Tuesday, 24 December 2013

समंदर सी गहरी आँखे और धूप सी हंसी

समंदर सी गहरी आँखे और धूप सी हंसी

--------------------------------------------

सुनो ! ठंड शुरू हो गई न ? अब धूप भाने लगी है

अखबार से नज़र हटा के ऐनक के पीछे से घूर कर देखा

और फिर पढ़ने लगे -- सुनो चलो कहीं दूर चले

थक गई मै अब --चलो न

बरसों से यूँ लावारिस पड़े हैं जो

वो अधूरे सपने बुनने है हमें -

कुछ तुम्हारी खुली आँखो में आज भी दीखते हैं

जब कभी तुम एकांत में सुदूर छितिज में ताकते हो

कुछ वह भी जो मेरी उनीदीं बोझिल पलकों से झरते हैं

रोज ही भोर में ये उन ख्यालों के सुनहरे रेशमी टुकड़े हैं

जो तुम्हारे लिए कभी संजोये थे पर अधूरे रहे

अब तो इन सुनहरे रेशमी टुकड़ों से बंट कर

ख्वाबों और ख्यालों की गुनगुनी चादर

बुननी ही है न चलो अब पूरी कर लें फिर से जी लें

कुछ अपने पल नितांत अपने निजपल

वो बची खुची जरुरी बातें जो हम कह न पाए

कुछ तो तुम ने भी मन में दबा कर रखा ही होगा

देखो अब कह सुन ले जी लें अहसासों को

ओढ़ ही अपने अधूरे सपनों का दुशाला

जिंदगी के सब काम तो लगभग निभा दिए

पर इन्हें निभाते हुए भूल गए हम खुद को

सर्द हो कर जम गये वो सारे जज्बात

पथरीली हो गई भावना जो दूब सी उगी ही थी

जिनमे कभी उग रहे थे नरम मुलायम सपने

खिलखिलाती धूप सी हंसी वाली किशोरी लड़की थी

बड़ी बड़ी काली समन्दर सी गहरी आँखों वाला

सांवला सा लड़का -जो बस देखता रहता एकटक उसे

और वह बोलती जाती बोलती जाती -अचानक

वो मुस्करा कर कहता - कितना बोलती हो तुम

बस हो गया अब कभी नहीं बोलूंगी तुमसे

वह तुनक जाती और मुंह फुला कर बैठ जाती

अरे सुनो मै छूना चाहता हूँ तेरी धूप सी हंसी को

उफ़ हे भगवान और खिलखिला कर हंस देती

अरे मैने तो सुनहरी धूप मांगी और तुने तो

चारों तरफ सितारे बिखेर दिये --अब क्या करूँ

बोलो कैसे समेटूं इन्हें --मै क्या जानू तुम जानो

कह वो भाग जाती -- उन गहरी काली आँखों को

अपनी आँखों में छुपा कर --और वह बस मुस्कुरा देता

आज फिर न जाने क्यों वो दोनों याद आये

अब तो हंसी की सुनहरी धूप उसे चुभने लगी थी -

उसकी काली गहरी आँखे बात बेबात घूरने लगी थी

न जाने क्यूँ समय की आपाधापी में नरमी कहीं खो गई

रह गया खुरदुरा वक्त --पथरीली राहे पार हो गई

माना जीवन जीना सहल नहीं --पर अब हो गया न

टुकड़ों में बचे पल सहेज ले --पर एक बात कहूँ

तुम्हारी काली गहरी आँखे ऐनक के पीछे से

और भी बड़ी लगने लगी है -ऐ सुनो अब घूरो मत

और खिलखिला कर हंस दी --पल भर को सब भूल गए

सुनो तुम अभी हंसी न तो लगा मै बरसोँ पीछे चला गया

सुनो आज की धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी है न --

तुम्हारी भी मुस्कान जो मिल गई इसमें मैने कहा

ऐनक खिसका कर कैसे देखा तुमने उफ़ हद हो गई

तुम भी न --कब बड़े होगे अब तो बच्चे भी बड़े हो गए

सुनो ऐसे मत देखो तुम मुझे ----

और एक जोरदार ठहाका गूंजा क्यूँ क्या हुआ

मै तो देखूंगा-कोई चोरी थोड़ी है -अब लो फिर नाराज़ हो गई

सुन ऐ मेरी जोहराजबीं तू अभी तक हसीन -और मै जवान

तुझ पे कुर्बान मेरी जान मेरी जान -

अरे अरे क्या कर रहे हो -चुप भी रहो अब

उफ़ कुछ तो शर्म करो -- 

देखो न सब देख कर मुस्करा रहे है --

और फिर न जाने कब तक

वो बड़ी बड़ी गहरी काली आँखें

उस धूप सी हंसी को पीती रहीं

दोनों को पता ही न चला --

कुछ पल फिर से जीवंत हो गए

--------Divya Shukla ------------

24-12-2013

पेंटिग गूगल से

Monday, 16 December 2013

-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए --



-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए
------------------------------------
-मुझे श्रद्दांजली नहीं चाहिए
एक वादा चाहिए तुम सब से

दुनिया की हर बेटी में मुझे देखना
मेरी पीड़ा मत भूलना --याद रखना जिंदा हूँ मै

क्या मै विश्वास करूँ ?नहीं भूलोगे तुम सब
सिर्फ बातें और नारे बन कर न रह जाऊं मै

हर बेटी में मेरा ही अंश देखना ---देखोगे न
उन बारह दिनों का संघर्ष --सार्थक होगा

फिर किसी निर्भया / दामिनी को श्रधांजली न देनी पड़े
मै झकझोर के जगा रही हूँ तुम सब का ज़मीर -----निर्भया -दामिनी
------DIVYA--------

Thus spake DAMINI -Nirbhya---
---------------------------------------
Its your Promise i want, Not your Tribute;
Identify me in Every single daughter of the world and don't stand Mute;

Never to forget my pain,
Im still Alive and didn't die in vain;

Can i be assured that i wont be buried in oblivion?
Mentioned in Gossips and Used in Slogans?

I'm in every Girl , every woman,
Those 12 days, moments of agony, struggle and torment;

Never again any Damini is robbed of her Innocence,
Gather-up, Wakeup and Man-up... Shakeup your conscience and Rise with Vengeance.------Nirbhya-DAMINI
-----------Divya------------------
REPOST --17-12-2013

post ---29-12-2012

Friday, 13 December 2013

एक बात पूछूं -उत्तर दोगे ??




एक बात पूछूं -उत्तर दोगे ?

