Sunday, 17 February 2013

वक्त बहता ही रहता है अविरल धारा की तरह


क्या षडयंत्र था न जाने 
पता ही न चला हमें 
वो साल जिसका स्वागत 
दिल खोल कर किया था 
जाते जाते मन दुखा गया 
और आने वाले साल को 
सौंप गया न जाने क्या क्या 
जो इसने आते ही दुःख अवसाद 
झोली भर दर्द के फूल जिसमें 
लगे थे कुछ शक के काँटे सौप दिए 
कभी न शंका करने वाला मन 
भी शंकित होने लगा --कही फिर तो 
काँटे नहीं है इस फूल के अंदर छुपे 
कुछ कोमल मन सख्त हुए 
वक्त का तकाज़ा था जीना तो है ही 
जिंदगी जीना सीखा देती है 
वक्त बहता रहता है अविरल धारा की तरह 
कभी निर्मल गंगाजल की भांति 
तो कभी गंदला भी होता है आहत हो 
पर समय पर छोड़ दिया --वक्त ही तो है 
अब इतना भी जबर नहीं की सत्य को हरा दे 
-----------------दिव्या ------------------------