Wednesday, 26 September 2012

सुनो माँ ! मुझे नहीं बनना अच्छी लड़की


सुनो माँ ! मुझे नहीं बनना अच्छी लड़की
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उफ़ दीदी तुम भी हरदम
माँ की तरह पीछे ही पड़ जाती हो
ये न करो वो न करो
ज़रा सा आईने सामने खड़े देखा
बस इनकी बकबक शुरू
चलो अपना काम करो अब --
भले घर की लड़कियाँ
हमेशा आइना नहीं देखती
अच्छा तुम ही बताओ क्या
अच्छी लडकियां अपने बाल
कुएं में झाँक कर बनाती हैं
अच्छी लड़कियां ठहाके नहीं लगाती
धीमे हंसो --यूँ भाग कर न चलो
बाल खुले न रखो दो चोटियाँ बनाओ
दुप्पटा फैला कर ओढ़ा करो ---
अब बड़ी हो गई हो तुम --
छत पर मत खड़ी हुआ करो
हद हो गई अगर इतनी बंदिशें -हैं ---
तो मुझे अच्छा नहीं बनाना
--अजीब हो दीदी तुम भी न
जब तुम और भाभी गुपचुप बतियाती हो
तब मुझे भगा देती हो --जाओ यहाँ से
छोटी हो अभी पढो जा के ---
बड़ों की बातें नहीं सुनते --
अब बता ही दो मै क्या करूँ
माँ वो भी बदल गई है
कितना चिल्लाई थी मुझ पे
ऊंट जैसी लंबी हो गई
कब अक्ल आयेगी इसे --
जरा सा गाना ही तो गा रही थी
बारिश में भीग के ----
भाई को भी कोई कुछ नहीं कहता
माँ कहती है वो लड़का है
तुम उसकी बराबरी न करो
तुम्हे दुसरे घर जाना है --पर दीदी
हम क्यूँ न करें भाई की बराबरी
तुम्हे भी तो बुरा लगा होगा जब
माँ ने तुम से भी यही कहा था न
जब तुम इस उम्र से गुजरी थीं
फिर तुम क्यूँ करती हो ऐसा दीदी
मुझे नहीं बनना अब इतनी अच्छी लड़की
----------------दिव्या --------------------------

Tuesday, 18 September 2012

और खाईयां ---गहरी ---होती ही गईं


और खाइयां ---गहरी ---होती ही गई
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रानीखेत की सुरम्य पहाड़ियां
वो दोनों घुमने आये थे शादी के बाद
डाक बंगले के पास ही तो था
लकड़ी का वो खुबसुरत काटेज

बस एक चौकीदार ही था वहां
दोनों घुमने निकलते पर
ऊँची नीचे उबड़ खाबड़ रास्तों पर
उछलती कूदती भागती वो
कभी रास्ते से चिकने पत्थर उठाती
कभी चीड़ के सूखे फल ---
और उन्हें अपने बैग में संभाल के
रख लेती -----वो देखता रहता
गुस्से में सर झटकता --
वो हवाओं को बाहों में भरती
पर वह उसकी बांह पकड़ना चाहता
तो जोर से खिलखिला कर हंस देती
क्या है चलो तुम भी पकड़ो न बादल
आखिर कार खीझ के वो कमरे में
जा के सो जाता ---वो पगली थी
न जान पाई ये ठंडे गीले बादल
रिश्तों में सीलन लाते जा रहे हैं
उस वक्त तो उसको कभी कभी
अपना सबसे बड़ा दुश्मन लगता
एक बार तो रूठ कर वो
चुपचाप खाईं में कूदने गई भी
नीचे झाँक कर देख रही थी
कूद भी जाती जिद्दी थी न
पर अचानक बीच में बादल आ गए
घाटी से ऊपर की ओर उठते हुए
मानो उसे प्यार से लिपटा रहें हों
और वो भूल गई भाग कर आई
और बांह पकड़ कर खींचते हुए
उसे ले जाने लगी चलो देखो न
कितना सुंदर है सब ---वो न गया
झटक दिया उसे झिड़का भी
वो उदास हो गई आ गई
वापस वहीँ उसी जगह
जहाँ देर रात तक वो
चाँद तारो से बात करती थी
पहाड़ों पर ये और भी करीब
आ जाते हैं न फिर उसकी तो
जान ही बसती थी इनमें
वो कुदरत की बेटी थी न
उसे नहीं आता था तब इन
रिश्तों को संभालना ---
खूब रोई वह और रूठ कर
सो गई नीचे जमीन पर
सिकुड़ मुकुड़ कर घुटने मोड़ के
सारे शाल ओढ़ लिए थे उसने
सुबह सुबह उठी ही थी कि
दरवाज़े पर दस्तक हुई
शायेद बाबा चाय लाये थे
उसकी पीठ थी दरवाज़े की तरफ
जोर से चीख उठे बाबा रानी बिटिया
बस खड़ी रहना मै अभी आया हिलना न बच्चा
चिमटा ले कर बाबा आये फिर दिखाया
वो बालिश्त भर का काला पहाड़ी बिच्छू
जो रात भर उसकी पीठ से चिपक क़र सोया था
कहते है पहाड़ी बिच्छू बड़े ज़हरीले होते है
अगर काट ले या डंक मार दे
मर भी जाते है लोग ------
वो कुदरत की बेटी थी न
उसे क्या होना था ---पर यहीं से तो शुरू हुई
खाईं गहरी होना ---वो उसे नहीं समझा
और वह रिश्तों की गंभीरता को न समझ पाई तब
उसे तो तब वह दुनिया का सबसे बुरा इंसान लगा था
जब वो उसका खजाना चिकने पत्थर चीड़ के फूल
सब खाई में फेंक कर --जोर से हंसा था
लौटते हुए रास्ते भर रोती आई ---घर आते ही
पापा से कहा नहीं रहना मुझे इस चंगेज़ खान के घर
बस 15/16 साल ही की तो थी वो --पर वो तो मेच्योर था
वो क्यों नहीं समझा उसे --गीली मिट्टी ही तो थी
ढाल लेता अपनी मूरत जैसे चाहता --पर शायेद अहम भी था
पुरुष का ---इसी अहम और बचपने ने बना दी
कभी न पटने वाली खाई --वो भी सुरम्य वादियों में
एक बार जायेगी वो हर उस जगह ---कुछ ढूढने
शायेद अपना बचपन अपनी मासूमियत --
जिसका बड़ा हिस्सा वो वहीँ छोड़ आई थी
--------------------------दिव्या----------------------------------------

Sunday, 9 September 2012

वो सारे पृष्ठ पलट दिए



अब थोड़ा सुकून है



Tuesday, 4 September 2012

मै तो सजन --आ ही रही थी



Saturday, 1 September 2012

हाँ --मैने उसे मार दिया !