Monday, 14 January 2013

उफ़ कैसे हो तुम एकदम ट्रेडिशनल सैडिस्ट से - ?


उफ़ कैसे हो तुम एकदम ट्रेडिशनल सैडिस्ट से - ?
------------------------------------------------
तुम मेरी पतंग को हमेशा काट क्यूँ देते हो ? 
क्यूँ नहीं उड़ने देते मुक्त आकाश में 
उसमे में मै खुद को महसूस करती हूँ न 
पर तुम ---बस हो न वही --ट्रेडिशनल पुरुष 
कांच वाला तीखा मांझा लाकर चुपके से -
अरे ना ना सीनाजोरी से काट देते हो 
मेरी पतंग मेरी उड़ान ---कैसे हो तुम 
एकदम सैडिस्ट --छीन लेते हो मेरा आकाश 
कोई कैसे मुस्करा सकता है --किसी के आंसू पे 
इसी लिए तो तुम्हे सैडिस्ट कहा -- हो न तुम एकदम वही .
एक बात कहूँ सुनो ---अब ज्यादा खुश न हो 
अब मेरी कोई उड़ान तुम नहीं रोक पाओगे 
मैने तुम्हारे तीखे वारो से बचना सीख लिया 
तुम्हारा कांच वाला मंझा मेरी पतंग नहीं काट सकता 
उसे मुक्त गगन के इन वारो से बचना आ गया है 
क्या कहा तुम ने अभी मैने क्या कहा ? 
अरे वो तो मै ...छोड़ो जाने दो --अच्छा बता दूँ 
तुम्हारे चेहरे के एक्सप्रेशन देखना था मुझे :)
अरे मुस्कान गाएब क्यूँ ---बत्तीस नहीं तो 
सोलह ही दांतों से मुस्करा दो --:))))
------------------------दिव्या ----------------------
पेंटिग अज्ञात कलाकार ---गूगल से साभार 
14.1.2013

29 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (16-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

    ReplyDelete
    Replies
    1. This comment has been removed by the author.

      Delete
    2. आभार प्रदीप जी --चर्चा मंच पर स्थान देने एवं ---पोस्ट सराहने का हार्दिक धन्यवाद --

      Delete


  2. ✿♥❀♥❁•*¨✿❀❁•*¨✫♥
    ♥सादर वंदे मातरम् !♥
    ♥✫¨*•❁❀✿¨*•❁♥❀♥✿


    एक बात कहूं ?
    सुनो !
    ...अब ज़्यादा ख़ुश न हो
    अब मेरी कोई उड़ान तुम नहीं रोक पाओगे
    मैंने तुम्हारे तीखे वारों से बचना सीख लिया
    तुम्हारा कांच वाला मंझा मेरी पतंग नहीं काट सकता
    उसे मुक्त गगन के इन वारों से बचना आ गया है ...

    क्या बात है !
    यह है चरम आत्मविश्वास !!

    आदरणीया दिव्या शुक्ल जी
    नमस्कार !

    आपकी कविता 'उफ़ कैसे हो तुम एकदम ट्रेडिशनल सैडिस्ट से - ?' कमाल है
    :)
    तुम्हारे चेहरे के एक्सप्रेशन देखना था मुझे :)
    अरे मुस्कान गाएब क्यूँ ---
    बत्तीस नहीं तो
    सोलह ही दांतों से मुस्करा दो --:))))

    क्लाइमेक्स इतना रहस्यमय है कि समझ नहीं पा रहा कि कविता का समापन हास्य से हुआ है अथवा प्रतिवादजनित आक्रोश के स्वर में व्यंग्य द्वारा ?!

    दोनों स्थितियों में कवि का रूप जैसा भी उभरे ... कविता कहीं प्रभावहीन नहीं हुई ...
    साधुवाद !


    हार्दिक मंगलकामनाएं …
    लोहड़ी एवं मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर !

