Sunday, 10 February 2013

तुम क्या जानो --अगर जानते तो -


गुलमोहर की छतनारी छाँव में 
बैठ कर ग्रीन टी पीते हुए 
मैने पलके झुका कर 
चेहरा बाई तरफ घुमा लिया 
दाहिनी तरफ तुम जो थे 
मै नहीं चाहती थी तुम देखो 
मेरी आँखों में गुलमोहर का 
दहकता लाल रंग उतर आया है 
छोडो तुम नहीं समझोगे 
अगर समझते तो --मै 
नजरें ही क्यूँ फेरती ही 
--------दिव्या ----------------
 10.2.2013

14 comments:

  1. आँखों का संवाद सुरक्षित..

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  2. आखों उतरा आक्रोश छुपा लिया --प्रवीण जी ...शुक्रिया ब्लॉग पढने का

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    1. धन्यवाद सुषमा जी ...

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  4. सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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    1. शुक्रिया रीना जी ...

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  5. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,अतिसुन्दर.

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    1. आभार राजेन्द्र कुमार जी ...

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  6. आँखों में दहकता गुलमोहर ...
    वाह !
    जो ना समझे तो समझाकर क्या !

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    1. सच कहा वाणी जी ...आभार

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  7. बहुत खूब ... पर ये लाल रंग दिखाना जरूरी है ... अपना एहसास कराना जरूरी है ... देर सवेरे समझना ही होगा ...

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    1. सही कहा आपने दिगम्बर नासवा जी ---आभार रचना पसंद आई आपको

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  8. दैनिक जीवन में भावनाओं को कैसे नियंत्रित किया जाता है कविता के माध्यम से बताने के लिए साधुवाद ,शुभकामनाये

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    1. प्रवाह जी आपको हार्दिक धन्यवाद आभार ---

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