मिली उसकी शक्ल भी नहीं देखी
---आखिर क्या गुनाह था उसका ---उसका जरूरत से ज्यादा सीधापन
या उसके पति सास ससुर की लालच---
बचपन से जानती थी उसको ---आज उसका बेटा बाईस चौबीस साल होगा
-----न जाने कहाँ होगा पर माँ को याद तो करता होगा
ईश्वर से प्राथना है कभी एक बार मिले तो बताऊँ
----तेरे बाप ने दादी बाबा ने किस तरह मारा तेरी माँ को
और नाना नानी मामा मासी सब ही हत्यारे है तेरी माँ के
----ये समाज भी --काश मै कुछ कर पाती उस समय
पर पता ही न चला ----------------------------
ये कहानी नहीं है सत्य घटना है जो कभी नहीं भूलती
उसके अपने शहर वाले जहाँ उसका बचपन बीता नहीं जानते सत्य
वह तो बस यही जानते होंगे वो बीमारी से मर गई
मै भी कहाँ जान पाती सच अगर मेरी दोस्त ही उसकी वकील न होती
उसे जानती थी --सालों से मिली नहीं थी
पर उसका धुंधला सा अक्स याद आया था तब भी और अब भी
बहुत पीड़ा हुई थी ----जब पता चला वो ही चल बसी थी
आप सब से कहना चाहती थी कब से पर शब्द नहीं मिल रहे थे
आज लिख ही दिया ---
क्या कहेंगे ऐसे मायके को ऐसे ससुराल को -----

------------------------दिव्या -------------------


Thursday, 5 July 2012

कैसे बताऊँ तुम्हें



कैसे बताऊँ तुम्हें 

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---कैसा लगता है
फिसलती हुई गर्म चट्टानों पर
------नंगे पाँव चढ़नें की कोशिश
पिंडलियों तक चढ़ी सलवार
------टूटी चप्पलें ---हर कदम पर
बार बार फिसलने से ------
----- चोटिल हुये घुटने
पैरों की एड़ियों में चुभे कंकर
------छिले हुये घुटनों पर
ठंडी फूंक मारते हुये
--------धीमे धीमे दर्द को पीना
सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच कर भी
-----गाएब हो जाना उस साये का
जो नीचे से तुम जैसा दिखता था
-------कैसे बताऊँ तुमको कैसा लगता है
जब मेरे ख़्वाब अक्सर
-------पलकों को छूते ही बिखर जाते है
क्या तुम जानते हो ?----
------डूबते सूरज की लाल आँखों को
महसूस किया है मैने अपनी आँखों पर
-------टूटते सपनों के साथ --
कभी देखा है नीला चाँद --नहीं न
------मैने देखा है इधर कई महीनों से
पता है जब दिल में दर्द उठता है
-------तो चाँद नीला पड़ जाता है
तुम नहीं समझोगे ----अगर समझना है तो
---कभी सूरज की बंद होती आँखों पर
अपनी आँखे रख कर मेरा दर्द
----और चाँद की धीमे धीमे खुलती आँखों में
मुझे महसूस कर के देखना ------

-------------------दिव्या  -------------------

पेंटिग अज्ञात कलाकार की
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Tuesday, 3 July 2012

ये पन्ने ........सारे मेरे अपने -: सुनो ! मै गांधारी नहीं हूँ ================सदियाँ ...

ये पन्ने ........सारे मेरे अपने -: सुनो ! मै गांधारी नहीं हूँ ================सदियाँ ...: सुनो ! मै गांधारी नहीं हूँ  ================ सदियाँ गुज़र गई समय बदल गया पर तुम्हारी अपेक्षा वही रही कहा न मै गांधारी नहीं ...