----------------------------

सुनो ! कुछ कहना है मुझे

न जाने कितने दिनों से

स्वयं को बहुत टटोला मैने

अंतर्मन से न जाने कितने

प्रश्नोत्तर किये और फिर

डोलता रहा मन उहापोह में

असंख्य बार तुम्हारी आँखों में

वही चिरपरिचित प्रश्न पाया

न जाने कब से शायेद युगों से

जिसका उत्तर अधरों में मिंचा

ही रहा बहुत प्रयास के बाद

भी देने का साहस नहीं कर पाई

कदाचित  नहीं देना ही नहीं चाहा

परंतु आज मै स्वयं तुमसे

तुम्हारी आँखों में आँखे डाल कर

बिना किसी भय और कुंठा के

कहती हूँ अब सुनो -- तुम

हाँ नहीं हूँ मै सीता कहा न नहीं हूँ

और तुम्हारी खींची हुई परिधि

के भीतर रहना भी मेरी नियति नहीं

मुझे अपना मान स्वयं प्रिय है

अब तुम मेरे प्रथम और अंतिम

प्रश्न का उत्तर दे दो -

बोलो दोगे न -छोटा सा प्रश्न है

क्या तुम राम हो ??

तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में हूँ

क्या तुम राम हो बोलो ??

------Divya Shukla -----


13-12-2013

पेंटिग गूगल से

Wednesday, 11 December 2013

सुनो तुम भी अब न कहना





सुनो अब न कहना
---------------------------
मुझमे मेरापन मर सा जाता है

जब भी तुम कहते हो अब नहीं बोलूँगा तुम से

प्यार भरी तकरार और फिर मै करू मनुहार

जिंदा रखते है हमारे - अहसासों को

वरना एक सहमा सा सन्नाटा फैल जाता है

और मै वो ढेर सारी बातें भूल जाती हूँ

जो तुमको बतानी होती है तुमसे बांटना चाहती हूँ

यह सोच के चुप सी साध लेती हूँ

पर तुम न जाने किस पल तुनक जाओ

कहा न कोशिश करुँगी मेरे अंदर का बचपन मर जाये

फिर तो मै खामोश खामोश ही रहूंगी न

पर सुनो देखो तुम भी अब  न कहना

नहीं बोलूँगा तुम से --

------Divya Shukla-------

12-12-2013

तस्वीर गूगल से

Wednesday, 4 December 2013

कुछ यूँ मिली दोपहर और सांझ

कुछ यूँ मिली दोपहर और सांझ 
---------------------------
उस दिन किसी का घर खोजते हुये
अचानक तुम्हें देखा -ठिठक कर देखती रही
चश्मे के मोटे लेंस के पीछे से मिचिमिचा कर 
देखने का प्रयास करती तुम्हारी आँखे

साफ़ नहीं देख पा रही थी -नज़र कमजोर

शायेद ऐनक का नंबर बढ़ गया है --

तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों के साथ

पर आँखों की चमक बनी है

बिन दाँतों के पोपले मुंह की शिशुवत मुस्कान

जाड़ों की गुनगुनी धूप सी लग रही थी

बिटिया बैठ जाओ थक गई हो न

तुमने कहा और टूटा स्टूल बढा दिया

तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों को गिनने की चाह ने

और तुमसे बात करने की ललक ने रोक लिया मुझे

तुम से बात करते सुख दुःख सुनते

अनजान मोहल्ले की वो जाड़े की दोपहर

न जाने कब शाम में बदल गई पता ही न चला

ये अनजान बूढी अम्मा आज इस उमर में भी

अपनी रोटी खुद जुटाती है भोर होने से शाम तक

माचिस .बिस्किट रंगीन मीठी गोलियाँ और भी

छोटी मोटी चीजे ले कर अपनी खोखेनुमा दूकान में

रोज सुबह से धुंधलके तक बैठी रहती है --

मैने कहा अम्मा तुम क्यों बैठती हो इतनी देर

थक जाती होगी ? घर पर रहो आराम करो

नाही बिटिया काम करय से हाथ पैर चलत है

अउर आपन दुई रोटी क जुगाड़ होई जात है

जब तक जांगर चले केहू कय मुंह काहे देखी

अम्मा की आँखों वो चमक अपने साथ ले आई

वह स्वाभिमान की किरण कौंधी थी झुर्रियो में

उस दिन उस शहर के कोने की उस झुग्गी बस्ती में

अम्मा के साथ  वो दिन कब बीत गया पता ही न चला

मै और वो बूढी अम्मा ऐसे बतियाए ऐसे मिले --

मानो दोपहर और सांझ एक दूसरे से मिली हों

अम्मा तुम्हारी एक तस्वीर खींच लूँ कहा मैने

वो पोपले मुंह से हंस दी --का करोगी ई बुढिया की फोटू

तुम नहीं जानती तुम दुनिया की

सबसे सुंदर सरल स्वाभिमानी स्त्री हो

मन ही मन बुदबुदाई मै --और विदा ली अम्मा से

कंपकपाते झुर्रियों भरे कुछ खुरदुरे स्नेहिल हाथों का

स्पर्श संजोये वापस चल दी --पीछे से एक आवाज़ आई

फिर आना बिटिया --सच अम्मा

तुम संसार सबसे सुंदर स्त्री हो --

----------Divya Shukla---------

4-12-2013

Thursday, 28 November 2013

छाप की पाँवों की धूमिल सी

छाप की पाँवों की धूमिल सी
----------------------------

पत्थरों के इस महल में

कुछ आलता रंगे क़दमों

के धूमिल से निशान दिखे

बरसो पहले नवाँकुरित सपनों को

आँचल में सहेजे गृह प्रवेश करती

किशोरी नवबधू के भीतर आते

पाँवों की छाप थी धूमिल भी थी

और चटक भी लगती कभी

अरे बस एक हाथ की दूरी पर

बाहर की ओर जाते क़दमों के

निशान सुर्ख़ लाल चटक से

किसके है ? ध्यान से देखो

पत्थर की गूँगी बहरी

दीवारों की दरारों में

अपनी उम्र के सारे बसंत भर

पतझर लिये इस ऊँची ड्योढ़ी

को लाँघ कर बाहर जाती हुई

उसी किशोरी के तलवों से

रिसते हु़ये रक्त की छाप है

---- Divya Shukla-----

26.11.2013

पेंटिग गूगल से

Friday, 8 November 2013

बर्फ के फूल !!




बर्फ के फूल
-----------------------

जिस्म से लिपटती हुई गहरी स्लेटी शाम

मेरे माथे की सुर्ख लाल बिंदी सा सूरज

पेड़ की सबसे ऊँची फुनगी पर लटका

विदा कह ओट में छुपता जा रहा था

जाते हुये सूरज से चुराई एक किरन

धागे की तरह लपेट लिया उसे अपनी तर्जनी में

रात के सारे काले डोरों से मैने ढेर सारे गोले बना लिए

दिन रात के करघे में बुनती रही अपना दुशाला

पलछिन बीतते गये तमाम उम्र गुज़र गई -

आखिर आज ओढ़ ही ली रात की काली सियाह चादर

और ऊँगली में अभी लिपटी है किरन सूरज से चुराई हुई

उसे लगा ही नहीं पाई कहीं नहीं टांका बस लिपटी रही तर्जनी में

आईने में खुद को देखा वक्त ने टांक दी है चंद लकीरें

तुम ने तो बहुत कोशिश की वक्त की सलवटों को

अपने गर्म हथेलियों से समेटने की पर कहाँ हटा पाए

पता है तुम्हारी हर छुअन से टंक गये कुछ फूल

रात की चादर पर ---जो सुबह बर्फ के फूलों जैसे थे

मेरे सर्द वजूद से लिपटी यह चादर भी जम गई है

और उस पर टंक गये है कुछ सफ़ेद सुंदर पारदर्शी फूल

सुनो --मैने उस पर एक अंजुरी सुर्ख लाल आलता भी छिड़का था

भला काली रात पर भी कोई रंग चढता है नहीं न ?

