Thursday, 24 January 2013

-- लोग कहते हैं अघोरन हूँ --या बंजारन --मुझे पता नहीं --


-- लोग कहते हैं अघोरन हूँ --या बंजारन --मुझे पता नहीं --
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ग्रेव यार्ड ,,और श्मशान दोनों अलग बिलकुल अलग पर दोनों अपने में अद्भुत ----ग्रेवयार्ड की खामोशी में अलग अलग सोये लोग कभी अपने आस पास बैठे लगते है ---पता है मै बीस बाईस साल की ही थी मसूरी के पुराने ग्रेवयार्ड जो कैमल्स बैक रोड पर है ---वहां अक्सर घंटो बैठती थी -----बहुत उदास थी वहाँ बैठ कर रोई भी --फिर लगा जैसे कुछ कह रहें हो ये सब अहसास सा था की कोई पास हैं ---न जाने कितनी बातें की इन सब से खुश हुई तो भी इन्हें ही कहा ठेस लगी दिल को तो भी इनके पास बैठ के रोई ---न जाने कौन है ये मेरे पर बहुत अपने हैं इन जीते जागते लोगों से यह मुझ से प्यार करते है मुझे सुनते हैं भरोसा करते हैं --और अहसास दिलाते है ------इनसे एक अजीब सा रिश्ता है सालों का या युगों का -----नहीं पता ---पर कुछ तो है ---बताना चाहती हूँ पर --
---नहीं बता सकती वो सब ----उपर पहाड़ पर घर था मेरे कमरे की खिड़की से दिखती थी वो कब्रें --और कभी कभी तो मै रात के अंतिम पहर तक देखती थी ---दूर से बातें करती थी उनसे ---डरी नहीं कभी हाँ जिन्दा इंसानों से जरुर डरती थी ----शमशान में तो लगता है लोग बाय करके गए --देखा है मैने तीन बार अपने सबसे प्रिय रिश्तों को वहां से न जाने कहाँ जाते --हिदूं धर्म में औरतें और लड़कियां श्मशान नहीं जाती --पर आजी सास नहीं रही तो इलहाबाद के श्मशान घाट पर मुझे भी ले गए --छोटी ही थी चारो तरफ जलती चिता देख कर एक पल सहम सी गई फिर आजी की जलती चिता के मात्र चार पांच फीट दूर बैठी रही ---और देखती रही जलते --सोच रही थी इन्हें दर्द हो रहा होगा --कभी धुएं को देखती जो उपर उड़ रहा था ---सुना था उपर चले जाते है लोग धुंए में उनको खोज रही थी ---बहुत प्यार करती थी वह मै उनकी पौत्र बधू थी ----जीवन की सच्चाई का बोध तो वहीँ होता है --कुछ नहीं कोई नहीं लगन मुहूर्त नाते रिश्ते सब बातें ----इस जन्म का कोई ठौर नहीं अगला जन्म कौन जाने होता भी या नहीं ---- ------- अक्सर कुछ महीनो बाद मन करता है वहां जाएँ बैठे ----लगता है जन्म जन्मान्तर के बंधन रिश्ते नाते सब झूठे सब आलतू फ़ालतू लग्न मुहूर्त अपने अपने स्वार्थ इमेज का खेल -- -------ये मजाक नहीं --ऐसा ही सोचती हूँ कुछ कुछ ऐसी ही हूँ मै ---कभी कभी जीवन से बेहद प्यार तो छण भर में उतरा बुखार -----शायेद इसी को छणिक वैराग्य कहते हैं ----क्या करू ऐसी हूँ मै ---कुछ घंटे तक लगता है भाग कर जंगलों में चली जाऊं ---फिर कोई डोर खींच लेती है ----लगता है पहले खुद को ही पढ़ लूँ ---न जाने क्या खोज रही हूँ ---कभी लगा लो अभी मिला आँख खुली तो कुछ न था ----कुछ कुछ ऐसी ही मै ---एक पहलु एक रूप ये भी है -----न जाने क्या खोज है -- खोज में जब कांटे भी चुभते है --कभी इतना खुश की भूल जाते है वो बचपन बहुत पीछे छूट गया जो फिर से मुझमें जाग जाता है अभी भी ---नहीं नहीं मजाक नहीं ----जीते जागते इन्सानों दुनिया से बहुत खूबसूरत है ---यह दुनिया -----और मै ह्म्म्म ----मै तो खुद को क्या कहूँ ----मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की ---
-----------------------------------दिव्या --------------------------------------