    राजेन्द्र स्वर्णकार
    ✿◥◤✿✿◥◤✿◥◤✿✿◥◤✿◥◤✿✿◥◤✿◥◤✿✿◥◤✿

    ReplyDelete
    Replies
    1. राजेन्द्र जी सर्वप्रथम आपको भी बधाई संक्रांति की एवं रचना पसंद आई इसका हार्दिक आभार --क्लाइमेक्स में आक्रोश को पीछे रख के जरा से व्यंग में छुपा ढेर सारा प्रेम था --जो मुस्कान तो मांग रहा था ---सादर नमन

      Delete
  3. जब पुरुष पर प्रहार होता है तो उसकी हालत ऐसी ही हो जाती है .... मुस्कान भी नहीं आती चेहरे पर ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. संगीता जी नारी कितना भी आक्रोश भर ले अंत में मुस्कान देखना चाहती है प्रिय के चेहरे पर --सादर धन्यवाद

      Delete
  4. अब मेरी कोई उड़ान तुम नहीं रोक पाओगे
    मैने तुम्हारे तीखे वारो से बचना सीख लिया
    तुम्हारा कांच वाला मंझा मेरी पतंग नहीं काट सकता
    उसे मुक्त गगन के इन वारो से बचना आ गया है

    बेह्तरीन अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हर्दय से आभारी हूँ मदन जी ---सादर नमन

      Delete
  5. शानदार प्रस्तुति ... आभार !


    चल मरदाने,सीना ताने - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
    Replies
    1. ब्लॉग में पोस्ट शामिल करने के लिए आभार --एवं रचना पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद ---सादर

      Delete
  6. ट्रैडिश्नल पुरूष ,ट्रैडिशनल सैडिस्ट ..कमाल की अभिव्यक्ति , बेहतरीन रचना ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. अजय जी आभार आपका

      Delete
  7. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया संगीता जी ---

      Delete
  8. Replies
    1. कालिपद जी बहुत बहुत धन्यवाद --

      Delete
  9. कुछ पुरुषों को इसी में आनंद मिलता है शायद......
    ~सादर!!!

    ReplyDelete
    Replies
    1. सच कहा अनीता जी सादर धन्यवाद

      Delete
  10. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति .....आप भी पधारो आपका स्वागत है मेरा पता है ...http://pankajkrsah.blogspot.com

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार पंकज जी --ब्लॉग पर आमंत्रित करने का धन्यवाद --

      Delete
  11. सुन्दर अभिव्यक्ति ...........एक बात कहूँ सुनो ---अब ज्यादा खुश न हो
    अब मेरी कोई उड़ान तुम नहीं रोक पाओगे
    मैने तुम्हारे तीखे वारो से बचना सीख लिया
    तुम्हारा कांच वाला मंझा मेरी पतंग नहीं काट सकता
    उसे मुक्त गगन के इन वारो से बचना आ गया है

    ReplyDelete
    Replies
    1. डा संध्या जी बहुत बहुत शुक्रिया

      Delete
  12. मधुर मनुहार ... प्रेम ओर आत्मविश्वास दोनों का मिश्रण ... मासूम सी रचना ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपको रचना पसंद आई सादर धन्यवाद दिगम्बर जी

      Delete
  13. Replies
    1. यशवंत माथुर --शुक्रिया आपका

      Delete
  14. मैंने तुम्हारे तीखे वारों से बचना सीख लिया है ...
    मजबूत अभिव्यक्ति ! दिव्या जी ...

    ReplyDelete
  15. एक बात कहूँ सुनो ---अब ज्यादा खुश न हो
    अब मेरी कोई उड़ान तुम नहीं रोक पाओगे
    मैने तुम्हारे तीखे वारो से बचना सीख लिया
    तुम्हारा कांच वाला मंझा मेरी पतंग नहीं काट सकता
    उसे मुक्त गगन के इन वारो से बचना आ गया है
    alag andaaz me behtarwwn kavita ..

    ReplyDelete