तुम तो जानते ही हो न ----

सुबह यह बर्फ के फूल महक रहे थे भीनी भीनी सुगंध फैली थी

उफ़ क्या तुम नहीं जानते यह कितना भी महकें पर

रहेंगे बर्फ के ही फूल न ----

-------Divya Shukla--------

9-11-2013

पेंटिग गूगल से साभार

Tuesday, 5 November 2013

कुछ दोराहे ऐसे भी !!



कुछ दोराहे ऐसे भी !!

----------------------------------

आईने के सामने न जाने कब से खड़ी

पर अपना चेहरा नहीं देख रही थी

अपनी ही आँखों में झलकता

वो अनदेखा चेहरा खोज रही थी

जो मुझ में ही कहीं गडमड हो गया है

जिंदगी की राह में मोड तो बहुत से आये

पर कुछ दोराहे ऐसे भी थे ---

कुछ अजीब असमंजस में पड़ी

जहां कुछ पल को ठिठक गई मै

किधर जाऊं कड़ी धूप चुनूँ या फिर

घुटने टेक कर ठंडी छाँव वाला रास्ता

जिंदगी तो सहल हो जाती पर---

जमीर के साथ साँसे भी गिरवी रखनी पड़ती

दूसरा रास्ता गुजरता हर पल जीवन की

कठोर परीक्षा कड़ी धूप और

राह में बिछे नागफनी के कांटो के बीच से

मैने दो पल लिए निर्णय लेने में --

चंद शब्द और एक ठोकर से

बंद कर दिया पहला रास्ता और

वो देखा हुआ चेहरा जो कभी

जाना पहचाना था उसका अक्स ही

निकाल फेंका एक गहरी सुकून भरी सांस ली ----

और फिर चल पड़ी स्वयं की चुनी राह पर ----

--साथ में था वो अनदेखा चेहरा

जो मेरा संबल था --कठिन राह में

जिसकी प्रतीक्षा मुझे जन्मो तक रहेगी

मुझे भी नहीं पता वो कौन है ---

मेरी ही कल्पनाओ में बसा वो अनदेखा वजूद

कभी कभी सोचती हूँ --कैसा अजीब शख्स है

जो है भी और नहीं भी ---------

पर जिंदगी गुजारने के लिए बस इतना ही बहुत है

न जाने किसका ये शेर याद आता है --

जब भी सोचती हूँ मै --

(वो ख्वाब बन के मेरे चश्मेतर में रहता है

अजीब शख्स है पानी के घर में रहता है )

है न अजीब सी बात ---इसी लिए तो कहती हूँ

मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की ----

-------Divya Shukla--------

पेंटिग गूगल से साभार —

Thursday, 24 October 2013

नारी मन का अनगूंजता गीत ---



मन का अनगूंजता गीत
--------------------------------
न जाने क्यों आज मन किया
कलाई से कुहनी तक पहन लूँ
हरे कांच की रेशमी चूडियाँ 
भर ऐड़ी कलकतिया महावर
पूरा पांव चटख लाल रंग वाला
लगा के बिस्तर की सफ़ेद चादर पर
छाप दूँ ढेरों पाँव के निशान
--जैसे पहले करती थी --और फिर
खूब बजनी पाजेब भी पहन लूँ
ढेर सारे घुंघरू वाली ----
और हाँ घुंघुरू वाले बिछुए भी
वो भी तीनो उँगलियों में डाल कर
लाल हरी बांधनी चुनरी पहन -
किसी ट्रक या ट्रैक्टर की ट्राली
पर लदे पुआल के ढेर पर खड़े हो कर
अपना आंचल हवा में उड़ाते हुए
जोर जोर से गाऊं --
तोड़ के बंधन बाँधी पायल
न जाने क्यूँ जब भी फिल्म के
गीत में नायिका को देखती
तो कल्पना में खुद को वहाँ पाती
पायल बिछिया कंगन चूड़ी
जब बजते तो मन के सात सुर बज उठते
यह बंधन नहीं मन के तार है जरा सुनो तो
तुम ने हाथ पकड़ भर लिया और चूडियाँ धीमे से खनक उठी
मानो कह रहीं हो छोडो न मेरा हाथ अब जाने दो
और जब गुस्सा आता है तो जोर से जता देती है
पर न जाने क्यूँ तुम्हें नहीं पसंद इनके बोल
जब भी मै छम छम पायल पहन के चलती
और छनक जाते घुंघरू या भरे हाथों की चूडियाँ
खनखनाती तो झुझला उठते तुम आखिर क्यूँ ?बोलो न
तुम्हारा तो चुभता हुआ बस एक ही वाक्य
तीर की तरह लगता सीधे दिल पर
लगता है बंजारों की बस्ती से आई है
तभी तो कितने गंवारू शौक है ---
उस पर जब यह भी बोल कर हंस भर देते तुम
सुनो ये लाल सडक क्यूँ बना रखी है सर पर
तो जलभुन जाती मन ही मन ---- फिर तो
मै दे मारती गुस्से में एक जोरदार डायलॉग
सुनो -एक चुटकी सिंदूर की कीमत
क्या तुम नहीं जानते बाबू
इतना श्रिंगार करने की आज़ादी
तो मिलती ही है न ----वरना माँ कब
करने देती ये सब ----उफ़ वो बचपन ही तो था
फिर एक दिन सब उतार के फेंक दिया
रोज ही सुनना पड़ता बंजारन हो क्या
ढेरों लाल हरी चूडियों की जगह बस
एक कड़ों ने ली पाज़ेब के घुंघरू मौन हो गये
आज वो बंद पिटारी सब दिख गया
और पायल उठाने पर जब घुंघरू बजे
तो मन के तार फिर झनझना गए
काश की तुम समझते
यह न तो गँवारपन न ही बंधन है
यह तो नारी मन का संगीत है
जो उसकी हर हलचल पर बजता है
पायल बिछुए चुडियों के मधुर स्वर  में
नारी मन का  अनगूंजता गीत है
-------Divya Shukla---------
25-10-2013
पेंटिग गूगल से

Wednesday, 23 October 2013

सुनो ! तुम नहीं जानते




तुम नहीं जानते ?
---------------------

आज न जाने क्यूँ

तुम बहुत याद आ रहे हो

तुम्हारे पास बैठ बस

तुम्हे निहारते रहने को

दिल कर रहा है

बिना बोले न जाने

कितनी बातें करनी हैं

तुम्हारी प्रतीक्षा में -

मेरी निगाहें रह रह के

दरवाज़े पे टहल आती हैं

हवा से भी जब सांकल बज उठती

तो बार बार तुम्हारे ही आने का

भरम होता है ---पता नहीं क्यूँ

तुम्हे भी मेरी याद आ रही है न ?

