Saturday, 23 February 2013

ये कैसी कशमकश --


ये कैसी  कशमकश 
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न जाने क्या उमड़ घुमड़ रहा है मन में 
ये कैसी ज़द्दोजहद चल रही --
कहतें है औरत जब प्रेम करती है 
तो उसकी आँखे बंद होती है 

वो कुछ नहीं देखना चाहती सिवा प्रेम के 
भावनाओं के सर्वोच्च शिखर पर बिठाती है 
वो अपने प्रेमी को --और वहीँ देखना चाहती है 
उसका प्रेम बहुत पाक पवित्र होता है 
तभी तो समर्पण तक जाता है 
पर पुरुष उसका प्रेम देह से शुरू होता है 
यदाकदा ही हर्दय में जा कर ठौर लेता है 
एक धारणा आजकल बहुत प्रबल है 
औरत को आज़ादी चाहिए --??
हाँ चाहिए अस्तित्व को बचाने की
पर बंधन उसे प्रिय भी है परिवार का 
प्रेम का यह बंधन कितना पवित्र है 
उससे बेहतर कौन जान सकता है 
टूट कर बिखरना फिर खुद ही 
खुद को समेटना कितना मुश्किल है 
यही सोच रही हूँ ----
-ये कैसी ज़द्दोजहद चल रही मन में 
कुछ कुछ होश सँभालने से लेकर 
साँसों की रिदम टूटने तक 
यही कशमश ही तो चलती है 
सही गलत पाप पुण्य ---------
--------ये जन्म अगला जन्म 
ये जन्म तो बिता दिया -----------
अगले जन्म का शिद्दत से इंतजार पर क्यूँ ?
अरे कुछ बाकी है उस जन्म में कर लेंगे 
पर वो सात जन्मो वाला रिश्ता न बाबा न 
वो नहीं उसका एक्स्टेंशन नहीं चाहिए 
खारिज़ कर देना वो बांड
 मैने अगर कभी भी  भरा था 

जो ताल्लुक बोझ बन जायें --
उन्हें ढोना ठीक है ?? --------------
एक दुसरे के साथ धोखा नहीं ये ?
जो सम्बन्ध मर जायें उन्हें दफना देना ही उचित 
वरना मरे हुए रिश्तों की सड़ांध
जीना मुश्किल कर देती हैं ----
कोई किसी को मैडल नहीं देता 
मन मिले तो मेला वरना 
सबसे भला अकेला -----------
मुखौटे लगा कर क्यूँ जीना --
न जाने क्या क्या उमड़ता घुमड़ता रहा 
आज मन में --उफ़ --------------
-----------------------दिव्या--------------------
22.2.2013

2 comments:

  1. sach me bhaut hi touching lagi har ek lines...

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    1. धन्यवाद सुषमा जी आभार आपका --

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