Saturday, 25 August 2012

तुम ने मुझसे कहा -----


तुम ने मुझ से कहा
-----------------------
कभी किन्ही मधुर पलों में
तुमने मुझसे कहा
चंदन की गंध क्यूँ फूटती है
तुम्हारी चंदनवर्णी देह से
खिलखिला कर मै -----
जोर से हंस बैठी --और बोली
मुझे चंदन बहुत प्रिय है न
उसे आत्मसात कर लिया मैने
कुछ वैसे ही जैसे तुम्हे -एवं
तुम्हारे अस्तित्व को --भी
- जो -मुझमें ही विलीन है
और ये ही सत्य है ------
जिसे अंतस से चाहो
वह आत्मसात हो ही जाता है
-----------दिव्या ------------------

एक कहानी छोटी सी --एक रिश्ता मासूम सा


एक रिश्ता मासूम सा
-----------------------------
एक कहानी छोटी सी
------------------------------
जिंदगी गुजरती रही
कई फाइलों को
मिला कर तैयार होता रहा
एक दस्तावेज़ -------
आज फिर अतीत की
फ़ाइल उठाई ही थी
के हवा के झोंके से
सारे पन्ने फड़फड़ाते हुए
उड़ने लगे बिखर गए
मेरे चारो तरफ ----
याद आई इक लड़की
बालों की कस कर बाँधी हुई
दो मोटी चोटी----- --
हरदम इक नई शरारत से भरी
गुलाबी धूप हल्की हल्की
सी आने ही लगी थी उम्र के आँगन में
पूरी की पूरी मुहब्बत से गुंधी मिट्टी से बनी थी
पर मुहब्बत का मतलब ही नहीं जानती थी वो
पास ही रहता वह भी कुछ एक साल बड़ा था
हरदम चिढाता रहता ---उसे
खूब झगडती वह -----
-उसे बनमानुष का नाम दिया था
और वह खूब हसंता ----पर -ध्यान भी रखता
हर काम कर देता उसका ------
कभी कभी बेख्याली में --
उसे एकटक देखता रहता
और वह जोर से हँस कर कहती
क्या कभी आदमी नहीं देखा
जंगल से आये हो क्या बनमानुष ?
उस नजर को पढना उसे आता ही कहाँ था
शादी भी पक्की हुई तो दौड़ कर
उसे बताया ---सुनो अब क्या करोगे
मै जा रही हूँ किसे चिढ़ाओगे
किसे घूरोगे तुम बनमानुष --
अब तो मै जा रही हूँ ---
उसकी आखें भीगी देख
पूछ बैठी क्या हुआ ---
मेरा पेन खो गया --बोला वह
अरे इत्ती सी बात तुम मेरा ले लो न
और वह देखता ही रहा उसे --
जाने की घड़ी आ ही गई --
विदा की कठिन बेला ---
--जाते जाते उसने देखा --
वह खड़ा था --अचानक वह बोल पड़ी
जा रही हूँ ----आंसू ढलक गए उन दो आँखों से
बोला मेरी एक बात मानोगी ---बोलो
हाँ बोलो ---न ------
अपना चेहरा मुझे दे जाओ --बस
वो पगली रोते रोते हंस पड़ी
बोली अरे पागल हो क्या तुम
मर जाउंगी मै तो ------
और वह चली गई ससुराल ----
खड़ा रहा वह क्या समझाता उसे
कमअक्ल जो थी न ------
--रिश्तो को जब समझा तो
समझ में आया उस नजर का मतलब
और मन भीग गया उसका ----
---पर वह तो उसका दोस्त था
इससे ज्यादा तो वह तब समझती भी नहीं थी
--अचानक खिड़की से तेज़ हवा आई
पन्ने उड़ने लगे ---आज फिर उन को
समेट सहेज कर --दस्तावेज़ में बंद कर रही है
और याद आ रहीं है दो भीगी आँखे
एकटक देखती हुई -----उसके चेहरे को
------------------------दिव्या -------------------------------------