तुम नहीं हो -यहाँ -जानती हूँ

जानते हो तुमसे ज्यादा

तुम्हारे होने का अहसास

प्रिय है मुझे --हैं न अजीब सी बात

देखो फिर न कहना कभी

कहा नहीं मैने ---मै कहाँ कह पाती हूँ

अब कल की ही तो बात है

जब तुमने कहा था ---

तुम्हे इश्क है मुझसे -


पता है तुम्हे -----

इक जलतरंग सी बज उठी थी

कानों में सुन कर ---

कान की लवें गर्म हो गई

पलकें अकेले में भी झुक गई थी

फिर यही सवाल मुझसे भी पुछा तुमनें

नहीं बोल पाई कुछ ---

जब की फोन पर थी --

तुम सामने भी नहीं थे --

अगर झूठ कहना होता तो

तो कह ही देती ---पर सच बोलना

बहुत मुश्किल है न  ---लो सुनो न

हाँ मुझे भी इश्क है तुम से

कितना मुश्किल है ये कहना उफ़

बिना कहे क्या नहीं समझ सके तुम

कितने खराब हो तुम --हटो जाओ भी

------Divya Shukla----------

23-10-2013

पेंटिंग गूगल से साभार

Thursday, 17 October 2013

जब अंतिम विदा दी थी मैने !!


जब अंतिम विदा दी थी मैने

-------------------------------------

मैने यादों की पोटली फेंक दी है

नहीं सहेजना इन्हें --अब बहुत हो गया

इसमें समेट कर बाँध दिया था

तुम्हारा विश्वासघात उफ़ वही तो अब

सबसे ज्यादा गंध मार रहा था

उसकी अप्रिय गंध  से जीना दूभर हो गया था

मेरे प्रतिकार करने पर त्रियक होठों से

ह्रदय को भेदती तुम्हारी मुस्कान

नहीं भूलती उस दंश की पीड़ा

तुम नहीं जानते कितना कुछ

खो दिया था उस पल तुमने

कल तुम जब मेरे समीप बैठ

प्रयास कर रहे थे बार बार

टूटे तारों को जोड़ने का और

न जाने कितने उदाहरण दिये थे

शाश्वत होते हैं सात जन्मो के रिश्ते

और यह भी कहा मुझसे

जल को कितना भी छुरी से काटो

वो कहाँ बट पाता है दो भागों में

पर तुम क्यों भूल जाते हो यह बात

प्रेम के धागे को तोड़ कर भला

कोई जोड़ पाया है कभी गाँठ पड़ जाती है न ?

तुम नहीं जानते मैने कितने मान और अधिकार से

तुम्हारे वक्ष पर अपना सिर रख कर सुनना चाहा था

अपना नाम तुम्हारे ह्रदय की धडकनों में

परंतु वहाँ मै नहीं कोई और था --सुनो और तब

मैने कहा था न तुम जा तो रहे हो ----

पर मै तुम्हें आवाज़ नहीं दूंगी न अभी न फिर कभी

पीछे से आवाज़ देना मेरी आदत नहीं जानते ही हो तुम

तब हंस दिये थे न तुम और मै नम आँखों से देखती रही

तुम्हें जाते हुये तभी अपने रिश्तों को अंतिम विदा दी थी मैने

मुझे पता था मैने कहा भी था तुमसे तुम आओगे वापस

पर उस दिन तुम याचक होगे ---और मै

मेरे पास कुछ नहीं होगा तुम्हें देने को

अब कुछ नहीं बचा कुछ नहीं बाकी

सुनो !अब मै कह रही हूँ तुम जाओ

मरे हुये रिश्तों के शव यहाँ नहीं रखे जाते

--------------------दिव्या -----------------

17-10-2013

पेंटिग गूगल से

Wednesday, 16 October 2013

जिंदगी अब जिद नहीं करेगी !!




 जिंदगी अब जिद नहीं करेगी

---------------------------

कल रात टुकडो में

टूट टूट कर बिखरता रहा चाँद

और जिंदगी बेबस सी देखती रही

जैसे खुद उसका दर्द पी रही हो

हर एक टुकड़े पे कुछ लिखा था

कुछ माफियाँ थी कुछ तलाफियां भी

किसी पे बेबसी तो कई पे दुश्वारियां थीं

गलतफहमियां थी और लाचारियाँ भी

पर नहीं थी तो किसी टुकड़े पर

नफ़रत नहीं थी ---बहुत ढूंढा

तो एक नन्हा सा टुकड़ा चमका

धुंधले अक्षर में मोहब्बत लिखी थी

जिंदगी की आँख से टपके दो बूंद

आंसू सब कह गए बिन बोले -----

--जिंदगी अब जिद नहीं करेगी

चाँद के टुकड़े बटोर के ---फिर से

एक नया चाँद बना देगी

------Divya Shukla-------

15-10-2013

पेंटिग गूगल से

Saturday, 12 October 2013

ये सांकले नियति है जो टूट कर भी जकड़े है उसे !!







