Sunday, 30 December 2012

-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए ---दामिनी


-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए
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-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए
एक वादा चाहिए तुम सब से
दुनिया की हर बेटी में मुझे देखना
मेरी पीड़ा मत भूलना --याद रखना जिंदा हूँ मै
क्या मै विश्वास करूँ ?नहीं भूलोगे तुम सब
सिर्फ बातें और नारे बन कर न रह जाऊं मै
हर बेटी में मेरा ही अंश देखना ---देखोगे न
उन बारह दिनों का संघर्ष --सार्थक होगा
फिर किसी दामिनी को श्रधांजली न देनी पड़े
मै झकझोर के जगा रही हूँ तुम सब का ज़मीर -------दामिनी
-----------------DIVYA--------------------------------
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Thus spake DAMINI ---
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Its your Promise i want, Not your Tribute;
Identify me in Every single daughter of the world and don't stand Mute;

Never to forget my pain,
Im still Alive and didn't die in vain;

Can i be assured that i wont be buried in oblivion?
Mentioned in Gossips and Used in Slogans?

I'm in every Girl , every woman,
Those 12 days, moments of agony, struggle and torment;

Never again any Damini is robbed of her Innocence,
Gather-up, Wakeup and Man-up... Shakeup your conscience and Rise with Vengeance.------DAMINI
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Krishn translated this:

post ---29-12-2012  पेंटिंग गूगल से  साभार 

झकझोर रही सोये हुए लोगों को








झकझोर रही सोये हुए लोगों को
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माघ की सन्नाटे भरी सर्द रात में
धुंध की मोटी परत को चीरती हुई
गूंज रहीं है कुछ दर्द भरी सिसकियाँ
तीर की तरह बेध रही है ह्रदय को -
घने कोहरे का लबादा ओढ़े हुए
इक रूह भटकती फिर रही हैं -
वेदना के प्रतीक स्वरूप
दस्तक देती फिर रही है
झकझोर रही सोये हुए
कुंठित लोगों की अंतरात्मा
तथाकथित न्यायाधीशों को
हर उस बेटी का प्रतीक है वो
जो न्याय की आस लिए खड़ी है
----------दिव्या --------------------

24-12-2012

Saturday, 22 December 2012

क्या अब भी मौन रहोगी ? -------



पेंटिग  गूगल  से  साभार 


--जीवन की पगडंडियों पे भटकती बिटोही -- ----



Wednesday, 12 December 2012

कहाँ गए होंगे वो ----जो यहाँ सोये हैं


कहाँ गए होंगे वो ----जो यहाँ सोये हैं
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हर बेटी की तरह पिता के बहुत नजदीक रही
--------इसी माह में उनका जन्मदिन भी होता है
और इसी महीने में वो हमें सदा के लिए छोड़ गए थे
--------------- उनके जाने के बाद उन्हें
इलाहाबाद गंगा किनारे रसूलाबाद घाट पे ले
जाया गया -------/ जैसा की बंदिशे है लड़कियाँ औरतें
श्मशान नहीं जाती मुझे भी नहीं जाने दिया उनके साथ
--------उनकी अंतिम यात्रा में पर न जाने क्यूँ मन में
----------एक अजीब सी इच्छा थी वहां जरुर जाना है
उस जगह -------जहाँ आखिरी बार उनका शरीर था
फिर तो वह राख में बदल गया------ गंगा तट की वो जगह
भी जहाँ वो राख -----जो कभी मेरे पापा का वजूद था
बहाई गई बस छूना चाहती थी-------- वो जल जिसमे वो
मिल गए वो मिटटी जहाँ उनकी राख थी ---साथ ही
उस को भी जो इस दुनिया से जाने वाले हर मनुष्य का
वहां स्वागत करता है / बहुत डांट खाई पर आखिर गए
हम वहां उसी जगह उस मिटटी को छुआ भी मुझे पता था
इतने समय बाद तो न जाने कितने शरीर भस्म हुए होंगे यहाँ
पर न जाने क्यूँ मन में पिता का हाथ थामने जैसी ही अनुभूति लगी
नाव में बैठ गंगा में उसी जगह गए जहाँ से माँ गंगा उन्हें अपने
साथ ले गई थी पानी कमर से ऊपर था फिर भी उतर कर खड़े रहे
पिता से लिपटने का अहसास लिए / और उन्हें भी देखा जो श्मशान के
मेज़बान रहे उस समय / वो एक औरत थी सुना था पापा को देख
बस यही बोली अच्छा आप भी आ गए मंत्री जी ...--लोग उन्हें
महाराजिन बुआ के नाम से पुकारते थे ... अब नहीं रही पर मुझे नहीं
भूलती वह क्यूंकि मेरे पिता का अंतिम प्रयाण उन्ही के हाथों हुआ था ----
शमशान में बैठना वहां की शान्ति जिससे न जाने क्यों अधिकाँश लोग
भयभीत होते है ..मुझे अजीब सी शान्ति देती है मन के कुछ बोझ अगर
वहां उतरते है तो बहुत कुछ मिलता भी है जो बता नहीं सकते-------------
अक्सर वहां जाते भी है पर सबसे छुपा के --- ---------
एक नाम भी मिला अच्छा भी लगा ये अघोरन है या बंजारन ---
हमारे मसूरी वाले घर के बिलकुल पास कैमिल्स बैक रोड पे
एक ग्रेव यार्ड है अंग्रेजो के जमाने का --वहां बहुत खुबसुरत
कब्रें बनी है उन पर लिखी इबारतें पढना कभी कभी
अकेले वहां अकेले बैठना --भी एक अलग अनुभव एक
असीम शान्ति मिलती है अक्सर वहां बैठ कर उन्ही से
सवाल करती आप लोग तो यहाँ सोये हो फिर कौन है
जो चला गया ----------
------------------------दिव्या ------------------------------