Saturday, 2 March 2013

एक लहर ने मुझे छुआ --और बोली -----


एक लहर ने मुझे छुआ --और बोली
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रात्री का अंतिम पहर बीत चुका
खुली आँखों में ही सारी रात बस
यूँ ही सोती जागती रही मै --
अंतत मैने बिस्तर छोड़ ही दिया
अभी धुंधलका ही था --बाहर आई
अचानक लगा मेरे पीछे कोई और भी है
अरे ये तो मेरी अपनी ही परछाई हैं
मेरे कदम नदी तट की ओर चल पड़े
कुछ उद्वेलित कुछ शांत सी बहती नदी
जैसे मन में हलचल लिए हो मेरी ही तरह
तभी तो यही आ जाती हूँ अक्सर ही
वक्त कोई भी हो सुबह दोपहर या शाम
मै जब भी बेचैन होती यही आ जाती
एक दुसरे से बांटने अपने मनोभाव
हम दोनों की भाषा तो मौन ही है न ---
बैठ कर निहारने लगी अपनी सखी को
अथाह गहराई कही कहीं उथली भी
तेज़ प्रवाह कभी मंथर गति से बहती
जैसे मेरा मन मेरा अंतर कितनी समानता
यही समानता तो निकट लाती है हमे
अपने पाँव जल में डाल के बस
मै घाट की सीढियों बैठ गई मौन हो के
और ठीक पीछे मेरी परछाई भी
नदी का जल हौले से मेरे पाँव को
दुलरा जाता सहला जाता बार बार
मानो वो कुछ कहना चाह रही हो ---
परन्तु मै -न जाने किस सोच में डूबी थी
शायेद नदी कुछ संकेत दे रही थी पर
मै उसे समझ के भी अनदेखा करती जा रही थी
एक तेज़ लहर ने अचानक कुछ ला पटका
ठीक मेरे पांवो के पास --ओह ये तो एक शव है
प्रश्नसूचक आँखों से मुझे देखते देख
उद्वेलित सी नदी बोली कोई चारा नहीं था और
तुझे समझाने का ---ये देख ये वो लोग है
जो अंतरात्मा गहराईयों का अर्थ ही नहीं जानते
ये उथले मनों में बसते है ---वही पुष्पित पल्लवित होती हैं
उनकी कुंठाए --- फिर जलकुम्भी की भांति फैल जाती है --
स्वच्छ एवं पारदर्शी जल में ये नहीं रह पाते
ये शव उनका है जिनकी आत्माएं राख तुल्य हैं
स्फटिक सी अश्रुधारा से जिनका विसर्जन हो जाता है
एक लहर ने मुझे छुआ --और बोली
तुम लडखडा तो सकती हो परन्तु
गिर नहीं सकती कभी -------
--- कुछ सोच के मै मुस्करा दी
फिर अपनी अंजुली में जल ले उसमे स्वयं को निहारा
मानो सखी का आलिंगन किया हो --- और फिर आश्वस्त हो
चल पड़ी वापस घर ----भोर जो हो गई थी

----------------------------दिव्या शुक्ला-------------------------
2-3-2013
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