ये सांकले नियति है जो टूट कर भी जकड़े है उसे
---------------------------------------------------------
सुनो --तुम कह तो रहे हो परंतु पाँव में बंधी सांकल कैसे तोड़ दूँ
हाँ वो मै ही हूँ जो इस कायनात को ठोकर मार सकती थी कभी
फिर क्यूँ कमजोर पड़ रही हूँ सोचती हूँ फूलों में गुजरने का समय तो 
कांटो को चुनने में गुजर गया या सोच लो हमने ही स्वयं गुज़ार दिया
तुम नहीं जानते उन कांटो की पीड़ा बहुत कम थी इन जहरीले फूलों के दंश से तो बहुत ही कम तुम जानते हो वो लोहे की मजबूत सांकल जो कैदीयों के पांव में बांधते है उन्हें क्या कहते है वो बेडियाँ कहलाती है न ? ऐसी ही एक बेड़ी कब की तोड़ डाली मैने
-कब तक भागती कहाँ तक भागती --उससे वो व्याघ्र था -एक चतुर व्याघ्र
उस सुनहरी गुफा के हर कोने में खोजती उसकी दो पैनी निगाहें हर समय इर्दगिर्द होती
मानो शरीर से हड्डियों तक आरपार देख रही हो मौका मिलते ही दबोच लेते दो भयानक पंजे जिनके नख बहुत पैने थे --जबड़े बहुत भयानक ऐसे की समूची हड्डियों तक को निगल जायें ---परंतु हिरणी निकल गई उस के पंजे से सुरक्षित
आत्मा में धधक रही प्रतिशोध की अग्नि लिए परंतु आहत मन पर खरोंचे भी थी
--सोने की उस लंका को दुत्कार गहबर बन में भटकने अपने छौनो के साथ सारे साम्राज्य पर निर्द्वंद राज्य करने वाला व्याघ्र तिलमिला कर रह गया
वह नहीं भूला अपनी हार -----हाथ आई उसके केवल टूटी हुई कड़ियाँ
उसे ढूंढता है मन में लिए प्रतिकार एवं अवसर मिलते ही करता है आघात बार बार
सांकले तोड़ दी मैने ---टूटी सांकलों की कड़ियाँ सहेज़ रखी है उसने ---
अब थक गई हूँ बंद लिया स्वयं को गुफा में --रोशनी एक किरण बस बहुत है मेरे लिए
परंतु मै हारी नहीं हारूंगी भी नहीं --लंका ध्वस्त करने का हौसला जुटाती हूँ अब भी
मै सीता नहीं पर पथभ्रष्ट भी नहीं वो राम नहीं पर रावण के साथ था फिर कोई और उपाय भी नहीं था लंका त्यागने के सिवा ----अतीत चुभता है वर्तमान मुंह चिढाता है -- हाथ खाली हैं ममता संबल है परंतु नन्हे छौने अब स्वालम्बी हैं बन में अपना रास्ता स्वयं बना लेंगे -- मोह धीरे धीरे खतम हो रहा परंतु सत्य यही है वैराग्य नहीं मन में क्रोधाग्नि धधक उठती है प्रतिकार की --एक छण को घृणा होती है विश्वास नहीं होता अब कहीं किसी पर -----एक पल कोमल भाव उठे नहीं कि व्याघ्र के तीक्ष्ण नख न जाने कहाँ से सामने आ जाते और दूर छितिज में टंकी दो आँखे दिखती जो सब देख कर भी मुंद जाती थी शायेद धन का पलड़ा भारी था उन पर अग्नि के समक्ष लिए वचन स्वर्ण की सुनहरी आभा के आगे बिसर गये --- घिन आती है उन पर ही अपराधी वही है --सत्य यही है रक्षा का वचन लेने वाला ही अपराधी होता है न अगर वह अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए वह भी लोभ में --सांकले तो अब भी हैं पर --शायेद नियति में यही लिखा है --आखिर रक्त पिपासु व्याघ्र से कहाँ तक लड़ पायेगी हिरणी --समाज भी तो समर्थ के होता साथ है सत्य के साथ तो अधिकांशतः अपने भी नहीं होते !!
------------------------Divya Shukla-------------------------
कुछ कहा कुछ सुना --इर्दगिर्द से

12-10-2013

पेंटिग गूगल से





Thursday, 10 October 2013

बुत जो मोम रहा न पत्थर !

