Sunday, 6 January 2013

मै स्वयंसिद्दा - - - - -


मै स्वयंसिद्दा
----------------------------
पीड़ा ने समझदार बनाया
परंतु हर अनुभव ने
और भी मजबूत बनाया
पीड़ा से मिली समझदारी ने
दृढ संकल्प ,मजबूत अपराजेय
स्वालम्बी ,आत्मविश्वास से
पूर्ण व्यक्तित्व दिया --
अब मै जाहिर नहीं करती
किसी पर अपनी पीड़ा
मुझे बहाने बनाने बखूबी आ गए
मेरी हसी में कभी भांप न पाओगे
तुम मेरी पीड़ा कुछ ऐसा ही है
मेरा अभेद्य व्यक्तित्व
पीड़ा और प्रेम का मूर्तिमान रूप
मेरा असली स्वरूप है जो
शब्दों में ढाल के रख जाउंगी
मेरे जाने के बाद ही पढना
तब शायेद कुछ कुछ जान सकोगे मुझे
मेरे अंदर छुपी उस औरत को
जिसे कोई नहीं समझ पाया
वह हर आघात के बाद
आकंठ पीड़ा में डूब उतरा कर
जो उबर आती है फिर
एक नए दृढ निश्चय साथ ----
क्यूँ की मै औरत हूँ
पीड़ा की मिटटी से बनी हूँ
पर प्रेम बांटती रही --परन्तु
खाली दामन लिए जाऊँगी
फिर आने के लिए ----
---एक और जनम ले कर
----------------दिव्या ---------------
6-1-2013