Friday, 26 October 2012

कितनी ही सलीबें बना लो -------


कितनी ही सलीबें बना लो 
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वो सारे द्वार बंद हैं अब 
आशंका भी थी जिधर से 
तुम्हारे आने की ------
ताला जड के फेंक दी 
चाभी किसी अंधकूप में 
फिर क्यों बार बार 
खटखटाते हो तुम 
और खीझ कर ---- 
घर के निकास द्वार पर 
एक कंटीली नागफनी 
बो जाते हो हर बार 
मुझे कैद करने की मंशा से 
बेबस हो कर फेंकते हो 
जहरीली बेलों के बीज 
खिड़की के पल्लों की झिरी से 
जो बढ़ कर लिपट जाती है 
मेरे पूरे वज़ूद को जकड़ लेती हैं --
क्या तुम जानते हो 
अब इन विष बेलों के धीमे धीमे 
रिसते विष ने प्रवेश कर ही लिया 
मेरे पूरे अस्तित्व में 
और बना ही दिया 
मुझे विषकन्या -------
अपने अहम की पराजय 
से आहत हो तुम 
कितनी ही सलीबें बना लो 
पर मुझे नहीं लटका पाओगे 
क्यूंकि तुम नहीं जानते 
मै स्वयंसिद्धा हूँ ------
--------------दिव्या ----------------------

Wednesday, 10 October 2012

पलाश के ये दहकते लाल फूल ---मेरे जैसे


सोच रही हूँ अब ----
पतझर के सारे सूखे पत्ते
अपने मन आंगन से
बुहार कर फेंक दूं
जंगल से पलाश के
कुछ फूल लाकर
सारा घर सज़ा दूं
कांटो से घिरे ---
आग से दहकते
पलाश के लाल फूल
पता है तुम्हे ?
मुझे क्यूँ इतना भाते हैं
क्यूँ की ये कुछ कुछ
मेरी ही तरह हैं
--------दिव्या -----------------

Tuesday, 9 October 2012

वो मौन था ------


वो मौन था परन्तु ----
बोल रहा था उसका मौन
खीझ भी रहा था -और मैं
प्रस्तर प्रतिमा की भांति
खड़ी प्रयास कर रही थी
मौन की भाषा पढने की

आखिर वो बोल ही पड़ा
क्या तुम नहीं जानती
प्रेम है मुझे तुमसे --
परन्तु मै कह नहीं पाता
पता है कह देने से
वो बात कहाँ रह जाती है
तुम क्यूँ नहीं समझती
ये झुंझलाहट भी तो एक तरीका है
प्यार जताने का -------
वो भी बड़े हक़ से --------
-------------दिव्या ---------------------