बुत जो मोम रहा न पत्थर 


---------------------------------------

सुनो ! मेरे सवालों का जवाब दो न

जिंदगी अक्सर यही कहती

और मै जान कर अनजान बन जाती

तुझे नहीं पता सारे सवालों के जवाब

न जाने किन किन अँधेरी गलियों से

गुजरते है और फिर आ के

अटक जाते है हलक में सारे शब्द

वो अक्सर बाहर नहीं आते ----और फिर

यही सजा बन जाती है उन जुर्मो की

जो कभी किये ही नहीं -- फिर बेइंतिहा घुटन

ओह अचानक Cell Phone बज उठा ---

चौंक पड़ीऔर फिसल गया हाथ से

क्रिस्टल का वो खूबसूरत कीमती शोपीस

उसके टूटने की आवाज़ --और लगा

मेरा पूरा वजूद इसी तरह बिखर रहा है

पता है क्रिस्टल क्यों प्रिय है

कुछ कुछ खुद को कम्पेयर करती हूँ न

पारदर्शी कांच ही तो है मन की ही तरह

कभी मेरा Passion रहा ये क्रिस्टल आज भी

बिखरे टूटे मन को सुकून देता है

खुद को तलाशा तो हर कट में

एक साथ कई चेहरे झलकते हैं

खुद से सवाल जवाब करते हुये

मेरे भीतर चलते हुये झंझावात को

कभी उलझाते कभी दंश देते

अपने पैने नखों से उन जख्मों की

सूखी परतें उधेड़ते जिन्हें दफना दिया था

बरसों पहले पुराने विस्मृतियों के कब्रिस्तान में

आज फिर छन्न से टूटा कांच का बुत

दौड़ गई दर्द की लहर नसों में

कभी हर्दय की पीड़ा तो कभी टूटे हुए

टुकड़ों को बटोरने में लहूलुहान हुई

उँगलियों से रिसते रक्त की मीठी पीड़ा

और उस पीड़ा को घूंट घूंट पीती जिंदगी

गुज़र रही थी एक नक़ाब ओढ़े हुये

कुछ सफर ऐसे भी होते है जो खूबसूरत है

पर उनकी कोई राह उस गली से नहीं जाती

जहाँ एक पूरा वजूद अपनी ही चुनी हुई

तनहाइयों में भटकता है--अभिशप्त आत्मा सा

खुद से सवाल करता --जवाब भी खुद ही देता

पता ही न चला कब धीमे धीमे

उम्र की दहलीज़ें फलांगती गई -पर

आज भी खुद को उसी जगह पाया

जहाँ से मोम का वजूद पत्थर में

बदलने लगा -उफ़ न पत्थर हुआ

न ही मोम रह गया -----

और जिंदगी वो तो गुजरती रही

ख्वाबों में जीते हुए -----

भला ख्वाब भी किसी के हुए है

हकीकत और सपनो की दुरी का

अहसास होते ही --छन्न से टूटता है कुछ

जिंदगी घुटने लगती है और फिर

अपनी ही हंसी खोखली लगती है

लगता है साँसे तो चल रही हैं

पर पूरा वजूद मुर्दा हो गया

आँखे मूंद कर ऊँची इमारत से

छलांग लगाने की कल्पना भी

एक सुखद सा अहसास देती है हवा में तैरने का

ओह कहाँ खो गई थी क्या सोच रही थी

अचानक Maide ने Door knock किया

दीदी Green Tea लीजिए आपको कहीं जाना भी है

नही अब आज और कहीं नहीं जाना मुझे

देर हो गई बहुत अब बस वही जा कर आती हूँ

और ड्राइवर से गाडी बुकशाप की ओर

मोड़ने को बोल आँखे मूंद ली ---

----------Divya Shukla------------

11-10-2013

पेंटिग गूगल से 

Tuesday, 8 October 2013

सूखे पत्ते --और तुम्हारा जाना




सूखे पत्ते --और तुम्हारा जाना

-------------------------------------

बालकनी में खड़ी मै देख रही हूँ

उन सूखे पत्तों को जो बिछ गए हैं

मेरे गेट के सामने वाली सडक पर

-जो पूरी तरह से ढंक गई है ---

पीले भूरे चितकबरे पत्तों से ---

ईवनिंग वाक का वक्त हो गया

मै उतर आई नीचे चप्पलों में ही

न जाने किस सोच में गुम थी

मैने sneakers भी नहीं डाले पांव में

और चल दी इस सुनसान सडक पर यहाँ

लोगों की आवाजाही कम ही है ---लिंक रोड है न

तभी पत्ते भी बिछे रहते हैं करीने से

धीमे धीमे चलते हुए कोशिश कर रही हूँ

पत्तो की आवाज़ में कुछ सुनने की

जब तुम जा रहे थे इसी सडक से

तेज़ी से गुस्से में जाते हुए तुम्हारे जूतों की

खटखट आवाज़ और पत्तों चरमराहट

दोनों एक दुसरे में मिल गई थी --

तुमने तब पेड़ों की तरफ नहीं देखा था

वहां तब भी नई कोपलें फूट आई थी

आज भी वैसी ही हैं --सूखे पत्ते भी नीचे बिछे है

मै रोड इस छोर पर खड़ी बस यही सोच रही हूँ

काश उस छोर से तुम अचानक आ जाओ

मुझे तुम्हारे क़दमों और सूखे पत्तों की आवाज़

मिलीजुली आवाज़ का इंतजार है --

बस कब तुम्हारा गुस्सा खतम हो

और तुम अचानक बेल बजाओ ---

पर देखना ज्यादा देर मत करना --

ध्यान रखना कहीं देर न हो जाए

आखिर हर बात की एक हद होती है

-ठीक वैसे ही जैसे पतझर का भी

एक मौसम होता है बस चंद दिनों का --

-------Divya Shukla-----------

Thursday, 3 October 2013

सुनो जिंदगी ---



सुनो जिंदगी ---

------------------------

जिंदगी सुन रही हो न ?

कितनी जिद्दी हो तुम

जरा मेरी बात भी सुना करो

कभी खुद से बाहर भी रहा करो
 
जरा झाँक कर देखो तो सही

आसमान में बादलों का लिहाफ है

ओढ़ कर उसे कुछ ख्वाब बुनो

धूप में चांदनी जलती है देखो

कतरा कतरा धूप भी पिघलती है

सूरज की आँखों में भी नमी झलकती है

चाँद की तपिश से कभी रात जलती है

पर जिंदगी मै तुम्हें खोजती फिरती हूँ

देखो कोई आवाज़ देता है मुझे बहुत दूर से

जिंदगी तुम कहना उससे जरा देर वो थम जाए

ऐसा न हो कि ये पत्थर ही दरक जाए ---

सदियों से जमी बर्फ पहरों में नहीं पिघलती

पूछना उससे क्या लगती हूँ मै उसकी

मै उसकी कोई नहीं फिर भी कुछ तो है

हम दोनों में जो खीच लाता है न जाने क्यूँ

कुछ सवाल इधर से कुछ जवाब उधर से

तुम जाओ तो सही जिंदगी वरना शाम हो जायेगी

अपनी शाम के सूरज को तुम ढलने ना देना

घूंट घूंट पीना पिघलती धूप को

कभी फूंक मार कर जलती चांदनी को

बहुत खूबसूरत हो जाओगी तुम ओ जिंदगी

फिर आ कर मिलना मुझसे

यही इसी जगह इंतज़ार करुँगी तुम्हारा

ओ जिंदगी जाओ --जी लो अब हर पल को

-------Divya Shukla-----------

3-10-2013

पेंटिग गूगल से

Tuesday, 1 October 2013

भटक रहीं है सतरूपा ,ईव और हव्वा की बेटियां




क्या स्त्री मात्र एक देह है ?

------------------------------

स्त्री मात्र एक देह है ?

------या देह से इतर भी कुछ है

-इन्ही प्रश्नों में उलझी --------

------जीवन कंटीली पगडंडियों पर

भटकती हुई स्त्री यह अब भी नहीं जानती ----

-----जिस दिन से वह ठान ले

और अपना विस्तार करना चाहे तो

-----पूरी कायनात उसके लिए

बहुत छोटी पड़ जायेगी -----

------ जब घटने पे आयेगी

तो मुट्ठी भर राख में तब्दील हो जायेगी

--------वह निरंतर आगे बढती रहती है

अपने पीछे छोडती हुई -----

-----पथरीली राहों के नुकीले पत्थरों से

घायल रक्त से सने ---------

----युगों तक न मिटने वाले अपने पग चिन्ह

--------नारी जीवन का यथार्थ बड़ा कटु है

उसके जीवन की पीड़ा सिर्फ उसकी ---

--------परन्तु उसके सुख सब के लिये

लोग चाहे कुछ भी कहें पर कुछ नहीं बदला

स्त्री चाहे गांव कस्बे की हो अथवा महानगर की

एक जगह आकर सब एक सी ही हैं

अपने सुख अपने लिए सोचा मात्र भी उन्होंने -----

प्रतिबन्ध और वर्जनाओं की एक मजबूत दीवार

आज भी खड़ी कर दी जाती है उसके चारों ओर ------

विडम्बना तो यही है यह सारे नियम वो निर्धारित करते है

जिनके मुख पर न जाने कितने मुखौटे होते है

प्रयत्क्ष रूप से जो प्रतिबन्ध का समर्थन करते है मुखौटा ओढ़ कर

वो ही परोक्ष में इसे तोड़ते भी है अपने असली स्वरूप में

कितना दोगला स्वरूप है इस समाज का और इनके रिश्तों का

दिन के उजालों में जहां रिश्तो और कर्तव्यों के

बड़े बड़े भारी भरकम पाठ पढाये जाते है

-- हरे ,पीले ,सफेद वस्त्रों की आड़ में धर्म भीरुता का

घुट्टी कर्तव्य के रूप में मन मस्तिक्ष्य में कूट कूट के

भर दी जाती है ----कर्तव्य बोध की लम्बी चौड़ी दास्तान

उदाहरण सहित सुनाई जाती है ---दूसरी तरफ वहीँ

-रात के अंधेरों में रिश्ते लुटते है शर्मसार होते है

कर्तव्य बोध कहीं विलुप्त हो जाते है पाप हावी हो जाता है

रात की काली चादर में --झक सफ़ेद वस्त्र दागदार होते हैं

धर्म चीखता है और उसके ठेकेदार अट्टहास करते हैं

--रिश्ते शर्मसार होते हैं ----कितनी विडंबना है --

किन्तु विरोध के स्वर यदाकदा ही मुखरित कर होते है

और फिर तीर की तरह चुभती पैनी निगाहें

व्यंग के वार से छलनी अंतरात्मा लिए एक स्त्री ही

भटकती फिरतीं है जीवन की पगडंडियों पे -

यही एक प्रश्न लिए अपनी पनीली आँखों में

तुम ही बताओ समाज के ठेकेदारों उत्तर दो

क्या स्त्री सिर्फ एक देह है बोलो ?

