Sunday, 17 February 2013

मिसिंग यू माय विन्डो - - - -


मिसिंग यू माय विन्डो
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मुझे बहुत याद आई
अपने पहाड़ वाले घर की
वो खिड़की मेरी दोस्त ----
मेरी हमराज़ ---
कोई जंगला नहीं सिर्फ दो पल्ले थे
जो खुलते थे कब्रिस्तान की ओर
और मै तेरी चौखट पर सर रख बातें करती
कभी चाँद तारों से तो कभी -----
कब्रों में सोये अपने प्यारे दोस्तों से
और तू मेरे दिल की धडकन सुनती
कभी तेज़ कभी डूबती धडकनें
तू गवाह है मेरी तनहाइयों की
पर तेरे होते मै तन्हा कहाँ रही
वो बांसुरी की आवाज़ जो अक्सर
आधी रात को मुझे खींचती थी
मै बेचैन हो उठती जैसे
कोई डोर खीच रही हो ---
तू गवाह है मै नहीं गई कभी
किसी आवाज़ के पीछे --
मेरी अना सर उठा के खड़ी हो जाती
और कब्रों में सोये मेरे दोस्त
मेरा हाथ थाम लेते हाथ बढ़ा के
और तू भी तो अपने पल्ले बंद कर देती
मेरे जिद्दी दिल की तरह -मेरी खिड़की
मुझे तू बहुत याद आ रही है
---------------दिव्या -------------------
18..2..2013
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16 comments:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. आपका आभार आपने हलचल पर इस रचना को स्थान दिया --दिल से शुक्रिया यशोदा जी --

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  2. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति,धन्यबाद.

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    1. आभार राजेन्द्र जी --

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    1. धन्यवाद प्रवीण जी ---

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    1. शुक्रिया दिनेश जी --

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  5. वहा वहा क्या बात है क्या लिखा है आपने


    मेरी नई रचना

    प्रेमविरह

    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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    1. शुक्रिया दिनेश जी --

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  6. सुंदर रचना दिव्या जी बधाई !

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    1. ब्लॉग पर स्वागत है आनंद जी आशा है आप अपनी प्रतिक्रिया देते रहेंगे -

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  7. Replies
    1. हर्दय से धन्यवाद प्रतिभा जी --

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  8. बेहद खूबसूरत रचना दिव्या जी
    आपके ब्लॉग पर पहली बार आई हूँ
    बहुत बढ़िया
    बधाई....शुभ कामनाएं!!!

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  9. बीती यादें यूँ ही रह-रह कर बहुत याद आतीं है ...
    बहुत बढ़िया रचना ..

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