आखँन की पुतरी अहयं हमार बिटियन


आंखन की पुतरी हैं हमार बिटिया
----------------------------------------------
आज फिर हुई झमाझम बरसात
देर तक रिमझिम रिमझिम भी
अभी भी टिप टिप हो रही हैं ----
पेड़ पौधे कितने खुश लग रहे हैं
घर के सामने बैठा शेरू भी पूंछ हिला हिला कर
अपनी ख़ुशी मुझ पर जाहिर कर गया ---
गो वंश के प्रतिनिधि नंदी महाराज भी
प्रसन्न दिख रहे है अपनी भावभंगिमा से
मेरा मन कर रहा है यूँ ही बरसती रहो
बरखा रानी ---फिर अचानक ध्यान आया
अरे रेल की पटरी के किनारे बनी
उन झुग्गी बस्ती में क्या गत होगी ---
उनकी छत से जो टिप टिप टपकती होगी
पारबती --और त्रिभुवन की ---
पाई पाई जोड़ी गृहस्थी का क्या होगा
किसी के घर से लाया पुराना टीवी - -तीन टांग के स्टूल पर सजा है ----
अँधेरा होते ही कटिया फसा कर चलाता है
शन्नो , मुन्नी ,सोना का बापू ---
अँधेरे मे बिजली वाले पकड़ने नहीं आते न
ठेला खींच कर थका हारा त्रिभुवन घर आता
पांच छह घरों से बासन चौका कर पारबती भी
अन्हियार होत होत लौट आती --
छोड़ दिया कई घर ---का करे मन हमेसा
डरा रहत है --तीन बिटिया जवन घरे पर अहें
आग लगे ई ज़माने को --आदमी पिशाच होई गए
आज उ बड़े बंगले वाली भाभी जी समझा रही रहिन
पारबती अपनी बेटियों का धयान रखा करो --अकेले न छोड़ना
जोर से हंस दी थी वह अरे भाभी अबय बहुत छोट है
खेलय कूदेय के इहे त उमिर --फिर त हमरी तरह
नोन तेल म खटीहयं ---आज जवन कछु बताईन
सन्न रहि गई वह सुन कर ---नन्ही बच्ची को
मार के फेंक दिहिन बेईज्जती कीन ऊ अलग
राक्षस हुई गय का लोग -----
तीनो बिटिया सोई गई त देर रात तक
करवट बदलत रही ------अचानक आँख खुल गई
बगल में थक कर सोये पति की --पूछ बैठा
का रे काहे उलटत पलटत है ?---कवन चिंता है ?
उठ के बैठ गई परबतिया ---पति को देखती रही
बोली --सन्नो के बाबू का गलती किये हम
बिटियन का जनम दई के --जवन सुना आज
करेजा कांपी गय ----ऊ दिन याद करा जब
ई तीनो जनमी तुम हम कितने खुस रहिन
बेटवा चाहि त रहा एक पारिवार पूरा हुई जात
मुला तीन देबी जनमी माता रानी का परसाद माने इनका
और सर माथे पर लिहिन ---का गलती किहिन
नहीं ऐसा काहे कहत है रे ---हमार बिटियन का
कुछु न होई ---ढाढस तो बंधा गया
पर नींद गाएब हो गई ----चिंता में
रात भर करवट बदलता रहा --बोलता रहा
हम अपनी बिटियन को खूब पढ़ाएंगे
आखन की पुतरी की नाय संभारेंगे
रहि बात और लोगन की त
हे परमेस्वर इन सब का सद्बुद्धि देव---
---------------दिव्या -----------------------------

Tuesday, 14 August 2012

सपनों के दस्तावेज़

सपनों के दस्तावेज़
-------------------------------
वक्त करवट बदलता रहा
न जाने कब कैसे
करवट दर करवट
सरकती गई जिंदगी हाथ से
सुबह ---दोपहर ---और फिर शाम
उगते चढ़ते और ढलते --
सुख और दुःख के बीच
जिंदगी हमें घसीटती रही
समय कब धीरे धीरे आया
और अपनी छाप छोड़
कब सधे पैरों से चला गया
पता ही न चला -----
गुजरी जिंदगी की --
कड़वी खट्टी मीठी यादें
ज़हेन में कैद होती रहीं
एक दस्तावेज़ तैयार हुआ
छुई अनछुई यादों से भरा
हर औरत के मन का
एक ऐसा कोना भी होता है
जहाँ उसकी अपनी मर्ज़ी चलती है
वहां वो ही जा सकता है
जिसे वह इजाजत देती है
अनछुआ कोना मंदिर सा पावन
जहाँ देह धर्म की जरूरत नहीं होती
न जाने कब कैसे कोई वहां
प्रवेश कर लेता है ----और तब
जीवन के पतझड़ में बसंत के फूल खिल उठते हैं
पर ऋतुयें भी तो आती जाती हैं
जाते जाते कुछ निशान छोड़ जाती है
रात के इस अंधकार में
मेरे साथ बतिया रहा था
आसमान से चाँद ---
जो मेरी वेदना से पीला पड़ गया
अचानक मुझसे बोला ---सुनो !
कितनी अजीब सी बात है न
देखो तो कोई साथ रह कर भी
हमेशा अजनबी ही रहा ---
और कोई दूर हो कर भी
कभी तुमसे जुदा नहीं है ---
मुस्करा कर चाँद बोला
अब चलूं पौ फटने वाली है
फिर मिलेंगे -------
--------------दिव्या -------------------