या इससे इतर भी कुछ है उसका अस्तित्व ?

इस यक्ष प्रश्न का उत्तर कौन देगा

मनु की सतरूपा /आदम की हव्वा /एडम की ईव

ये सब भटक रहीं है ओढ़े हुये

इन सफ़ेद ,पीले ,हरे रंगों के कफन

और जवाब मांग रहीं हैं समाज और

रंगो के इन ठेकेदारों से --

क्या स्त्री देह के इतर कुछ भी नहीं ?

-----Divya Shukla--------

2-10-2013

पेंटिंग गूगल से

Saturday, 28 September 2013

वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?


वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?

-----------------------------------------------------

सुनो वो मै ही हूँ जो कभी सारी कायनात को ठोकर मार सकती थी

पर अब तुम नहीं जानते राख का एक ढेर सा बन गया है

मेरा अस्तित्व बस एक चिंगारी दबी है उसमे उसे वही दबा रहने दो

और ढंक दो वरना सब कुछ राख हो जाएगा ---तुम नहीं जानते

उस दिन जब मै शांत बैठी थी नदी के किनारे न जाने किस ध्यान में

नदी मुझे लहरों में समेट कर दूर तक ले गई देर तक लहरों के संग

बहती गई दूर तक न जाने कितनी दूर बहती ही जा रही थी और फिर

न जाने क्या हुआ अचानक न जाने कैसे मै ऊपर उठने लगी

मानो फूल सा हल्का हुआ मेरा अस्तित्व और मै आकाश में चल रही थी

घबरा कर नीचे देखा अरे वहाँ भी मै ही थी मै देख पा रही थी स्वयं को
,
नेत्र मूंदे हुए और मुख पर अनोखी शांति लहरों पर सोई हुई बह रही थी

आकाश में बादलों के बीच जो पंछी की भांति उडती फिर रही थी वो भी

मै थी

न जाने कब तक तैरती रही आकाश में बिन परों के फिर थक कर

नदी किनारे पेड़ के नीचे ही बैठ गई सफ़ेद फूलों से भरा अद्भुत पेड़

न जाने कैसी सुगंध थी जो मेरी चेतना पर हावी होती जा रही थी

मेरे भीतर समाती जा रही थी मेरे रोम रोम में बस रही थी -

और मेरी पलकें बोझिल होती जा रही थी मानो सुरापान किया हो

यह कैसी मदहोशी थी बार बार अर्धचेतना में भी कौंध रहा था विचार

अचानक न जाने किसने छुआ और मै लौट आई वापस वो दिखा नहीं

वो कौन था क्या दिखा रहा था ,अचानक सुनाई देने लगे कई मनुष्यों के

 स्वर

वो गूंज रहे थे शांत वातावरण में उच्चारित कर रहे थे लगातार बार बार

राम नाम सत्य है -सामने देखती हूँ तो एक के बाद एक कई शव

 निकलने लगे

मैने उन व्यक्तियों को पुकारा वो पलट मेरी तरफ मुड़े पर

उनका चेहरा नहीं दिख रहा था पर उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दी मुझे

अरे तुम्ही को तो दिखाना था यह पहला शव है तुम्हारी आसक्ति का

दूसरा सांसारिक वासनाओं का ,तीसरा सच्चे निस्वार्थ प्रेम का ,चौथा

 तुम्हारी अपेक्षाओं का , बस करो अभी और भी हैं ? क्या मै पूछ बैठी ---
हाँ अभी प्रतिकार और घृणा भी आ रहें है ,नहीं तुम लोगों ने मुझसे

पूछा भी एक बार तो कहा होता अब इन चारों को तो ले ही जा रहे हो

ले जाओ पर वो दो तो अभी मेरे पास रहने दो यदि प्रतिकार और घृणा

 भी न रह गई तो जीवित रहने का क्या अर्थ , या तुम प्रेम को छोड़ जाते

 अब उसे ले गये तो इन्हें तो यही रहने दो मेरे पास यही तो मेरे राख हुए

 अस्तित्व को कुरेद कर

इसमें से वो चिंगारी खोज निकालेंगे जो कहीं दबी हुई है मुझमें ही

और फिर न जाने कैसी हवा चली लौट आई मै वापस न जाने कहाँ से

वो कौन थे वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?

