Saturday, 2 February 2013

अतीत के कालखंड -----



अतीत के  कालखंड ---
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सन्नाटे भरी सर्द रात प्रथम पहर बीत चुका था --
खुली आँखों में सो रही थी --या यूँ कहे नींद कहीं नहीं थी
मेरे भीतर तेज़ी से एक सन्नाटा खींचने लगा --और फिर
मेरी ख़ामोशी मुखर हो उठी शायेद मुझसे बात करने के लिए
इन्ही एकाकी पलों को तलाशती रहती है -और मै बचती रहती हूँ
कहीं मेरी ख़ामोशी विद्रोह न कर दें --और फिर मैने
अपनी डांवाडोल मनस्तिथि को थपथपा कर --------------
एक खोखला दिलासा दिया --और बर्फीला मौन तान लिया
यूँ लगा अतीत का कालखंड हर वर्तमान के साथ -----------------
जुड़ गया क्यूँ कितना गूंथा था चीथड़े चिथड़े हुए वजूद को
लगा था दिल पर लगे इन पीड़ा के पैबन्दो को अब कोई
उधेड़ नहीं पायेगा ---सब कुछ तो बाँट लिया था तुमसे
पर माँ की पुरानी आलमारी के लाकर से मिले -----------------
दर्द के इन दस्तावेजों को मुट्ठी में मींच माघ की ---------------
सर्द बर्फीली रात में भी पसीने से नहा गई -----------------
मां ने सारे लिफाफे अपनी छोटी सी अनुभवहीन
बेटी से छुपा लिए थे वो सारे षडयंत्र कैद हो गए आलमारी में
पर माँ जानती थी बाबा भी जानते थे -यह सब पर मुझे क्यूँ नहीं
पढाया ---शायेद बाबा को संस्कारो और उसूलों के बीच पली बेटी पर
खुद से ज्यादा भरोसा था --पन्ने पलटे और पढ़ते पढ़ते वह खो उन दिनों में ----जब वह लौट आई थी जिसे लोग हनीमून कहते है दो महीने पहाड़ों में गुज़ार कर ---ससुराल वापस बाबा ने भाई को भेजा बहुत दिन कहाँ रह पाते थे मेरे बगैर मै बहुत खुश थी शादी के बाद पहली बार मायके जा रही थी --कार दरवाजे पर लगी थी --समान रखा जा चुका था कमरे दौड़ती हुई आई और बोली जा रहीं हूँ मै --ओके जाओ मै आऊंगा कह कर वो सो गया --एक झटका तो लगा पर माँ बाबा से मिलने की ख़ुशी में वह भूल गई --सासू माँ के पाँव छू कर ज्यू ही कार की तरफ बढ़ी दो हाथों ने पकड कर लिपटा लिया कुछ इस तरह से जोर से सीने में भींच लिया की उसे अजीब सा लगा --गाड़ी तक छोड़ने के बहाने अंदर बैठ जब वो लबें हाथ काँधे की परिधि पार कर अपनी सीमा रेखा का अतिक्रमण करने लगे तो
वह दूसरा दरवाज़ा खोल कर झट उतर गई -- अरे बैठो न क्या हुआ
एक आवाज़ आई देखा तो वह भी खड़ा था जो उसे सात फेरों में बांध कर लाया था --- रास्ते भर सोचती रही क्या यह भ्रम था --
आहत पंछी की भांति पिंजरे का जीवन स्वीकारना ही था उसे कहाँ जाती क्या करती इतनी बड़ी भी नहीं की झट निर्णय ले लेती नहीं इतनी छोटी की गलत समझौते कर लेती --फिर समाज में लोग उसका उदहारण देते क्या महारानी जैसी किस्मत है देश के धनाढ्य लोगों में से एक परिवार की कुलबधू थी --उसे खुद पे तो तरस आता चिढ भी होती उस --सोकाल्ड पति से जो उसके बच्चों का बाप था जिसे सिर्फ पैसा ही दीखता --उन दिनों वह एक छोटी उम्र की अनुभवहीन लड़की ही तो थी ------------------
जो खुद अपने बच्चो की चाकलेट खुद खा जाती थी --जिसे हर लड़की की
तरह पढने का बहुत शौक था --असीम आकाश में उड़ने को आतुर उसके
नन्हे पंख कभी आत्मविश्वास से भर फडफडा उठते तो कभी वह
खुद ही आकाश का असीम विस्तार देख सहम जाती --अकेली जो थी
-नन्हे नन्हे बच्चे और वह खुद -- झूल रही थी एक अजीब कशमश में --पति और उसकी परस्पर मानसिक विसंगतियां उसे अंदर तक झिंझोड़ती रहती जाने अनजाने एक घृणा पनपती गई प्रेम तो हुआ ही नहीं पर बच्चे जरुर हो गए -- अंत भी वही जो इन जैसे रिश्तों का होता है - कभी कभी एक संशय भी मन में पलता कहीं सच में तो मै जिद्दी नहीं --क्या मै गलत थी ---आज हथेली में मिचा हुआ यह कागज़ मुझे इस सोच से भी मुक्त कर गया - बरसों पहले रचे गए षडयंत्र सब इस दस्तावेज़ में सबूत के रूप में है न कह कर वो चीख कर रोती रही सब कुछ तो साफ़ लिखा था इसमें उसकी पढ़ाई बंद करवाने के बारे उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की हर सलाह देता रहा पत्र में ----------------
एक पिता क्यूँ की उसका पुरुषोचित अहम चोटिल हुआ -------
एक साधारण लड़की के द्वारा जिसने उसके हीरे जवाहरात को
ठोकर मार दिया और अपने बाबा के संस्कार चुन सदा के लिए
बनवास ले लिया --क्यूँ की उसकी प्रतिरोध और बचाव के लिए उठती
उसकी आवाज़ खामोशी में घुटती जा रही थी --- सुनो मैने ठीक किया न
अचानक वह पूंछ बैठी मुझसे ---मै जड़ स्तब्ध सब सुन रही थी --
और फिर मैने अपने बगल लेटी उस लड़की को अपने सीने में छुपा लिया -- उसका दर्द अपनी आँखों भर लिया --नींद की ढेर सारी गोलियां उसे डांट कर खिला दी और थपक थपक के उसे सुलाते हुए मै यही सोच रही थी --अतीत तो अतीत था वर्तमान ने भी क्या कम रुलाया ---डर लगने लगा अब प्यार प्रेम कहाँ है अगर कहीं है तो इसके हिस्से में क्यों नहीं --बंद आँखों के भयावह अंधेरों में उसकी दर्द भरी ध्वनि मेरे कानो में प्रतिध्वनि सी गूंजती रहती है -----उसका हाथ थामे मुझे यूँ लग रहा है मानो उसका हर
स्पंदन ये कह रहा हो मेरा क्या कसूर था ---
-----------------------------------दिव्या ---------------------------------------
एक अजनबी लड़की की कहानी के कुछ अंश --जो मै लिख रही हूँ