Wednesday, 27 February 2013

सुनो तुम आये थे न ----


सुनो ! तुम आये थे न ?
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सुनो ! एक बात बताओ
तुम आये थे न ?
आज सुबह से ही
घर में बसी हुई है
परिचित सी महक
आंगन में एक जोड़ी
पैरों के निशान
फिर देखा बेड की
साइड टेबल पर
अधखुली किताब
बगल के तकिये पे
एक बाल था और
बस गई थी जाने पहचाने
शैम्पू की खुशबू अरे -----
-बदला नहीं अभी तक
तुम ने मेरी पसंद का शैम्पू
फिर भी लगा वहम है मेरा
ओह मेरे दाहिने हाथ की कलाई पे
कैसे उपट आये है ये निशान
तुम्हारी तीन उँगलियों के ---
तुम आये थे न ----
-मुझे पता है ----
ये तुम्हारे वजूद की ही खुशबू है
ये मेरा वहम नहीं है
-------------दिव्या ---------------------


14-9-2012

पेंटिग  गूगल  से  साभार 

12 comments:

  1. बहुत उम्दा ..भाव पूर्ण रचना .. बहुत खूब अच्छी रचना इस के लिए आपको बहुत - बहुत बधाई

    मेरी नई रचना
    ये कैसी मोहब्बत है

    खुशबू

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    1. शुक्रिया दिनेश जी --आभार

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  2. बहुत ही सुन्दर अहसास,अतिसुन्दर.

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    1. हार्दिक धन्यवाद राजेन्द्र जी --आभार

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  3. प्रेम के संयोग की और विरह की सुन्दर प्रस्तुति..

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    1. शुक्रिया प्रवीण पाण्डेय जी ---आभार

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  4. अद्भुत, शुभ कामनाएं|

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    1. हार्दिक धन्यवाद यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी जी --

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    1. शुक्रिया --सोनिया -आभार

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  6. Waah...........
    Jazbaat or Ehsaas ki paribhasha

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    1. आभार ---अभिषेक जी

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