-------------Divya Shukla------------------

29-9-2013

पेंटिग गूगल से

Tuesday, 24 September 2013

सुनो !अच्छा छोड़ो तुम नहीं समझोगे




सुनो !अच्छा छोड़ो तुम नहीं समझोगे

------------------------------------

सुनो एक बात कहूँ

पता है तुम्हे अक्सर मै

काफ़ी शाप की कार्नर वाली

टेबल पर जाकर क्यूँ बैठती हूँ

वहाँ तुम होते हो न--जानती हूँ

तुम नहीं हो यहाँ कहीं पर

है तो सिर्फ एक अहसास तुम्हारे होने का

और सामने वाली चेयर खाली नहीं होती

टेबल पर रखी होती है दो कप काफी

जो अब बिना कहे रख जाता है वेटर

अब जब कि वो भी जान गया है

कोई नहीं आने वाला -----

अकेली ही कुछ देर बैठूंगी मै

एक हाथ पे चेहरा टिकाये बैठी

मै गुम होती जाती हूँ तुम्हारी यादों में

उसी तरह चुप सी पर न जाने

कितनी बातें कर जाती हूँ तुमसे

पास बैठे होते हो तुम -मेरे इर्दगिर्द

होती है एक खुशबू तुम्हारे वज़ूद की

कभी लगता है जैसे हाथों को छू लिया

तुमने ---तुम्हारी आँखों की छुअन

मुझे महसूस होती है अनजान बनी मै

न जाने क्या सोच के मुस्करा देती हूँ

फिर मै तुम्हारी चोरी पकड़ लेती हूँ

अरे यह क्या हुआ तुम्हें अचानक

तुम ने घड़ी देखी और उठ गए --

अरे हाँ तुम्हे जाना भी तो है देर हो रही है न

फ्लाइट राईट टाइम होगी -- उफ़ तुम मुड़े

और मेरे कंधे पर अपना हाथ रख दिया

आह जरा सा छू भर गया

मेरा सर तुम्हारे सीने से

पर हम चाह के भी गले नहीं लग पाये

न जाने क्यूँ --हम दोनों में शायेद

हिम्मत ही नहीं --- और फिर अधूरी रह गई

देखो न इक खूबसूरत सी ख्वाहिश

तुम्हारे सीने पर हल्के से सर रख कर

तुम्हारी धडकनों में अपना नाम सुनने की

तुम चल दिये और कोरिडोर में खड़ी मै

तुम्हें जाते हुए देख रही हूँ सोच रही हूँ

पलट कर देखोगे भी या नहीं

और अचानक तुमने पलट कर देखा

मुस्करा कर हाथ हिलाया और फिर

झटके से कार का दरवाजा खोल कर बैठ गये

एक उदास सी मुस्कान दिख ही गई

बहुत छुपाया था तुमने फिर भी

पर कोई बात नहीं -- इतना ही बहुत हैं

मै अक्सर यहीं आती हूँ कुछ देर

तुम्हारे साथ बैठने को ---

ये भी सोचती हूँ पता नहीं

तुम्हे मेरी याद आती भी होगी

या नहीं-----पर मै मुझे छोडो

मेरे साथ तो तुम न हो कर भी होते हो

जाने दो  तुम नहीं समझोगे यह सब

मेरी बात और है न ---

तभी अचानक वेटर बोला

मैम आपकी काफी ठंडी हो गई

दूसरी लाऊं ? मैने इशारे से मना किया

उदास सी मुस्कान तिर गई मेरे चेहरे पर

मै उठ कर चल दी बाहर की ओर

कभी यहाँ आती हूँ तुम्हें जीने

ख्यालों में जीने बस और कुछ नहीं

---------Divya Shukla------------

24-9-2013

चित्र --गूगल से साभार

Saturday, 14 September 2013

द्विरागमन (गौना) का संदूक !!






 द्विरागमन (गौना) का संदूक 
-----------------------------------

आज बरसों से बंद पुराना संदूक दिख गया

पुराने कबाड़ वाले छोटे कमरे में

मन फिर उन्हीं गलियों में घूमने और

उन्ही बंद लम्हों को पलटने को
 
मुझे से बार बार कहने लगा --

वो सारी खट्टी मीठी यादें वो सारे पल

जिन्हें बंद कर दिया था ठूंस ठूंस कर इसी में --

फिर सामने आ गये बरसों बाद

पुराने कबाड़ में के बीच से छिटक कर

विवेकशून्य सी आगे बढ़ती गई

और भीतर से कमरे की कुण्डी लगा कर

बहुत देर एकटक तक देखती रही उसे

एक उधेड़बुन चल रही थी एक हलचल सी मच गई मस्तिष्क में

मन एक बार फिर से दोहराना चाह रहा था अतीत को

और विवेक उसे बार बार रोक रहा था ऐसा करने को --

मानो कोई कह रहा हो , मत खोलो दशकों से बंद द्वार के पट

स्मृतियों पर अतीत धूल को यूँ रहने दो बहुत पीड़ादायक होता है

पर जीत मन की हुई विवेक अक्सर हार ही जाता है

आगे बढ़ कर खींचा बहुत वजनी था वह और फिर

बरसों से जमी धूल को धीरे धीरे आचंल से ही झाड़ा

आखिर मायके का बक्सा था --मोह तो बना ही रहेगा

माँ ने दिया था द्विरागमन पर --और फिर एक दिन

सब कुछ इसी में ही बंद कर के ताला जड़ दिया था

आज फिर कांपते हाथो से खोला इसे झलक गई

कुछ साड़ियां रेशमी -जिनकी जरी अभी भी चमक रही है

विदा की रेशमी लाल साड़ी को उठा कर हाथ फेरने लगी

जरी का तार अचानक हाथ में चुभ गया और मन में भी

एक सिंदूर का बड़ा सा डिब्बा भी था उसकी चांदी अब काली पड़ गई है

जिसे थाम कर नए घर में प्रवेश किया था ---शगुन का सिन्हौरा

उसमे अभी भी वही पीला सिंदूर भरा है जिससे मांग भरी गई थी ---

अम्मा की चुनरी थी जो शायेद रस्म के अनुसार

पहली विदा पर मायके जाते समय मुझसे बदल ली थी उन्होंने

अम्मा --मेरी सासू माँ उन्हें मै अम्मा कहती थी

पीले रेशमी किनारे वाली चादर जब ओढाई उन्होंने

नहीं जानती थी वह अपना धैर्य इसमें लपेट कर

मुझे सौंप रही है ---- बहुत चाहती थी मुझे अम्मा

बिना संवाद किये भी हम दोनों में संवाद होता था

अम्मा मेरा चेहरा मेरी आँखे मेरा मन पढ़ लेती थी ---

पर अपने कोख जाये को वो नहीं सिखा पाई अपना ये गुण

और फिर मैने एक दिन सब कुछ समेट कर बंद कर दिया इस बक्से में

माफ करना अम्मा मुझे बहुत कठिन था मेरे लिए सब

मै अनजाने में बुदबुदा रही थी ओठों में ही

न जाने कब तक गुम रहती पुरानी यादों में कि अचानक

एक आहट से चौंक पड़ी शायेद किसी ने दरवाज़ा खटखटाया

------सारा सामान अचानक छूट गया हाथों से --

बिखर गया पीला सिंदूर छिटक कर फर्श पर -------

-----------सारी चूडियाँ छन्न से गिरी और टूट गई

हकबका कर हाथों से ही समेटने लगी मै

--------उफ़ -चुभ गई किरचें उन्हें बटोरने में

------ रिस आईं खून की बूंदे उंगलियों के पोरों पर

निकल आई दिवास्वप्न से बाहर ----------

और एक झटके में बंद कर दिया संदूक का ढक्कन

शायेद फिर कभी न खोलने के लिए ---पर अम्मा

मैने अपने आंसू तुम्हारी चादर में सहेज़ दिये है

आज सूरज पश्चिम से निकला है

झरोखे से सूरज की एक किरण झाँक रही है

मानो बार बार बुला रही हो आ जाओ इधर

अतीत के अंधेरो को दफना कर थाम लो रोशनी की डोर

आखिरकार उठ ही गये कदम रोशनी की ओर

एक नया सूरज एक नई भोर एक स्वतंत्र अस्तित्व

----------------Divya Shukla-------------------

१४ -९ -२०१३

तस्वीर गूगल से

Friday, 13 September 2013

मुक्त कर दूंगी तुम्हें --

मुक्त कर दूंगी तुम्हें -
------------------------

न जाने क्यूँ फिसल

जाते हो तुम -----

मेरी मुट्ठी से अक्सर

कितनी भी कस कर

बाँधी हो मैने ----

पर निकल ही जाते हो

अपनी सुविधानुसार

आने जाने के लिए

क्या इसलिए कि

तुम एक पुरुष हो ?

और कोई भी परिधि

या लक्ष्मण रेखा नहीं है

तुम्हारे लिए --क्यूँ होगी

ये सब भी तो

तुमने ही बनाई हैं

सिर्फ हमारे लिए

बस इतना ध्यान रखना

फिसल कर गर्त में

न गिर जाना ---सुनो

अब नहीं निकलूंगी तुम्हे

और बंद मुट्ठी से

मुक्त कर दूंगी तुम्हे

हर  बंधन से  --और

दूर अपने अंतर्मन से

सदा के लिए ----

सुनो एक बात कहूँ ?

क्या तुम नहीं जानते

मुझे राधा से मान

और सीता से स्वाभिमान

आशीष में मिला है

------Divya Shukla--------
पेंटिग  गूगल से साभार

१३ -९-२०१३